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अव्यक्त खामोशी

लघुकथा

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अव्यक्त खामोशी
विनीता मोटलानी
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आज फिर सुबह से ही घर को युद्ध का मैदान बना दिया है सुनील के पापा ने। हर बात को चीख-चीखकर कह रहे हैं। अपने नित्य कार्यों में उलझी जया चुपचाप सुनती जा रही है। दफ्तर जाने के समय तक सुनना ही पड़ेगा, आदत जो हो गई है।

टिफिन बंद करते-करते कानों से आवाज टकराई-'कोई भी चीज जगह पर नहीं मिलेगी, अरे मेरी फाइल कहाँ है?' जया को याद आया रात को ही टीवी देखते समय उनके हाथ में थी। वह जल्दी से वहाँ गई और फाइल लाकर उनको पकड़ा दी। फाइल लेते हुए भद्दी सी गाली देते हुए वे निकल गए।

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अब जया की सहनशीलता जवाब दे चुकी थी। मन हल्का करने की गरज से वो सुनील के कमरे में जाने लगी। आँखों में आँसू उमड़ आए थे। सुनील सिर झुकाकर पढ़ने में मस्त था। "देखा आज फिर तुम्हारे पापा ने कोहराम मचा दिया। कब की चली जाती अगर तुम्हारी चिंता न होती तो ...'

उमड़ आए आँसुओं को रोक वह वापस जाने को मुड़ी इतने में सुनील ने आवाज दी मम्मा ऽऽऽ कुछ कह रही थी?' जया ने देखा वह अपने कानों से इयरफोन निकाल रहा है। नहीं...कुछ भी तो नहीं...कहकर वह वापस रसोई की ओर मुड़ गई...।

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