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हिन्दू धर्म : ये दस चमत्कारिक पत्तियां

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Hinduism: The ten wondrous leaves हिन्दू धर्म
वैदिक ऋषियों और आयुर्वेद के जानकारों ने जीवन की सुख और समृद्धि के कई उपाय ढूंढे थे। इसके लिए उन्होंने समुद्र, रेगिस्तान, हिमालय और जंगल के हर तरह के रहस्य को जाना और फिर उन्होंने ऐसी चीजें ढूंढी जिसके दम पर व्यक्ति अजर-अमर ही नहीं रह सकता है बल्कि सुख और समृद्धि भी पा सकता है।


 
ईश्वर के बाद हिन्दू धर्म में प्रकृति को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है, क्योंकि प्रकृति से वह सब कुछ पाया जा सकता है, जो हम पाना चाहते हैं। एक और मनुष्य प्रकृति का बेहिसाब और अनावश्यक दोहन कर रहा है, तो दूसरी ओर वह प्रकृति को नष्ट करने का कार्य भी कर रहा है। इसका परिणाम भी हमें देखने को मिल रहा है।
 
शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति अपने घर के आसपास एक पीपल, एक नीम, दस इमली, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह पुण्यात्मा होता है और कभी नरक के दर्शन नहीं करता। इसी तरह धर्मशास्त्रों में सभी तरह से वृक्ष सहित प्रकृति के सभी तत्वों के महत्व की विवेचना की गई है। इन पत्तों का धर्मशास्त्रों में उल्लेख ही नहीं मिलता बल्कि इनके पौधों या वृक्षों की पूजा करने का विधान भी है। 
 
आओ जानते हैं हम उन दस पौधों या वृक्षों के उन पत्तों के बारे में जिनका सेवन करने से हर तरह की बीमारी से ही बचा नहीं जा सकता बल्कि सुखी, शांतिपूर्ण और सकारात्मक मस्तिष्क भी हासिल किया जा सकता है। अंत में बताएंगे हम आपको एक ऐसे चमत्कारिक पत्ते के बारे में जिसे जानकर आप हैरान हो जाएंगे।
 
 
अगले पन्ने पर पहला पत्ता...
 

 
तुलसी : तुलसी प्रत्येक हिन्दू के घर में होना जरूरी है। तुलसी के पौधे का हिन्दू धर्म में बहुत ही ज्यादा महत्व बताया गया है। यह एक चमत्कारिक पौधा है। धर्मशास्त्रों में इसके गुणों और इसकी महानता का वर्णन मिलता है। दूषित पानी में तुलसी की कुछ ताजी पत्तियां डालने से पानी का शुद्धिकरण किया जा सकता है। तांबे के लोटे में एक तुलसी का पत्ता डालकर ही रखना चाहिए। तांबा और तुलसी दोनों ही पानी को शुद्ध करने की क्षमता रखते हैं।
 
 
इसके नियमित सेवन से भारी व्यक्ति का वजन घटता है एवं पतले व्यक्ति का वजन बढ़ता है। रोजाना सुबह पानी के साथ तुलसी की 5 पत्तियां निगलने से कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों एवं दिमाग की कमजोरी से बचा जा सकता है। जो व्यक्ति प्रतिदिन तुलसी की मात्र 5 पत्तियां खाता है, वह कई बीमारियों से बच सकता है। हाल ही कि वैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि तुलसी के सेवन से कैंसर से बचा जा सकता है।
 
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नीम का पत्ता : नीम का पेड़ यदि आपके घर के आस-पास लगा है तो आप हर तरह के बुखार और संक्रमण से बचे रहेंगे। सभी तरह के चर्म रोग से नीम का रस बचाता है। नीम के पत्ते चबाने से मुंह, दांत और आंत के रोग तो दूर होते ही हैं, साथ ही इसके रस से रक्त भी साफ रहता है।
 
नीम के तेल से मालिश करने से विभिन्न प्रकार के चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। नीम की पत्तियों को उबालकर और पानी ठंडा करके नहाया जाए तो उससे भी बहुत फायदा होता है। नीम का रोज एक पत्ता चबाते रहने से कभी भी कैंसर नहीं होता। 
 
मीठी नीम का पत्ता तो खाने में स्वाद बढ़ाने में ही लाभदायक नहीं होता बल्कि यह कई तरह के औषधीय गुणों से परिपूर्ण है।
 
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कढ़ी पत्ता : कढ़ी पत्ता अक्सर कढ़ी में डलता है। इसके खाने में जायका बढ़ जाता है। अधिकतर महाराष्ट्रीयन घरों में इसका पेड़ मिल जाएगा। यह खुशबूदार पत्ता होता है। इसको खाने से बाल काले और मजबूत रहते हैं। इसके पत्ते कुछ-कुछ नीम की तरह होते है।
 
