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सनातन धर्म: मूर्ति प्रतिष्ठा का महत्व

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सनातन धर्म
- डॉ. गोविन्द बल्लभ जोशी
सनातन धर्म में देव उपासना के लिए प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान में विशेष पूजा की जाती है। स्थापित करने से पहले सर्वतोभद्र, षोडश मातृका, एवं नवग्रह पीठ स्थापित कर गणेश पूजन एवं कलश स्थापना के साथ विधिवत्‌ पूजन किया जाता है, लगभग एक सप्ताह तक चलने वाले इस अनुष्ठान में की शोभा दर्शनीय होती है। 
 
पीठ पर अधिष्ठित आह्वाहित देवताओं के पूजन के बाद पहले दिन देव प्रतिमाओं का जलधिवास कराया जाता है। यानी उस रात मूर्तियों को जल से भरे हुए विशाल पात्रों में शयन कराया जाता है। दूसरे दिन गेहूँ, धान आदि अन्न के भंडार में ढँककर अन्नाधिवास होता है। इसी प्रकार तीसरे दिन फलाधिवास, चौथे दिन घृत में आवास पाँचवे दिन शय्याधिवास का क्रम पूरा करने के बाद नेत्रोनन्मीलन अर्थात्‌ नेत्र उद्घाटन के लिए मंत्र पाठ करने के बाद अभिषेक पूर्वक षोडशोपचार पूजन संपन्न कर देव प्रतिमाओं को यथा स्थान प्रतिष्ठित कर दिया जाता है। 
 
मूर्ति प्रतिष्ठा मंदिरों एवं घर के पूजा स्थल दोनों जगह की जाती है लेकिन दोनों में अंतर है। मंदिर में कई फुट ऊँची विशालकाय मूर्तियों का महत्व केवल श्रद्धा एवं आकर्षण उत्पन्न करने के लिए तो उचित है लेकिन पूजन के लिए छोटी प्रतिमाओं का ही महत्व शास्त्रों में कहा गया है अर्थात्‌ बैठकर या खड़े होकर जिन मूर्तियों का आसानी से श्रृंगार एवं पूजन किया जा सकता है वही फलदायी होती है इसके विपरीत विराट मूर्तियों का किया जाने वाला पूजन निष्फल माना गया है। 
 
देव प्रतिमाओं एवं पूजन उपकरणों की संख्या का भी विचार बहुत आवश्यक माना गया है। इस बारे में ज्योतिषापीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य माधवाम जी महाराज का कहना है कि शास्त्रों के अनुसार ही आचरण करना सनातन धर्म का सिद्धांत है। घर पर दो शिव लिंग, दो शालिग्राम, दो गोमती चक्र दो सूर्य की प्रतिमाएँ, दुर्गा जी की तीन प्रतिमाएँ, गणेश जी की तीन प्रतिमाएँ, तथा दो शंख एक ही घर में स्थापित नहीं होने चाहिए। 
 
इसी प्रकार खण्डित (टूटी-फूटी) प्रतिमाएँ, जले-कटे पूजा उपकरण भी पूजा स्थल से हटाकर विसर्जित कर देने चाहिए। यदि किसी प्रतिमा के कोई उप अंग टूट गए हों और उन्हें विसर्जित न करना चाहें तो उसी जाति के पत्थर, या धातु जिससे प्रतिमा का निर्माण हुआ हो विशेष पूजा अनुष्ठान द्वारा अंग पूर्ति की जा सकती है। इसी प्रकार देव मंदिरों में स्थिर प्रतिमाएँ एवं उत्सव (चल) मूर्तियाँ दोनों की प्रतिष्ठा आवश्यक है क्योंकि उत्सव एवं शोभायात्रा आदि के समय चल प्रतिमाओं से ही उत्सव पूजन की संपन्नता संभव होती है। 
 
प्रतिमाओं के पूजन के समय दिशाओं का भी महत्व है। स्थिर प्रतिमाओं का पूजन उनके संम्मुख होकर किया जाता है तो उत्सव अथवा चल प्रतिमाओं का पूजन हमेशा पूर्व की ओर मुख कर ही करना शास्त्रों में बताया है। इसी प्रकार देव प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा उत्तरायण में, माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख एवं श्रेष्ठ महीनों में प्राण प्रतिष्ठा का मुहूर्त देखकर करनी चाहिए। 
 
मूर्ति के प्रतिष्ठित हो जाने पर यांगोपांग सपरिकर यथासंभव अधिकाधिक उपचारों से पूजन एवं अलंकारों से अलंकृत करने का विधान है। प्रतिष्ठा के बाद देवता के निमित्त सभी प्रकार के पूजोपकरण पार्षद और आयुधादि के धारण के बाद प्रतिदिन तीनों काल में पूजन अर्चन तथा भोग प्रसाद की समुचित व्यवस्था करनी पड़ती है। विशेष महोत्सवों पर आराधना उपासना तथा अनेक मांगलिक आयोजन करने चाहिए।
 
इससे सिद्ध होता है कि देवोपासना के लिए सनातन धर्म का एक सबल आधार मूर्ति पूजा है और इसका अंग होने के कारण मूर्ति प्रतिष्ठा भी उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है। मूर्तियों में मंत्रों की शक्ति से जब प्राण प्रतिष्ठा होती है तो उनमें देवत्व का प्रवेश होता है जो विधिवत पूजा से फलदायी होती हैं।

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