अब मैं कभी चाबी नहीं भूलता.....

प्रिय पाठकों,
क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ कि झमझम बरसते मौसम में आप 20-25  किलोमीटर तय कर अपने घर आए हो और पता चले कि घर की चाबी तो वहीं रह गई जहां से चले थे। रात इतनी उतर आयी हो कि उस समय वापिस जा चाबी ले आने के रास्ते ही बंद हो चले हो। रात भर सुबह होने के इतंजार में कटी हो। 

मेरे साथ ऐसा हुआ पर सारी रात तकरीबन बेफ्रिकी के आलम में गुजरी। हां,मां के साथ ठीक उल्टा हुआ। उनकी सारी रात सुबह होने के इतंजार और फ्रिकमंदी के बीच गुजरी। 
 
दौर उस समय का था जब विरलों के ही घर फोन हुआ करते थे। मोबाइल का तो अस्तित्व ही नहीं था। फोन घर में लगे भर होने से उनका समाज में स्तर कितना ऊपर उठ जाता था ये दीगर बात है। यहां मसला कुछ और था। 
 
सो मुद्दे की बात यह थी कि मैं अपनी दोनों बहनों के साथ जब घर पहुंचा और घर के दरवाजे खड़े हो अपनी जेबों में चाबियां टटोलनी शुरु की तो चाबियों का नामोनिशान न था जेबो में। चाबी के चक्कर में जेबों के अस्तर उलट दिये पर नतीजा सिफर रहा। खाली जेबें और दोनो बहनें मुंह चिढ़ाती सी लगी। कोई और दिन होता तो दोनों की चोटियां खींच सिर पर दो धौल जमा देता पर आज पासां उल्टा पड़ा था। 
 
बड़े भाई का लिहाज था इसलिए सामने कोई बोल न फुटे पर दोनो की आंखों ही आंखों में क्या बातें हो रही थी वो बखूबी समझ आ रहा था। पर करता क्या गलती तो उसकी थी ही। 
 
मां नानी के घर ही रुकी थी। नानी के घर से चलने वक्त मौसम का यह रूप न था। इसलिए तो मां ने बेफ्रिक हो दोनों लड़कियों को मेरे साथ कर दिया था।  
मैं भी ये सोच कर कि आज बड़े भाई का रौब दिखा दोनों से अपनी खूब सेवा करवाऊं गा। दोनों को ढो लाया था। चाबी का मसला न आया होता तो आराम से सोफे पर पसरा होता और पानी से ले खाना तक वही सोफे में लेट खा रहा होता। 
     
हाय रे किस्मत, सारे शगुन आज ही होने थे। 
 
चाबी थी नहीं सो बहनों के साथ घर के आगे तो डेरा डाला नहीं जा सकता था। बात केवल रहने की नहीं थी पेट ने भी बगावत कर दी थी। अब क्या हो?
 
मम्मी-पापा के चार-पांच घरों से परिवार जैसे संबंध थे। सब खुब बुलाया करते थे। सो सोचा आज उनको सेवा का मौका दिया जाए। बहनों ने तो अपनी प्रिय 'श्रीवास्तव आंटी' के यहां जाने की बात कही। उनकी दो बेटियां थी। बसजी रहने-खाने के साथ-साथ गप्पे-सप्पे भी हो जाएगी। पर मेरा मन उखड़ गया। उनकी दोनों बेटियों से मेरा 36 का आकंड़ा था। 
 
मैंने दोनों से 'नायर अकंल' के यहां चलने की मनुहार की पर दोनों बगावत पर उतर आई थी। मुंह से तो कुछ बोली नहीं पर अपनी जगह से हिली भी नहीं। सो मैंने हथियार डाल दिए। पर पूरी तौर पर नहीं। दोनों बहनों को 'श्रीवास्तव आंटी' के यहां टिका मैं 'नायर अंकल' के यहां खिसक लिया| उनके बेटे से बतियाने का इससे अच्छा मौका मिलता कहां। 
 
उधर जब मम्मी ने देखा कि घर की चाबियां बजाए मेरे 'डाइनिंग टेबल' की शोभा बढ़ा रही हैं तो गुस्से से ज्यादा उन्हें हमारी फ्रिक होने लगी। 
 
रात बारिश का कहर न होता तो रात ही वो घर पहुंच चुकी होती। फ्रिक के मारे सारी रात करवटो में गुजरी उनकी। 
 
सुबह होते न होते वे घर पहुंच चुकी थी। मां ने सबसे पहले हलकारा 'नायर अकंल' के यहां ही भेजा। गनीमत रही नहीं तो दोनों बहनों के सामने और फजीहत होती। 
 
चाबी रह जाने का यह वाकया दोबारा नहीं दोहराया गया। चाबी क्या अब घर से निकलने से पहले सारी जरुरी चीजें संभाल कर रख लेने की आदत जो पड़ गई हैं।  

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