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बेटी चाहिए !

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बेटी चाहिए लघुकथा
- सुषमा जुल्का

ND
लायंस क्लब 'सुरभि' की अध्यक्ष होने के नाते समाजसेवा से जुड़े कामों के लिए मुझे लोग पहचानने लगे हैं। अभी 8 मार्च को महिला दिवस पर महिलाओं के लिए जो कार्य इस क्लब ने किए, वह भी समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुआ। शायद इसीलिए उसी दिन शाम को एक महिला ने मुझे मिलने के लिए फोन किया। महिला काफी संपन्न परिवार की लगी।

उन्होंने अपना परिचय दिया। दो पुत्र हैं, जो आठवीं और पाँचवीं कक्षा में पढ़ते हैं। उनका अनुरोध था कि हमारा क्लब और विशेष रूप से 'मैं' उन्हें एक बच्ची गोद लेने में मदद करें! मैंने उन्हें उज्जैन की कुछ ऐसी संस्थाओं के पते, फोन नंबर देने की पेशकश की जो अनाथ बच्चों को संरक्षण प्रदान करती हैं। तो वे बोलीं, 'यह सब नहीं मैडम, आप मेरे पति को समझा दीजिए।

वे लड़की गोद लेने के खिलाफ हैं। पर मेरा बहुत मन है।' मैं कुछ कहती उसके पहले ही वे पुनः बोलीं- 'बेटी होगी तो घर में स्नेह, प्रेम, संस्कार, शालीनता का माहौल बनेगा। हमारे बेटे भी सभ्य, सुशील, संस्कारित होंगे। आपको नहीं लगता कि जिस घर में बेटी होती है, वहाँ बेटे भी बदतमीज, उद्दंड और हिंसात्मक नहीं होते? घर में बहन होगी तो ये लड़के लड़कियों का सम्मान करना सीखेंगे।

आपका क्या ख्याल है?' और मैं सोचने लगी कि लड़कियों के इस प्रभाव और उनकी उपस्थिति के कारण होने वाले इन मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों पर तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था।


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