Webdunia - Bharat's app for daily news and videos

Install App

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia
Advertiesment

हिंदी कहानी: तलवार की धार

हमें फॉलो करें webdunia
webdunia

स्वरांगी साने

जाह्नवी और तन्मय की नई-नई शादी हुई थी, तन्मय के ऑफ़िस जाते समय जाह्नवी उसे रोज़ छोड़ने नीचे आती थी, उसी समय प्रिया बालकनी में बैठकर अख़बार पढ़ा करती। एक दिन जाह्नवी लौट रही थी तभी प्रिया और जाह्नवी की नज़रें मिल गईं, प्रिया ने हंसकर हाथ हिला दिया। फिर तो जैसे रोज़ का यह सिलसिला हो गया।

जाह्नवी के लौटने और प्रिया के अखबार पढ़कर रखने का एक ही समय होता, मुस्कुराहटों से बातों के सिलसिले भी चल पड़े, पहले केवल ‘हाई-हैलो’, फिर ‘कैसे हैं?’ वाली औपचारिकता और फिर चाय पीने आइए का न्यौता और एक दिन जाह्नवी सामने थी। फिर चाय के सिलसिले भी चल पड़े, जाह्नवी लौटते हुए प्रिया के घर से चाय पीकर ही अपने घर जाने लगी। दोनों की दोस्ती जाने कब पारिवारिक मित्रता में बदल गई, शनिवार-रविवार के साथ उठने-बैठने, खाने-पीने, घूमने जाने के प्लान बनने लगे। नई शादी की उमंग जाह्नवी और तन्मय दोनों के युवा मन पर थी। तन्मय की जेब में कभी पैसे नहीं होते, उसका कहना था- घर की लक्ष्मी तो जाह्नवी है, मैं तो उससे ही पैसे मांगता हूं।

सैलेरी अकाउंट में जैसे ही पैसा जमा होता है, मैं नॉमिनल रहने देता हूं और बाकी हमारे ज्वॉइंट खाते में ट्रांसफ़र कर देता हूं। फिर जाह्नवी से मांगता रहता हूं। उसके ऐसे कहने पर सब हंस देते थे और हर महफ़िल उन दोनों की वजह से गुलज़ार हो जाती।

तन्मय ऑफ़िस पहुंचते ही फ़ोन करता- जानू मैं ऑफ़िस पहुंच गया।
जाह्नवी अपने ऑफ़िस पहुंचते ही उसे फ़ोन करती- तनु मैं ऑफ़िस पहुंच गई।

दोनों हर बात एक-दूसरे को बताते। यह एक अलग तरह का त्रिकोण था जिसमें एक ओर जाह्नवी और तन्मय को एक-दूसरे की सारी बातें पता होतीं तो दूसरी ओर प्रिया को भी उन दोनों की सारी बातें पता होती। कभी जाह्नवी फ़ोन नहीं उठाती तो तन्मय, प्रिया को फ़ोन कर देता कि पता नहीं जाह्नवी फ़ोन क्यों नहीं उठा रही है, क्या हो गया?

तन्मय फ़ोन नहीं उठाए तब जाह्नवी इसी चिंता में प्रिया को फ़ोन लगा देती। प्रिया दोनों को हंसकर समझाती और दोनों प्रिया को साधिकार सारी बातें बताते रहते।

कल हम लेट नाइट मूवी देखने गए थे, इतना रोमांटिक ऐक्सपीरियंस था न कि क्या बताऊं? जाह्नवी ने सुबह की चाय के साथ प्रिया को यह बताया। रात को प्रिया ऑफ़िस से लौटी, उस समय तन्मय भी लौटा था और दोनों लिफ़्ट में साथ थे, तन्मय ने कहा-कल इस वक्त जाह्नवी और मैं सिनेमा हॉल में थे और आज लिफ़्ट में, वक्त-वक्त की बात, और वह हंस पड़ा। प्रिया भी इस बात पर हंस दी।

कभी जाह्नवी बताती- सुबह की पहली चाय तो तन्मय ही बनाता है। उसके हाथ की पहली चाय के बाद पूरा दिन फुर्तीला बीतता है। तो कभी तन्मय कहता जाह्नवी को खाना बनाने का इतना शौक है, बनाती भी है और खिलाती भी है। उसे लगता है जैसे खाना खिलाने से ही प्यार ज़ाहिर होता है। पेट भर जाता है पर उसे मना नहीं कर पाता।
-

