- विजय चितले
'जो माँगोगे, वही मिलेगा' यह नारा, यह आश्वासन, यह कृति बिजनेस और राजनीति में दिखने में कितनी भी लुभावनी लगे, लेकिन माँगने वाले को 'क्या माँगना है', इसकी सही समझ नहीं रही। तो देने वाले कभी-कभी उसका गलत फायदा भी उठा सकते हैं।
इसका अनुभव एक भिक्षुक को कुछ दिन पहले हुआ। वैसे तो वह एक प्रोफेशनल बुजुर्ग भिक्षुक ही था। लेकिन भीख माँगने के पेशे में भी व्यावसायिक समझ जरूरी है। इस बात को वह नजरअंदाज कर गया। अपने आपको 'अपडेट' करना वह भूल गया। बदलते जमाने के साथ दूसरों को इम्प्रेस करने के लिएनई भाषा, नया लहजा, नई 'जारगॉन' उसने इस्तेमाल नहीं की।
उसके अन्य साथी, जो रेल में उसकी तरह गाने गाकर भीख माँगते थे, होशियार थे। वे नए-नए फिल्मी गाने, पॉप म्यूजिक, रिमिक्स गाने अपने-अपने ढंग से गाते और यात्रीगण उन्हें उदर निर्वाह के पैसे दे देते, लेकिनयह बेचारा भूतकाल में ही रहा। पत्थर के दो चपटे टुकड़ों से टिक-टिक-टिक-टिक बजाते वह पुराने गाने ही गाता रहा। उनमें से एक गाने ने तो उसका धंधा ही चौपट कर दिया। वह गाना था-
'पहले पैसा, फिर भगवान,
बाबू देते जाना दान देते जाना,
अट्ठन्नी या चवन्नी बाबू आना-दो आना।'
रेल में सफर करने वाले कुछ 'छद्मी, दान-शूर' मुसाफिर उसे सिर्फ अपने पास बेकार पड़े हुए 50 और 25 पैसे के सिक्के यानी अट्ठन्नी और चवन्नी ही देते- ऐसे सिक्के जिनका चलन व्यापारियों ने हमारे शहर में अघोषित, अनधिकृत तरीके से बंद करके रखा था। वह बेचारा उनसे शिकायत भी नहीं कर सका। यदि कुछ बोलता तो वे तपाक से कहते- 'अरे भाई! तू ही तो कह रहा है- अट्ठन्नी या चवन्नी दो!' और उसका मजाक उड़ाते, ठहाके लगाते चले जाते।
और धंधे में असफल, पेशेवर वह भिक्षुक उन 'भूले-बिसरे' सिक्कों को अपनी कटोरी में निहारता 'पुराना जमाना ही अच्छा था, लोग भले थे' यह सोचता, और 'याद ना जाए बीते दिनों की...' गुनगुनाने लगता और स्टेशन के नल का 'रेल-जल' पीकर अपनी भूख और प्यास मिटा लेता! बेचाराऽऽऽ...!!
तो समय के साथ हर तरीका और 'स्टाइल' भी बदलना चाहिए, यही इस किस्से का सबक है!