दक्षिण भारत व पश्चिमी-तट के राज्यों और श्रीलंका के व्यंजनों के छौंक में, खासकर रसेदार व्यंजनों में बिलकुल तेजपत्तों की तरह इसकी पत्तियों का उपयोग बहुत महत्व रखता है। इसे काला नीम भी कहते हैं। कढ़ी पत्ता लंबे और स्वस्थ बालों के लिए भी बहुत लाभकारी माना जाता है।
 
कढ़ी पत्ता पेट संबंधी रोगों में भी अत्यंत लाभदायक है। इसकी जड़ का इस्तेमाल आंखों और किडनी के रोग के लिए होता है। कई कारणों से हिन्दू धर्म में इसका पेड़ लगाने की हिदायत दी गई है।
 
कढ़ी पत्ते में मौजूद आयरन, जिंक और कॉपर जैसे मिनरल न सिर्फ अग्नाशय की बीटा-कोशिकाओं को सक्रिय करते हैं, बल्कि उन्हें नष्ट होने से भी बचाते हैं। इससे ये कोशिकाएं इंसुलिन का उत्पादन तेज कर देती हैं। डायबिटीज पीड़ितों के लिए रोज सुबह खाली पेट 8-10 कढ़ी पत्ते चबाना फायदेमंद है।
 
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बिल्वपत्र : बिल्व अथवा बेल (बिल्ला) विश्व के कई हिस्सों में पाया जाने वाला वृक्ष है। भारत में इस वृक्ष का पीपल, नीम, आम, पारिजात और पलाश आदि वृक्षों के समान ही बहुत अधिक सम्मान है। हिन्दू धर्म में बिल्व वृक्ष भगवान शिव की आराधना का मुख्य अंग है। 
 
बिल्व वृक्ष की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शरबत बड़ा ही लाभकारी होता है। यह शरबत कुपचन, आंखों की रोशनी में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए उत्तम है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों में टैनिन, लौह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नीशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं।
 
नीम और तुलसी के 5-5 पत्तों के साथ बेल की 5 पत्तियों को मिलाकर कूट लें और इसकी एक गोली बनाकर प्रतिदिन खाने से कैंसर में लाभ मिलता है।
 
बेल के पत्तों को पानी में पीसकर माथे पर लेप करने से मस्तिष्क की गर्मी शांत होती है तथा नींद खूब आती है। बेल की पत्तियां 15 नग, बादाम की गिरियां 2 नग तथा मिश्री 250 ग्राम को मिलाकर, पीसकर आंच पर पका लें। जब शरबत की तरह बन जाए तो उतारकर ठंडा करके पीते रहने से एक माह के अंदर ही नपुंसकता दूर हो जाती है। मंद आंच पर बेल की पत्तियों को भूनकर बारीक पीसकर कपड़े से छान लें और शीशी में भरकर रख लें। 1 ग्राम की मात्रा में प्रातः-सायं शहद के साथ मिलाकर चाटते रहने से कुकर खांसी (हूपिंग कफ) में आराम मिलता है।
 
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पान का पत्ता : पान का पेड़ पतली जड़ों द्वारा चढ़ाई गई एक बारहमासी लता होती है। पान के पेड़ की पत्तियां दिल के आकार की चिकनी, चमकीली और नुकीले सिरे के साथ लंबी डंठल वाली होती हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में 'पान-सुपारी' शिष्टाचार के रूप में मेहमानों को दी जाती है। पहले पान के साथ चूने, सुपारी या कत्थे का उपयोग नहीं होता था। मध्यकाल में पान खाने का प्रचलन बढ़ने लगा और अब इसे चूने, कत्थे के साथ ही लोग तंबाकू मिलाकर भी खाने लगे हैं, जो कि बहुत ही नुकसानदायक है।
 
पान का प्रयोग 2,000 वर्ष पहले से होता आ रहा है। पान के बारे में सबसे प्राचीन वर्णन श्रीलंका की ऐतिहासिक पुस्‍तक महावस्‍मा (जिसे दुनिया की सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक पाली में लिखा गया) मिलता है। प्राचीनकाल से पान की पत्तियों का उपयोग धार्मिक कार्यों में भी किया जाता रहा है। हनुमानजी को पान का बीड़ा बनाकर अर्पित किया जाता है। 
 
पान के फायदे : प्राचीनकाल में पान का इस्तेमाल रक्तस्राव को रोकने के लिए किया जाता था। इसे खाने से भीतर कहीं बह रहा खून भी रुक जाता है। अगर पान के कुछ पत्‍तों का रस चोट पर लगाएं और पान का पत्‍ता रखकर पट्टी बांध दें, तो चोट 2-3 दिन में ठीक हो जाती है। यह कामोत्तजना के लिए भी इस्तेमाल किया जाता रहा है।
 
दूध के साथ पान का रस लिया जाए, तो पेशाब की रुकावट दूर हो जाती है। सरसों के तेल में भीगे हुए और गरम किए हुए पान के पत्ते लगाने से खांसी और सांस लेने में कठिनाई से मदद मिलती है। कब्ज और मधुमेह में भी पान का रस लाभदायक है।
 
अगले पन्ने पर छठा पत्ता...
 