दोनों के प्यार की पींगें बढ़ती जा रही थीं, उनकी आर्थिक स्थिति भी उन्नत हो रही थी और अब तो उनका परिवार भी बढ़ गया था। वे अपनी बेटी पलक को उसी तरह पलकों पर बैठाए रखते थे। उनका परिवार सुखी परिवार की मिसाल बन गया था। सुखी परिवार कांच के जार की तरह होता है, छोटी-छोटी किरचें भी उसके तड़कने का कारण बन जाती हैं और वो इतना पारदर्शी होता है कि कोई भी उसके आर-पार देख सकता है। जो बातें खुशियां देती थीं वे ही टींस बनने लगीं। जाह्नवी शिकायत करने लगी- तन्मय सुबह की चाय इतनी तसल्ली से बनाता है कि बाकी के कामों में देर हो जाती है। मैं एक तरफ़ चाय चढ़ाकर दूसरी तरफ दूध की पतीली भी रख देती हूं लेकिन तन्मय का कहना है, चाय मतलब उस समय रसोई में केवल चाय बनेगी, तभी एक नंबर चाय बनेगी, अरे न बने एक नंबर चाय, चाय का क्या है, और भी तो काम होने चाहिए न, तन्मय का क्या है, उसे तो केवल चाय बनानी है कि हो गया उसका काम पूरा।

तन्मय कहने लगा पेट भर जाता है तो जाह्नवी कहती है इतना सा बच रहा है, खा लो, अरे पेट है या डस्टबिन। मना करने की आज़ादी तक नहीं है, वो तुरंत बुरा मान जाती है।

जाह्नवी कहती तन्मय को कुछ समझ नहीं आता बेटी के सामने पास आने की कोशिश करता है। बेटी पर इसका कैसा असर होगा ज़रा नहीं सोचता।

तन्मय कहता जाह्नवी बच्ची के सामने झगड़ पड़ती है। ज़रा नहीं सोचती बेटी पर इसका क्या असर पड़ेगा?
जाह्नवी -तन्मय लोगों के सामने एक-दूसरे के प्रति अतिरिक्त आदर दिखाने लगे। घर से बाहर निकलते हुए परफ़ेक्ट कपल की तस्वीर से लगते लेकिन उनके घर से छोटी-छोटी तकरारें और बाद में बड़ी चिल्लाहटें भी बाहर सुनाई देने लगीं। दोनों साथ रहते इसलिए कि अलग नहीं रह सकते थे, फ्लैट की ईएमआई, बच्ची की फीस और अफ़ोर्डेबल लाइफ़ चलती रही इसलिए वे अलग होना अफ़ोर्ड नहीं कर सकते थे। कभी वे हाथ में हाथ लेकर घूमा करते अब एक-दूसरे के साथ चलते हुए भी अलग-अलग चलते, सोशल डिस्टेसिंग उनके बीच आ गई थी और संतुलन कहीं खो गया था।
--

वो रविवार का दिन था। कोई लगातार दरवाज़ा बजा रहा था, डोर बैल लगातार बज रही थी। प्रिया अंदर से ही चिल्लाई- अरे रुको,रुको आ रही हूं। क्या कहीं आग लग गई है?
दरवाज़े पर जाह्नवी थी।
-    क्या हुआ
-    तन्मय घर नहीं लौटा
-    आज तो संडे है, कहां गया
-    मुझे कहा लंच गरम करें तब तक चक्कर मारकर लौटता हूं और जो गया, वो आया ही नहीं।
-    कितने बजे की बात है?
-    दोपहर के एक-डेढ़ बजे का समय होगा और अब देख चार बजने को आए हैं, अभी तक नहीं आया, पलक भी उसके साथ है।
-    पलक को लेकर घुमाने गया होगा, आ जाएगा, उसे फ़ोन लगा।
-    उसका मोबाइल स्विच ऑफ़ है।
-    ओह.. अच्छा रुक, सोसाइटी ऑफ़िस में चलकर सीसीटीवी फुटेज देखते हैं, हो सकता है किसी के घर गया हो, पता चल जाएगा किस बिल्डिंग में गया है, फिर वहाँ का सीसीटीवी देख लेंगे या उस बिल्डिंग में दो-तीन लोगों से फ़ोन पर पूछ लेंगे।
-    मैंने अपनी सोसाइटी में जिनके यहां वह जाता है, वहां फ़ोन लगा लिया, वो वहां नहीं गया। तेरे यहां आता तो मुझे भी बुला ही लेती इसलिए पता था तेरे यहां नहीं आया।
-    अच्छा चल तब भी सीसीटीवी तो देखते हैं, कुछ तो पता चलेगा।

प्रिया ने दरवाज़े की चाभी हाथ में ली और लैच लगा लिया। वे पहले आनंद के यहां गए, वो सोसाइटी का चेयरमैन था फिर सोसाइटी ऑफ़िस का कमरा खोला गया, सीसीटीवी फ़ुटेज देखने पर पता चला तन्मय और पलक दोपहर डेढ़ बजे ही सोसाइटी कैंपस से बाइक पर बाहर जा रहे थे। जाह्नवी ने जैसे खुद से ही सवाल किया- खाना गर्म करने का बोल ये दोनों कहां निकल लिए?

