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नेताजी की सेवा

लघुकथा

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विकास मानव
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वह सड़क पर खून से लथपथ कराह रहा था। किसी वाहन की चपेट में आकर बुरी तरह जख्मी हो गया था। चारों तरफ भीड़ इकट्‍ठी थी। पुलिस केस है, क्या किया जा सकता है - मुँह खोलने वालों में सुगबुगाहट थी। पुलिस आ गई। अब तक उसका कराहना बंद हो चुका था। होश खो चुका था वह। साँसें चल रही थीं।

'यह हमारे दायरे से बाहर का मामला है।'

'नहीं, यह जगह हमारे थाने क्षेत्र में नहीं।'

दो भागों में बँट गई पुलिस। यह तय नहीं हो पा रहा था कि किस थाने की पुलिस उसे अस्पताल तक पहुँचाए। अपनी ‍जिम्मेदारी से दोनों ग्रुप मुकर रहे थे।

'भाई आप कुछ कीजिए, आप भी खड़े हैं। पास खड़े नेताजी से मैंने अनुरोध किया।

'इसे मैं जानता हूँ। अच्छे घर का है, पावरफुल है। मेरे गाँव का ही है। मगर...।'

'मगर क्या?' फोन करके इसके घर वालों को ही बुलाइए। नहीं, इसे पहले अस्पताल ले ‍चलिए। आपका दुश्मन हो तो भी!'

दुश्मन नहीं है, मगर चुप रहो। मैं जनसेवक हूँ। कब-क्या करना है, जानता हूँ। यह वक्त चुप रहने का है।'

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उसकी साँसें बंद हो गईं। शव के अंत: परीक्षण के लिए पंचमाना बनने लगा। पुलिस हरकत में थी। भीड़ एक-एक कर खिसकती रही। नेताजी सामने आ गए।

उन्होंने दहाड़ा - 'खबरदार जो जरा भी लापरवाही हुई। यह मेरी पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता है। इसका एक्सीडेंट नहीं हुआ। विरोधी पार्टी की साजिश के तहत इसकी हत्या हुई है। मामले की उच्चस्तरीय जाँच होगी।'

नेताजी की सेवा प्रैक्टिस मेरी समझ में आ गई थी।

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