Publish Date: Mon, 26 May 2025 (17:03 IST)
Updated Date: Mon, 26 May 2025 (17:03 IST)
एक गांव एक बड़ी और पवित्र नदी के किनारे बसा था। गांव के लोग नदी को 'जल देवता' मानते थे और उसका सम्मान करते थे। लेकिन जैसे-जैसे गांव बड़ा होता गया, लोगों ने नदी में कूड़ा फेंकना शुरू कर दिया, उद्योगों ने अपने रसायन इसमें बहा दिए। नदी का पानी काला और दुर्गंधयुक्त हो गया। पुरोहितों ने चेतावनी दी कि जल देवता क्रोधित हो रहे हैं, पर किसी ने उनकी बात नहीं मानी।
एक रात, आसमान में काले बादल छा गए और मूसलाधार बारिश हुई। नदी, जो अब प्रदूषित मलबे से भरी थी, उफन पड़ी। बाढ़ आ गई, जिसने पूरे गांव को जलमग्न कर दिया। घर बह गए, खेत नष्ट हो गए, और कई जानें चली गईं। यह एक ऐसी आपदा थी जो सीधे तौर पर पर्यावरणीय अनाचार का परिणाम थी।
बाढ़ के बाद, गांव के बचे हुए लोग नदी के किनारे एकत्र हुए। उन्होंने देखा कि उनकी नदी, जो कभी जीवनदायिनी थी, अब एक विनाशकारी शक्ति बन गई थी। एक बुजुर्ग महिला, जिसने अपने पूरे परिवार को खो दिया था, ने कहा, 'हमने जल देवता का अपमान किया। हमने उसे प्रदूषित किया, और अब उसने हमें शुद्ध करने के लिए अपनी शक्ति दिखाई है।'
इस त्रासदी ने गांव वालों को एक बड़ा सबक सिखाया। उन्होंने शपथ ली कि वे नदी को फिर से शुद्ध करेंगे। उन्होंने स्वच्छता अभियान चलाए, उद्योगों को प्रदूषित पानी छोड़ने से रोका, और नदी के किनारे पेड़ लगाए। धीरे-धीरे, नदी का पानी फिर से साफ होने लगा, और गांव वालों ने फिर से जल देवता का सम्मान करना शुरू किया। वे समझ गए कि प्रकृति का सम्मान ही उनके सुख और सुरक्षा का आधार है।
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