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हमेशा मेरे साथ रहे पापा

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पापा
स्वाति शैवा
पुत्र
NDND
जानता हूँ तुम हमेशा मेरे साथ रहे पापा
एक मौन संबल बनकर, अटल चट्टान की तरह
बहते हैं जिसके अंदर चुपचाप, स्नेह के सोते
क्योंकि आज मैंने देख लिया था तुम्हें
अंदर के कमरे में सबसे छुपकर... आँसू पोंछते
मेरा दिल बहुत जोर से धड़क गया
इस तरह तो नहीं देखा तुम्हें कभी कमज़ोर होते
लगा जैसे ये आँसू तुमने सालों से छुपाकर रखे थे
जो आज मुझे अचानक मिल गए और कह गए सारी बातें

पिता
उस नन्हे कंचे में अब तुम्हारी
उँगलियों की छाप देख रहा हूँ
खिड़की से उड़ता, सात समुंदर पार जाता
तुम्हारा विमान देख रहा हूँ
अब भी तौलिया तुम
फर्श पर ही फेंक कर गए हो
और बाथरूम की लाइट जलती छोड़ गए हो
हर बार वही हड़बड़ी, वही भागदौड़
जिसे अगली बार न करने का
वादा तुम मुझसे करते हो
इतनी दूर की नौकरी...
कैसे रहोगे,क्या खाओगे...
ये चिंताएँ मेरा भी मन मथ रही हैं
दिल में इच्छा थी कि रोक लूँ तुम्हें
लेकिन कह नहीं पाया
सहज भाव से तुम्हें जाते समय
गले भी नहीं लगा पाया
इसलिए आया था
अखबार लेने के बहाने अंदर
ताकि अँधेरे में जाकर पोंछ लूँ
उन पलों को जो ढुलक आए थे गालों पर।

पुत्री
आज फिर तुम देर से आए होंगे बाबा
और दिन का खाना भी नहीं खाया होगा
हमेशा की आदत है ये तुम्हारी
बिलकुल बच्चों की तरह समझाना पड़ता है
याद है बचपन में तुम्हारा गुस्सा देख
मैं छुप जाती थी माँ के आँचल में
पर बड़े होकर जाना कि
नरमी भी भरी है तुम्हारे दिल में
अभी एक हफ्ता ही हुआ है
इस नए घर में आए
पर लगता है सालों से तुमसे दूर हूँ
बस एक शिकायत है तुमसे
अपना स्नेह तुम मुझसे जताते क्यों नहीं?
दिल करता है तो भी मुझे
एक बार गले लगाते क्यों नहीं?
चलो अच्छा.. ये सब जाने दो
तुम अपना खयाल रखना, और हाँ,
गोली खा लेना समय से
लाल ढक्कन वाली शीशी में रखी है।

पित
बहुत जल्दी बीत गया वक्त
अभी तो ठीक से मैं तुम्हें
जता भी नहीं पाया था अपनी भावनाएँ
जो न जाने कितने सालों से दबी हैं।
मन के किसी कोने में
छोटी थी तुम तो गुड़िया सी
डोलती थी पूरे घर में
थोड़ी बड़ी हुई तो मेरी दादी अम्मा बन गई
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NDND
लगता है जैसे अपनी नन्हीं आँखों से भी
तुम पढ़ लेती हो मेरे दिल की
हर उथल-पुथल, बिना कहे
तभी तो भावनाओं का तूफान उठने पर
बचाता हूँ तुमसे अपनी नजरें
अबकी आना, तो जरा ज्यादा रुकना
ढेर सारी बातें बाँटनी हैं तुम्हारे साथ
जो अब तक मैंने किसी से कही नहीं।

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