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हिन्दी कविता : नहीं जानती क्यों

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स्मृति आदित्य

, सोमवार, 13 अक्टूबर 2014 (15:13 IST)
नहीं जानती क्यों 
अचानक सरसराती धूल के साथ 
हमारे बीच 
भर जाती है आंधियां
और हम शब्दहीन घास से 
बस नम खड़े रह जाते हैं 
 
नहीं जानती क्यों 
अचानक बह आता है 
हमारे बीच 
दुखों का खारा पारदर्शी पानी 
और हम अपने अपने संमदर की लहरों से उलझते 
पास-पास होकर 
भीग नहीं पाते... 


 
 
नहीं जानती क्यों
हमारे बीच महकते सुकोमल गुलाबी फूल 
अनकहे तीखे दर्द की मार से झरने लगते हैं और 
उन्हें समेटने में मेरे प्रेम से सने ताजा शब्द 
अचानक बेमौत मरने लगते हैं..
नहीं जानती क्यों.... 

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