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मास्टर !

लघुकथा

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- ज्योति जै
ND
शुक्ला सर अपनी ईमानदारी से काम करने की वजह से ही अधिक जाने जाते थे। फिर चाहे वह बच्चों को पढ़ाना हो या सरकारी आदेशों के चलते चुनावी कार्यक्रमों की ड्‍यूटी में कोल्हू के बैल की तरह पिसना हो।

उस दिन भी अपनी ड्‍यूटी ही कर रहे थे कि कलेक्टर महोदय आ धमके। 'वोटर लिस्ट का काम कहाँ तक पहुँचा-- लिस्ट बताओ--- फोटो वगैरह पूरे नहीं लग रहे। जैसे असंतोष जताते हुए अपने मातहत से बोले - ' ये मास्टर लोग ठीक से काम नहीं कर रहे लगता है।' जवाब शुक्ला सर ने नम्रता से दिया - 'सर! एक तो वैसे ही इन कामों में इतनी समस्याओं से रूबरू होना पड़ता है। कहीं ताला लगा है, 2-3 महीनों से उसमें रहने वाले का पता नहीं, तो लोग एक बार ‍फोटो खिंचवा चुके, वे भी परेशान करते हैं, हम छुट्‍टी नहीं ले सकते, त्योहारों पर पर भी वोटर लिस्ट के लिए बैठे रहते हैं और आप कह रहे हैं काम ठीक से नहीं कर रहे! सर! हम अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं।'

बस फिर क्या था? कलेक्टर महोदय को गुस्सा आया, आदेश निकाला - 'सस्पेंड करो साले मास्टर को! औकात ही क्या है इनकी? 'सचमुच सर! हमारी कोई औकात नहीं सस्पेंशन ऑर्डर के लिए तैयार खड़े शुक्ला सर बोले - 'लेकिन आपको इस औकात तक पहुँचने की शिक्षा देने वाला मास्टर मेरा ‍ही पिता था।'

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