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रिश्वत

लघुकथा

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रिश्वत
कविता वर्मा
ND
हर न्यूज चैनल पर अण्णा हजारे के अनशन की खबर थी। पूरा देश आंदोलित हो उठा था। नेहा ने घड़ी पर नजर डाली। 11 बज गए, विवेक अभी तक नहीं लौटे। बच्चे खाना खाकर सो गए। नेहा ने टीवी बंद कर दिया और अखबार खोलकर बैठ गई। अखबार में भी वही खबरें। एक बुजुर्ग का यूं आवाज उठाना... वह अभिभूत हो उठी। सच है आवाज तो उठानी ही होगी।

नेहा के मन में कुछ कुलबुला गया। आज विवेक से बात करूंगी। ये रोज ऑफिस के बाद यार-दोस्तों के साथ बैठना, खाना-पीना और देर से घर आना, बच्चों से तो मिलना ही नहीं होता। घर के लिए भी तो उनकी जवाबदारियां हैं।

विवेक के आने पर वह चुप ही थी, पर मन में विचार उबल रहे थे। उसकी चुप्पी को भांपते, बिस्तर पर बैठते विवेक ने उसके हाथ पर 10 हजार रु. रखे और कहा- 'तुम बहुत दिनों से शॉपिंग पर जाने का कह रही थी ना! ऐसा करो कल संडे है, तुम बच्चों को लेकर चली जाओ, मैं छोड़ दूंगा मॉल में। तुम कहो तो मैं भी चलूं, पर तुम्हें पता है मैं बोर हो जाता हूं। 2-3 घंटे सो लूंगा मैं तब तक। और हां, अपने लिए दो-तीन बढ़िया साड़ियां ले लेना। पैसों की चिंता मत करना और लगे तो मैं दे दूंगा।"

और नेहा बिना कुछ कहे भावविभोर हो विवेक के आगोश में समा गई।

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