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रैगिंग का डर

लघुकथा

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साहित्य
मंगला रामचंद्र
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बस में वे तीनों लड़के अधेड़ वय के उस कुलीन व्यक्ति से प्रेम और आदर से बातें कर रहे थे। वे सज्जन खुशी-खुशी अपने अनुभवों को बाँट रहे थे। अपने माता-पिता या घर के बुजुर्गों की बातें सुनने को दो मिनट भी समय न देने वाले आज के माहौल में युवा वर्ग का यह रूप मुझे लुभा रहा था।

तभी एक स्टॉप से मेरे परिचित बस में चढ़े और मेरे ताजातरीन कहानी की प्रशंसा करने लगे। मारे संकोच के मैं यह कोशिश कर रही थी कि बात वहीं खत्म हो जाए। तभी उन तीनों में से एक लड़के ने पूछा, 'आंटी, आप कहानियाँ लिखती हैं?'

मेरे जवाब देने से पहले ही वे सज्जन बोल उठे, 'अरे, इन्हें नहीं जानते, ये...'

तभी दूसरे लड़के ने कहा, 'आंटी, हम आपसे कहानी-लेखन के बारे में कुछ पूछना चाहते हैं।'

मैंने भी सहज कह दिया, 'हाँ-हाँ बिलकुल पूछो।'

तभी वे अधेड़ सज्जन अपने स्टॉप के आने पर बस से उतर गए।

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तीनों लड़के ठठाकर हँस पड़े, 'यार, आज अच्छा टाइम पास रहा और वो बुड्‍ढा भी खुश।' एक बोला।

दूसरे ने कहा, 'यार, ये बूढ़े इस उम्र में सठियाने लगते हैं और सेंटिमेंटल हो जाते हैं।'

तीसरा जोर से हँसते हुए बोला, 'और कभी-कभी 'मेन्टल।'

उसके बाद जब तक मेरा स्टॉप न आ गया, मैं खिड़की से बाहर देखती रही। पर हर पल मुझे अपनी रैगिंग का डर लगा रहा था।

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