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न्याय के देवता शनि...

शनिदेव को प्रिय है शनिश्चरी अमावस्या

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शनि अमावस्या
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तम्‌ नमामि शनैश्चरम्‌

शास्त्रों में उल्लेख है कि न्याय के देवता शनिदेव शनिश्चरी अमावस्या को सभी को अभय प्रदान करते हैं। सनातन संस्कृति में अमावस्या का विशेष महत्व है और अमावस्या अगर शनिवार के दिन पड़े तो इसका मतलब सोने पर सुहागा से कम नहीं।

जिन जातकों की जन्मकुंडली में शनि की साढ़ेसाती व ढैया का प्रभाव है वे शनिश्चरी अमावस्या पर शनिदेव का विधिवत पूजन कर शांति व अच्छे फल प्राप्त करने के लिए पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं।

शनिदेव को अमावस्या अधिक प्रिय है। शनिदेव का रंग श्यामवर्ण है और अमावस्या की रात्रि भी काली होती है। दोनों के ही गुणधर्म एक समान हैं। इसलिए अमावस्या पर शनिदेव का पूजन शास्त्री, आचार्य, तांत्रिक विशेष रूप से करते हैं।

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शनिचरी अमावस्या के दिन भगवान शनि की आराधना करते हुए 'छाया मार्तंड संभूतम्‌, तम्‌ नमामि शनैश्चरम्' मंत्रोच्चार के जाप से मनुष्य को सुख, शांति व समृद्धि की प्रा‍प्ति होगी।

शनि की साढ़ेसाती व ढैया से प्रभावित लोगों को शनि महाराज को खुश करने के लिए दान-पुण्य के साथ-साथ उनके मंत्रों का जाप करना जरूरी है। खास तौर पर गरीबों को बांटे गए कंबल, असहायों को भोजन कराना, इमरती खिलाना, दान दक्षिणा देने जैसे कार्य करने से शनि की दृष्टि से प्रभावित भक्तों के कष्ट दूर होकर उन्हें सुख के अवसर प्राप्त होते हैं।

शनि पीड़ा से मुक्ति के उपाय : -
- शनिवार को आनेवाली अमावस्या को पीपल वृक्ष की पूजा करने, सात परिक्रमा करके काले तिल से युक्त सरसों के तेल का दीपक जलाकर छायादान करने से भी शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

- अनुराधा नक्षत्र से युक्त शनिवार की अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष के पूजन से शनि पीड़ा से व्यक्ति मुक्त हो जाता है।

- इसी प्रकार श्रावण मास में अमावस्या की समाप्ति पर पीपल वृक्ष के नीचे शनिवार के दिन हनुमान की पूजा करने से सभी तरह के संकट से मुक्ति मिल जाती है।

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