 

तेजपत्ता : आमतौर पर इसका प्रयोग भारतीय सब्जी में मसाले के रूप में किया जाता है, परंतु यह एक अत्यंत गुणकारी औषधि भी है। आजकल लोग तेजपान पत्ते अर्थात खड़ा मसाला छोड़कर ‍पीसा हुआ गर्म मसाला प्रयोग करते हैं, जो कि हानिकारक है।
 
तेजपत्ता अत्यंत गर्म एवं उत्तेजक होता है इसीलिए यह यौन-शक्ति वृद्घि करने में लाभदायक है। यह गठिया रोग, उदर शूल एवं अपच संबंधी पेट के रोगों में भी लाभदायक है। इसके सेवन से भूख खुलकर लगती है। मूत्र विकार में भी यह लाभदायक है। तेजपत्ते के चूर्ण का हर तीसरे या चौथे दिन मंजन करने से दांत चमकने लगते हैं एवं कीड़े लगने का भय नहीं रहता।
 
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केले का पत्ता : केले का पत्ता हर धार्मिक कार्य में इस्तेमाल किया जाता रहा है। केले का पेड़ काफी पवित्र माना जाता है। भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को केले का भोग लगाया जाता है। केले के पत्तों में प्रसाद बांटा जाता है। माना जाता है कि समृद्धि के लिए केले के पेड़ की पूजा अच्छी होती है।
 
केला रोचक, मधुर, शक्तिशाली, वीर्य व मांस बढ़ाने वाला, नेत्रदोष में हितकारी है। पके केले के नियमित सेवन से शरीर पुष्ट होता है। यह कफ, रक्तपित, वात और प्रदर के उपद्रवों को नष्ट करता है।
 
केले में मुख्यतः विटामिन ए, विटामिन सी, थायमिन, राइबोफ्लेविन, नियासिन तथा अन्य खनिज तत्व होते हैं। इसमें जल का अंश 64.3 प्रतिशत, प्रोटीन 1.3 प्रतिशत, कार्बोहाईड्रेट 24.7 प्रतिशत तथा चिकनाई 8.3 प्रतिशत है।
 
केले के पत्ते का ज्यूस भी एक बेहतरीन डिटॉक्सिफाइंग ज्यूस है। इसे केले पत्ते को पीसकर इसमें कुछ बूंद नींबू, एक चम्मच पीसा हुआ अदरक और थोड़े खीरे से तैयार किया जाता है। यह ज्यूस बहुत ही अच्छा डिटॉक्सिफाइंग एजेंट है और इसका सेवन सुबह में करना चाहिए।
 
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आम के पत्ते : अक्सर मांगलिक कार्यों में आम के पत्तों का इस्तेमाल मंडप, कलश आदि सजाने के कार्यों में किया जाता है। इसके पत्तों से द्वार, दीवार, यज्ञ आदि स्थानों को भी सजाया जाता है।
 
तोरण, बांस के खंभे आदि में भी आम की पत्तियां लगाने की परंपरा है। घर के मुख्य द्वार पर आम की पत्तियां लटकाने से घर में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति के प्रवेश करने के साथ ही सकारात्मक ऊर्जा घर में आती है।
 
आम के पेड़ की लकड़ियों का उपयोग समिधा के रूप में वैदिक काल से ही किया जा रहा है। माना जाता है कि आम की लकड़ी, घी, हवन सामग्री आदि के हवन में प्रयोग से वातावरण में सकारात्मकता बढ़ती है। 
 
वैज्ञानिक दृष्टि के अनुसार आम के पत्तों में डायबिटीज को दूर करने की क्षमता है। कैंसर और पाचन से संबंधित रोग में भी आम का पत्ता गुणकारी होता है। आमतौर जब आप किसी उत्सव अथवा पूजा-पाठ का आयोजन करते हैं तब चिंता और तनाव बढ़ जाता है कि काम सफलतापूर्वक पूरा हो पाएगा या नहीं। आम के पत्तों में मौजूद विभिन्न तत्व चिंता और तनाव को दूर करने में सहायक होते हैं इसलिए भी मांगलिक कार्यों में आम के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। इसमें भरपूर मात्रा में सकारात्मक एनर्जी होती है, जो हमारे मस्तिष्क को खुशियों से भर देती है।
 
