Festival Posters

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि त्योहार होली

Advertiesment
हमें फॉलो करें Happy Holi 2016
- श्याम नारायण रंगा 'अभिमन्यु'

भारत त्योहारों का देश है और ये त्योहार भारतीय जनमानस पर अपना गहरे तक अमिट प्रभाव रखते हैं। भारतीय त्योहारों के पीछे समृद्ध इतिहास है और वैज्ञानिकता भी। होली को भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि त्योहार कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

होली के अवसर पर उमंग, उल्लास, मस्ती अपने पूरे परवान पर होती है और होली का त्योहार पूरे देश में मनाया जाता है। फसल कटने के बाद मनाया जाने वाला यह त्योहार नववर्ष के आगमन और गत वर्ष की विदाई का प्रतीक है।


webdunia

 
आइए जानते हैं होली से जुड़े कुछ तथ्य
 
होलाष्टक 8 दिन का समय। ऐसा समय जिसमें शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं। कभी सोचा है कि आखिर होलाष्टक के समय शुभ कार्य क्यों वर्जित हैं और ये समय 8 दिन का ही क्यों होता है, क्यों होली के त्योहार पर अश्लील बोलने की परंपरा है, क्या है होली के पीछे का ये राज, क्यों मनाई जाती है होली, आखिर होली के पर्व पर क्यों लगाया जाता है रंग। ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब आपको इस आलेख में पढ़ने को मिलेंगे।

सनातन धर्म कलैंडर का आखिरी महीना फाल्गुन। इस महीने के आखिरी 8 दिन मतलब फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर होलिकादहन पूर्णिमा तक का समय होलाष्टक का समय होता है। हो ली मतलब होली का सामान्य अर्थ देखें तो होता है, जो होना था हो गया अब नया साल शुरू होने वाला है इसलिए सब वैर-भाव को भूलाकर नए जीवन की शुरुआत की जाए। इसलिए होली नववर्ष के स्वागत, वसंत ऋतु के स्वागत और गत वर्ष की विदाई का त्योहार भी है।

 
आगे पढ़ें क्यों नहीं होते शुभ कार्य... 


 
webdunia

 

क्यों नहीं होते शुभ कार्य?
 
होलाष्टक के दौरान गृह प्रवेश, व्यवसाय का मुहुर्त, गर्भाधान, शादी, यज्ञोपवीत संस्कार सहित कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। ऐसा क्यों है इसके पीछे एक पौराणिक कहानी है। भगवान शिव ने प्रेम और काम के देवता कामदेव को उनकी धृष्टता से क्रोधित होकर फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को भस्म कर दिया था। संसार में काम के ही समाप्त होने से शोक ही लहर फैल गई और सारा जगत शोक में डूब गया। कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शिव से क्षमा-याचना की और अपने पति को पुनः जीवित करने की प्रार्थना की।

ऐसा माना जाता है कि धुलेंडी के दिन यह शोक 8 दिन बाद समाप्त हुआ और कामदेव और रति का मिलन हुआ। इसी कारण ये 8 दिन शोक के रहे और आज तक ये 8 दिन शोक के रूप में मनाए जाते हैं और कोई भी शुभ कार्य नहीं होता और यही कारण माना जाता है कि जब 8 दिन बाद काम और रति का मिलन हुआ तो जगत में काम को उत्साह से पर्व के रूप में मनाया गया।

आज भी रति के विलाप को लोक-संगीत के रूप में गाया जाता है और चंदन की लकड़ी का अग्निदान किया जाता है ताकि कामदेव को भस्म होने में पीड़ा न हो। साथ ही बाद में कामदेव के जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार मनाया जाता है। होली का पर्व काम का मदनोत्सव हो गया और इसी दिन से होली पर अश्लील बोलने की परंपरा भी शुरू हुई होगी। इसी कारण होली का एक नाम काम उत्सव भी है। इसे वसंतोत्सव भी कहते हैं। 

इसी के साथ अगर ज्योतिष शास्त्र की मानें तो अष्टमी को चन्द्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र रूप लिए हुए होते हैं। इन 8 दिनों में जब एक-एक करके ग्रह उग्र रूप में होते हैं तो व्यक्ति की निर्णय क्षमता पर प्रभाव डालते हैं और इसीलिए नकारात्मक प्रभाव का असर जीवन में न हो तो शुभ कार्यों को वर्जित कर दिया गया है।

