जानता हूँ तुम हमेशा मेरे साथ रहे पापाएक मौन संबल बनकर, अटल चट्टान की तरहबहते हैं जिसके अंदर चुपचाप, स्नेह के सोतेक्योंकि आज मैंने देख लिया था तुम्हेंअंदर के कमरे में सबसे छुपकर... आँसू पोंछतेमेरा दिल बहुत जोर से धड़क गयाइस तरह तो नहीं देखा तुम्हें कभी कमज़ोर होतेलगा जैसे ये आँसू तुमने सालों से छुपाकर रखे थेजो आज मुझे अचानक मिल गए और कह गए सारी बातेंपिता उस नन्हे कंचे में अब तुम्हारी उँगलियों की छाप देख रहा हूँखिड़की से उड़ता, सात समुंदर पार जाता तुम्हारा विमान देख रहा हूँअब भी तौलिया तुम फर्श पर ही फेंक कर गए होऔर बाथरूम की लाइट जलती छोड़ गए होहर बार वही हड़बड़ी, वही भागदौड़जिसे अगली बार न करने का वादा तुम मुझसे करते होइतनी दूर की नौकरी... कैसे रहोगे,क्या खाओगे...ये चिंताएँ मेरा भी मन मथ रही हैंदिल में इच्छा थी कि रोक लूँ तुम्हें लेकिन कह नहीं पायासहज भाव से तुम्हें जाते समय गले भी नहीं लगा पायाइसलिए आया था अखबार लेने के बहाने अंदरताकि अँधेरे में जाकर पोंछ लूँ उन पलों को जो ढुलक आए थे गालों पर। पुत्री आज फिर तुम देर से आए होंगे बाबाऔर दिन का खाना भी नहीं खाया होगाहमेशा की आदत है ये तुम्हारीबिलकुल बच्चों की तरह समझाना पड़ता हैयाद है बचपन में तुम्हारा गुस्सा देख मैं छुप जाती थी माँ के आँचल मेंपर बड़े होकर जाना कि नरमी भी भरी है तुम्हारे दिल मेंअभी एक हफ्ता ही हुआ है इस नए घर में आएपर लगता है सालों से तुमसे दूर हूँबस एक शिकायत है तुमसेअपना स्नेह तुम मुझसे जताते क्यों नहीं?दिल करता है तो भी मुझे एक बार गले लगाते क्यों नहीं?चलो अच्छा.. ये सब जाने दोतुम अपना खयाल रखना, और हाँ,गोली खा लेना समय से लाल ढक्कन वाली शीशी में रखी है। पिता बहुत जल्दी बीत गया वक्तअभी तो ठीक से मैं तुम्हें जता भी नहीं पाया था अपनी भावनाएँजो न जाने कितने सालों से दबी हैं।मन के किसी कोने में छोटी थी तुम तो गुड़िया सी डोलती थी पूरे घर मेंथोड़ी बड़ी हुई तो मेरी दादी अम्मा बन गई
लगता है जैसे अपनी नन्हीं आँखों से भी
तुम पढ़ लेती हो मेरे दिल की
हर उथल-पुथल, बिना कहे
तभी तो भावनाओं का तूफान उठने पर
बचाता हूँ तुमसे अपनी नजरें
अबकी आना, तो जरा ज्यादा रुकना
ढेर सारी बातें बाँटनी हैं तुम्हारे साथ
जो अब तक मैंने किसी से कही नहीं।