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स्टैंडर्ड

लघुकथा

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‍‍पिलकेन्द्र अरोरा
ND
सामने वाली बर्थ पर एक सामान्य मध्यमवर्ग की दिखने वाली बूढ़ी महिला को बैठते देखा तो दोनों मित्रों ने अपनी नाक-भौंह सिकोड़ी और आँखों ही आँखों में इशारे कर निराशा जाहिर की। ट्रेन चलने में देर थी। दोनों चाय पीने के लिए प्लेटफार्म पर उतर गए। चाय पीते हुए एक मित्र बोला-आजकल एसी का स्टैंडर्ड कितना गिर गया है। जर्नी का मजा ही नहीं रहा।

कैसे-कैसे लोग एसी में सफर करने लगे हैं। अब दो दिन के पूरे सफर में दादी अम्मा को झेलना पड़ेगा।' तभी सिग्नल हुआ। इंजन ने सायरन बचाया। दोनों दौड़कर कोच में सवार हुए। कम्पार्टमेंट में पहुँचे और देखा कि उस बूढ़ी महिला के साथ दो युवतियाँ भी हैं। उनकी सिकुड़ी हुई नाक-भौंह ने फैलना शुरू किया। आँखों ही आँखों में आशा का संचार होने लगा और एसी का स्टैंडर्ड धीरे-धीरे बढ़ने लगा...।

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