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काम के आदमी

विनोद द. मुळे

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लघुकथा
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एक समय था जब वर्माजी अपनी मिलनसारिता हेतु कॉलोनी में पहचाने जाते थे। किसी के यहाँ शादी-ब्याह हो या कोई अन्य मंगल प्रसंग, सार्वजनिक गणेशोत्सव हो या कोई अन्य गतिविधि, वर्माजी वहाँ अवश्य दिखाई देते। गाहे-बगाहे हमारे घर भी आ जाते। हालचाल पूछते, आधा कप चाय लेते और चले जाते। हम भी जब कभी उनके घर जाते वे बड़ी आत्मीयता से पेश आते।

रास्ते में जब भी मिलते, कुछ समय के लिए रुककर बात अवश्य करते। यदि आप दूर हों या जल्दी में हों, तो आवाज लगाते, मुस्कुरा देते और हाथ हिला देते। आते-जाते कॉलोनी की सड़कों पर खेलते बच्चों से भी बतियाते या उनके साथ हँसी-मजाक कर लेते।

ऐसे ही किसी छुट्टी के दिन, सुबह वर्माजी घर आए, जैसे कि आते ही रहते थे। हमें कुछ अचरज न लगा। थोड़ी गपशप की और फिर काम की बात पर आ गए, भाई साहब, फलाँ-फलाँ कंपनी का मैं 'मेंबर' बन गया हूँ। एक हजार रुपए देने पर हमें 1400 रुपए की रोजमर्रा की चीजें मिलती हैं। फिर वर्माजी ने अगले एक घंटे तक 'सेमिनारों' और 'वर्कशॉपों' में सिखी-सिखाई, रटी-रटाई स्टाइल और भाषा में लेक्चर पिलाना शुरू किया।

मैं किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह बड़ी ही तन्मयता और एकाग्रता से उनका वह ज्ञान पीता रहा। ऐसा लगा मानो सीमित आय और सीमित आवश्यकताओं के बल पर जिंदगी का असीमित आनंद लूटने वाले सीधे-सादे, सामाजिक वर्माजी के शरीर में किसी 'व्यावसायिक आत्मा' ने प्रवेश कर लिया था।

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वर्माजी के रटे-रटाए लेक्चर को जब 'फूल स्टॉप' लग गया तो मैंने उन्हें कहा,- 'वर्माजी! ऐसे 'अपनों' को ही मेंबर बनाकर पैसा कमाने में न तो मुझे रुचि है और न ही मेरी पत्नी को।' फिर मैंने इधर-उधर की बातें की।

खैर... थोड़ी देर बाद वर्माजी मेरे घर से उठकर चले गए। अब कभी भी रास्ते में मिलते हैं, मुँह फेर लेते हैं। अब हम उनके 'काम के आदमी' जो न रहे, कॉलोनी के अन्य कई लोगों की तरह।

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