इसी के साथ यह भी मान्यता है कि पौराणिक काल में राक्षस हिरण्यकश्यप ने अपने विष्णु भक्त पुत्र भक्त प्रहलाद को विष्णु की आराधना करने से काफी प्रयास करके रोकना चाहा लेकिन भक्त प्रहलाद ने अपने पिता की बात नहीं मानी और भक्ति के मार्ग पर चलते रहे। इससे रुष्ट होकर हिरण्यकश्यप ने फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को प्रहलाद को बंदी बना लिया और 7 दिन तक प्रहलाद को तरह-तरह की यातनाएं देता रहा। फिर भी प्रहलाद नहीं माना तो 8वें दिन प्रहलाद को लेकर होलिका अग्नि में बैठी और प्रहलाद को जलाने का प्रयास किया। इसमें प्रहलाद को बच गया, पर होलिका जल गई और तभी से यह 8 दिन का त्योहार मनाया जाना शुरू हुआ और भक्त प्रहलाद की याद में इन 8 दिनों को शोक के मानकर कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता।

आगे पढ़ें होली क्यों मनाई जाती है... 
 
webdunia

 
क्यों मनाई जाती है होली?
 
होली के त्योहार को लेकर भक्त प्रहलाद और उसकी बुआ होलिका को लेकर कथा जगप्रसिद्ध है कि होलिका ने अपने भाई हिरण्यकश्यप के कहने पर अपने भतीजे विष्णु भक्त प्रहलाद को जलाने के लिए अपने को मिले अग्नि स्नान के वरदान के कारण अग्नि का स्नान किया। 
 
चूंकि होलिका स्त्री थी और भगवान को भक्त प्रहलाद को बचाना था इसलिए वहां उपस्थित ब्राह्मणों ने होलिका का ध्यान भंग करने के लिए अश्लील बोलना शुरू कर दिया और होलिका का ध्यान भंग हुआ। इस कारण होलिका तो जल गई और भक्त प्रहलाद को बचा लिया गया। इसी की याद में होली का त्योहार मनाया जाता है और होली के दिन अश्लील बोला जाता है। 
 
इसी के साथ यह भी बात जानने में आती है कि भगवान कृष्ण ने पूतना राक्षसी का वध फाल्गुन मास की पूर्णिमा को ही किया था और इसी की याद में होली का त्योहार मनाया जाता है। साथ ही यह भी तथ्य जानने में आता है कि भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ 8 दिन तक होली खेली और रास रचाया, 8वें दिन गोपिकाओं और कृष्ण ने रंग से सने अपने कपड़े अग्नि को समर्पित कर दिए और तब से 8 दिन का यह पर्व मनाया जाने लगा। 

होली को लेकर राक्षसी ढूंढी की भी एक कथा प्रचलित है। राजा पृथु के समय के समय में ढुंढी नामक एक कुटिल राक्षसी थी। वह अबोध बालकों को खा जाती थी। अनेक प्रकार के जप-तप से उसने बहुत से देवताओं को प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई भी देवता, मानव, अस्त्र या शस्त्र नहीं मार सकेगा, न ही उस पर सर्दी, गर्मी और वर्षा का ही कोई असर होगा।
 
इस वरदान के बाद उसका अत्याचार बढ़ गया, क्योंकि उसको मारना असंभव था। लेकिन शिव के एक शाप के कारण बच्चों की शरारतों से वह मुक्त नहीं थी। राजा पृथु ने ढुंढी के अत्याचारों से तंग आकर राजपुरोहित से उससे छुटकारा पाने का उपाय पूछा। 

पुरोहित ने कहा कि यदि फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन जब न अधिक सर्दी होगी और न गर्मी, तब सब बच्चे एक-एक लकड़ी लेकर अपने घर से निकलें। उसे एक जगह पर रखें और घास-फूस रखकर जला दें। ऊंचे स्वर में तालियां बजाते हुए मंत्र पढ़ें और अग्नि की प्रदक्षिणा करें। जोर-जोर से हंसें, गाएं, चिल्लाएं और शोर करें। तो राक्षसी मर जाएगी। 
 
पुरोहित की सलाह का पालन किया गया और जब ढुंढी इतने सारे बच्चों को देखकर अग्नि के समीप आई तो बच्चों ने एक समूह बनाकर नगाड़े बजाते हुए ढुंढी को घेरा, धूल और कीचड़ फेंकते हुए उसको शोरगुल करते हुए नगर के बाहर खदेड़ दिया। कहते हैं कि इसी परंपरा का पालन करते हुए आज भी होली पर बच्चे शोरगुल और गाना बजाना करते हैं।

आगे पढ़ें क्यों लगाते हैं होली पर रंग?
 
webdunia

 

क्यों लगाते हैं होली के अवसर पर रंग?
 
