अनुप्रिया
हो सके तो सूरज
कुछ पल ठहर जाओ
फिर आना रंगने
संपूर्ण सृष्टि को
उजालों में
अभी
अधूरी है नींद दादी की
रात भर खाँसती टटोलती रही
पुरानी यादों के उजले सपने
जरा ठहरो
कि नहीं भर पाई है सारे रंग
अपनी ख्वाहिशों में
बड़की दीदी
रुको अभी
कि नहीं गया है दर्द
बाबूजी के घुटनों का
उनकी टीस भरी थकान को
नींद के परों पर उड़ जाने तो दो।
कि नहीं जुटा पाई है माँ
उम्मीदों के हुलसते फूल
जो बदल दें
हर अंधेरे को
धुली रोशनी में, हो सके तो
कुछ पल ठहर जाओ।