विशेषज्ञ डायबिटीज के मरीजों को आम के सेवन से बचने की सलाह देते हैं, लेकिन इसकी पत्तियां बीमारी की रोकथाम में अहम भूमिका निभा सकती है। दरअसल, आम की पत्तियां ग्लूकोज सोखने की आंत की क्षमता घटाती है। इससे खून में शुगर का स्तर नियंत्रित रहता है। आम की पत्तियां सुखाकर पाउडर बना लें। खाने से 1 घंटे पहले पानी में आधा चम्मच घोलकर पीएं।
 
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जामुन की पत्तियां : प्राचीन भारतीय उपमहाद्वीप को पहले जम्बूद्वीप कहा जाता था, क्योंकि यहां जामुन के पेड़ अधिक पाए जाते थे। जामुन का पेड़ पहले हर भारतीय के घर-आंगन में होता था। अब आंगन ही नहीं रहे। आजकल जामुन और बेर के पेड़ को देखना दुर्लभ है।
 
भारत, ब्रिटेन और अमेरिका में हुए कई अध्ययनों में जामुन की पत्ती में मौजूद ‘माइरिलिन’ नाम के यौगिक को खून में शुगर का स्तर घटाने में कारगर पाया गया है। विशेषज्ञ ब्लड शुगर बढ़ने पर सुबह जामुन की 4 से 5 पत्तियां पीसकर पीने की सलाह देते हैं। शुगर काबू में आ जाए तो इसका सेवन बंद कर दें।
 
अंत में जानिए एक चमत्कारिक पत्ती...
 
 
 

सोम की पत्तियां : सोम की लताओं से निकले रस को सोमरस कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि यह न तो भांग है और न ही किसी प्रकार की नशे की पत्तियां। सोम लताएं पर्वत श्रृंखलाओं में पाई जाती हैं। राजस्थान के अर्बुद, उड़ीसा के महेन्द्र गिरि, विंध्याचल, मलय आदि अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी लताओं के पाए जाने के जिक्र है। कुछ विद्वान मानते हैं कि अफगानिस्तान की पहाड़ियों पर ही सोम का पौधा पाया जाता है। यह गहरे बादामी रंग का पौधा है।
 
अध्ययनों से पता चलता है कि वैदिक काल के बाद यानी ईसा के काफी पहले ही इस वनस्पति की पहचान मुश्किल होती गई। ऐसा भी कहा जाता है कि सोम (होम) अनुष्ठान करने वाले लोगों ने इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं दी, उसे अपने तक ही सीमित रखा और कालांतर में ऐसे अनुष्ठानी लोगों की पीढ़ी/परंपरा के लुप्त होने के साथ ही सोम की पहचान भी मुश्किल होती गई।
 
'संजीवनी बूटी' : कुछ विद्वान इसे ही 'संजीवनी बूटी' कहते हैं। सोम को न पहचान पाने की विवशता का वर्णन रामायण में मिलता है। हनुमान दो बार हिमालय जाते हैं, एक बार राम और लक्ष्मण दोनों की मूर्छा पर और एक बार केवल लक्ष्मण की मूर्छा पर, मगर 'सोम' की पहचान न होने पर पूरा पर्वत ही उखाड़ लाते हैं। दोनों बार लंका के वैद्य सुषेण ही असली सोम की पहचान कर पाते हैं।
 
इफेड्रा : कुछ वर्ष पहले ईरान में इफेड्रा नामक पौधे की पहचान कुछ लोग सोम से करते थे। इफेड्रा की छोटी-छोटी टहनियां बर्तनों में दक्षिण-पूर्वी तुर्कमेनिस्तान में तोगोलोक-21 नामक मंदिर परिसर में पाई गई हैं। इन बर्तनों का व्यवहार सोमपान के अनुष्ठान में होता था। यद्यपि इस निर्णायक साक्ष्य के लिए खोज जारी है। हालांकि लोग इसका इस्तेमाल यौनवर्धक दवाई के रूप में करते हैं।
 
वैदिक ऋषियों का चमत्कारी आविष्कार- सोमरस एक ऐसा पदार्थ है, जो संजीवनी की तरह कार्य करता है। यह जहां व्यक्ति की जवानी बरकरार रखता है वहीं यह पूर्ण सात्विक, अत्यंत बलवर्धक, आयुवर्धक व भोजन-विष के प्रभाव को नष्ट करने वाली औषधि है।
 

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