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बेटी की चाह

लघुकथा

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नरेन्द्र जोशी
ND
बेटे के रिश्ते को लेकर आए उन लोगों को लड़की बहुत पसंद आई। लड़के की माँ बोली- 'आपकी बेटी राजकुमारी जैसी लगती है। लगता है भगवान ने इसे मेरे बेटे के लिए ही बनाया है।'

लड़के की बहन बोली, 'सुख ही सुख है मेरे भाई के घर, जहाँ पाँव रखोगी माँडने मँड जाएँगे।'

लड़के के पिता ने कहा, 'घर क्या चीज है? अजी महल कहिए। नौकर-चाकर, घोड़ा-गाड़ी से लेकर और भी बहुत कुछ है इस महल में।'

कुल मिलाकर उन लोगों की बातचीत का नतीजा निकालें तो बात यूँ बनती थी कि लड़की को कुछ भी काम नहीं करना पड़ेगा। चाय भी बिस्तर पर मिलेगी। सुई तक नहीं उठाना पड़ेगी। घर का सारा काम या तो नौकर करेंगे या मशीन। उन लोगों के जाने के बाद माँ और बेटी के बीच एक सुलझी हुई बातचीत हुई। बेटी ने माँ से अधिक नहीं सिर्फ इतना ही कहा- 'तुम्हीं तो कहती हो कि बिना काम के एक मशीन रह सकती है औरत नहीं। माँ! मैं एक औरत होना चाहती हूँ।'

शाम को लड़के के पिता का फोन आया- 'कहिए क्या विचार है? बारात लेकर कब आएँ?'

'जी क्षमा करें! मेरी बेटी का कहना है वह कुछ न करने के लिए नहीं, वरन बहुत कुछ करने के लिए पैदा हुई है।' बेटी ने देखा फोन रखने के बाद उसके पिता का चेहरा गर्व से चमक रहा था।

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