होली पर रंग लगाने को लेकर भी लोक में कई बातें प्रचलित हैं। एक बात यह है कि भगवान कृष्ण का रंग सांवला था और राधा गोरी थी। यह बात भगवान रोज अपनी मां यशोदा से पूछते कि राधा गोरी क्यूं है। एक दिन मां यशोदा ने कृष्ण को कहा कि तुम जिस रूप में राधा को देखना चाहते हो वो रंग राधा के मुंह पर लगा दो। तो भगवान कृष्ण काला रंग राधा के मुंह पर लगाने के लिए चल दिए और राधा का मुंह रंग दिया। कृष्ण का नटखट स्वभाव था कि कृष्ण ने अन्य गोपियों को भी रंग लगाया फिर यह कृष्ण की लीला सबको मन भाई और तब से एक-दूसरे को रंग लगाने का प्रचलन शुरू हो गया। 

इसी के साथ यह बात भी प्रचलित है कि होलिका की शादी राजकुमार ईलोजी से होने वाली भी, परंतु जब ईलोजी बारात लेकर आए तब तक होलिका जलकर राख हो चुकी थी। चूंकि ईलोजी होली को बहुत प्रेम करते थे इसलिए विरह में व्याकुल होकर ईलोजी ने होली की राख को अपने शरीर पर लगा लिया और विरह में व्याकुल हो गए। 

कालांतर में इन्हीं ईलोजी को लोक देवता के रूप में मान्यता मिली और आज भी राजस्थान की लोक कथाओं में ईलोजी का महत्वपूर्ण स्थान है। जोधपुर, बीकानेर सहित पूरे पश्चिमी राजस्थान में होली के अवसर पर ईलोजी की पूजा होती है। ईलोजी द्वारा राख लगाने की यह परंपरा कालांतर में रंगों में परिवर्तित हो गई।

आगे पढ़ें होली का वर्तमान समय में जैविक महत्व
 
webdunia

 

होली का वर्तमान समय में जैविक महत्व
 
होली का त्योहार अपने आप में स्वप्रमाणित जैविक महत्व रखता है। यह हमारे शरीर और मन पर बहुत लाभकारी प्रभाव डालता है, यह बहुत आनंद और मस्ती लाता है। होली उत्सव का समय वैज्ञानिक रूप से सही होने का अनुमान है। यह गर्मी के मौसम की शुरुआत और सर्दियों के मौसम के अंत में मनाया जाता है, जब लोग स्वाभाविक रूप से अपने को आलसी और थका हुआ महसूस करते है। तो इस समय होली शरीर की शिथिलता को प्रतिक्रिया करने के लिए बहुत-सी गतिविधियां और खुशी लाती है। यह रंग खेलने, स्वादिष्ट व्यंजन खाने और परिवार के बड़ों से आशीर्वाद लेने से शरीर को बेहतर महसूस कराती है।
 
होली के त्योहार पर होलिकादहन की परंपरा है। वैज्ञानिक रूप से यह वातावरण को सुरक्षित और स्वच्छ बनाती है, क्योंकि सर्दियां और वसंत का मौसम के बैक्टीरियाओं के विकास के लिए आवश्यक वातावरण प्रदान करता है। पूरे देश में समाज के विभिन्न स्थानों पर होलिकादहन की प्रक्रिया से वातावरण का तापमान बढ़ जाता है, जो बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक कीटों को मारता है। 
 
उसी समय लोग होलिका के चारों ओर एक घेरा बनाते हैं, जो परिक्रमा के रूप में जाना जाता है, जो उनके शरीर के बैक्टीरिया को मारने में मदद करता है। पूरी तरह से होलिका के जल जाने के बाद लोग चंदन और नए आम के पत्तों को उसकी राख (जिसे कि  विभूति कहा जाता है) के साथ मिश्रण को अपने माथे पर लगाते हैं, जो उनके स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में मदद करता है। 
 
इस पर्व पर रंगों से खेलने के भी स्वयं के लाभ और महत्व हैं। यह शरीर और मन की स्वस्थता को बढ़ाता है। घर के वातावरण में कुछ सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह करने और साथ ही मच्छरों को मारने या कीड़ों से छुटकारा पाने के लिए घरों को साफ और स्वच्छबनाने की भी एक परंपरा है।
 
इस प्रकार देखा जाए तो होली भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पुरातन त्योहार है जिसमें जीवन के सब रंग भरे हैं। त्योहारों का देश भारत होली के अवसर पर अपने जीवन की ऊर्जा का सकारात्मक प्रदर्शन करता है और यह बात हर वर्ष साबित करता है कि उमंग और उत्साह से जीवन के हर पल को रंगीन किया जा सकता है। 


Share this Story:

Follow Webdunia Hindi