प्रिया ने कहा- हो सकता है, पलक ने कोई जिद कर दी हो या तन्मय ही उसे कुछ दिलाने चौराहे तक गया हो, आ जाएंगे, चिंता मत कर।

लेकिन दोपहर के भोजन के लिए घर से निकला इंसान अगले चार-छह घंटे भी न लौटे तो चिंता होना स्वाभाविक ही था। चिंता तब और बढ़ गई जब लंच के समय निकले तन्मय और पलक डिनर तक भी नहीं लौटे। किसी ने सलाह दी- पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा देना चाहिए। दूसरे ने जानकारी दी- पुलिस 24 घंटे तक एफ़आईआर नहीं लिखती।

सोसाइटी के लोगों को जैसे-जैसे पता चला सबके फ़ोन जाह्नवी  को आने लगे, कई लोग घर पर भी आए थे। इस बीच उस शहर में रहने वाले कुछ रिश्तेदारों और दोस्तों को फ़ोन लगाकर भी पूछा गया कि वो उनके यहां आया क्या लेकिन हर जगह से ना में उत्तर मिल रहा था। जाह्नवी के फ़ोन की ही नहीं, उसकी खुद की भी बैटरी डाउन होने लगी थी।

जाह्नवी  सबसे वही बात कर-करके थकने लगी थी। रात के बारह बजे तक धीरे-धीरे सब लोग अपने-अपने घर चले गए। प्रिया ने उस रात जाह्नवी के साथ ही रुकना तय किया। हो सकता था देर-सबेर तन्मय और पलक घर लौट आएं।

लेकिन ऐसा नहीं होना था, नहीं हुआ। जाह्नवी और प्रिया ने बैठे-बैठे रात गुज़ार दी, सुबह चार बजे के करीब प्रिया ने जाह्नवी से कहा वो अंदर जाकर सो जाए, लेकिन जाह्नवी को नहीं नींद आ रही थी, न उसका सोने का मन था।

दूसरे दिन सोसाइटी के कुछ लोगों के साथ वे अपने एरिया के पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करने गए। पुलिस ने ढेरों सवाल पूछ डाले, कल से जाह्नवी इन सारे सवालों के जवाब कई लोगों को दे चुकी थी।

-    पति-पत्नी के बीच कुछ झगड़ा हुआ था क्या? किसी से कोई अफ़ेयर था क्या? बेटी को क्यों लेकर गया? जाना ही था तो अकेले जाता?

जाह्नवी के पास इन सवालों के कोई जवाब नहीं थे। चारों ओर से तनती तलवार से वो लगातार घायल हो रही थी। जो परिस्थिति सामने थी उसमें उसके लिए दिन निकालना वैसे भी तलवार की धार पर चलने जैसा हो रहा था। जाह्नवी ने प्रिया से पूछा-क्या तन्मय को लगता था कि मैं पलक की देखभाल नहीं करती?

क्या मुझसे किसी बात का बदला लेने के लिए तन्मय उसे अपने साथ ले गया कि मैं छटपटाती रह जाऊं? पलक को ज़रा-सी भी चोट लगती थी तो हम दोनों कांप जाते थे फ़िर वो पलक को किसी मुश्किल में कैसे डाल सकता है। दोनों ठीक तो होंगे न?

दूसरे शहर से जाह्नवी का भाई और तन्मय के भाई-भाभी भी अगले दो दिनों में उनके यहां आ गए थे। प्रिया आते-जाते खबर ले रही थी। वह मीडिया में थी, उसने अपनी ओर से भी ख़बर की तह तक जाने की कोशिश की।

पुलिस से जानकारी मिल रही थी। उसे आखिरी बार सीसीटीवी फ़ुटेज में देखा गया था। उसने एक मॉल के एटीएम से लगभग तीस हज़ार रुपए निकाले थे, यह तन्मय और जाह्नवी  का ज्वॉइंट अकाउंट था और बाइक से कहीं चला गया था। सरकारी अस्पतालों से दुर्घटनाग्रस्त लोगों की जानकारी में उसका नाम नहीं आ रहा था।

तसल्ली की बात इतनी थी कि कहीं कोई लाश नहीं मिली थी लेकिन उसका मोबाइल बंद आ रहा था। एक-दो, तीन-चार करते हुए सात दिन बीत गए थे, कहीं-कोई अता-पता न था। पुलिस का यह कहना था कि शायद वो खुद ही अपनी मर्जी से कहीं चला गया था। अगले बैंक ट्रांजेक्शन या मोबाइल के ऑन होने तक इंतज़ार करने के अलावा किसी के हाथ में कुछ नहीं था।

जाह्नवी और तन्मय का सुखी संसार था। सुखी संसार में पलक थी। उनके त्रिकोण के दो कोण अब गुमशुदा लोगों की सूची में शामिल हो गए थे

•    तन्मय रामचंद्र भावसार, उम्र 35 साल, व्यवसाय नौकरी, ऊंचाई 5 फीट 7 इंच, रंग गेहुआं, नाक चौड़ी, आंखों का रंग काला, थोड़े घुंघराले काले बाल, नीले रंग की टीशर्ट और काले रंग की जींस पेंट पहने हुए लापता।

•    बेटी पलक, उम्र 5साल, ऊंचाई 2 फीट 4 इंच, रंग गोरा, पतली नाक, काली आंखें, भूरे बाल, लाल रंग का फ़्रॉक पहने लापता।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

काम की बात : जानिए क्या है उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में