भवन के उस भाग में जहाँ दो दीवारें मिलती हैं, खिड़कियाँ तथा रोशनदानों का निर्माण वहाँ न करवाएँ। यह अशुभकारी निर्माण होता है।
जब कोई व्यक्ति मुख्यद्वार में प्रवेश करता है तो मुख्य द्वार से निकलने वाली चुम्बकीय तरंगें उसकी बुद्धि को प्रभावित करती हैं। द्वार का सही दिशा में बनवाना आवश्यक है।
प्रवेश द्वार सदैव अंदर की ओर खुलना चाहिए। प्रवेश द्वार दो पल्लों में हो तो बहुत ही उत्तम है। द्वार स्वतः ही खुलना व बंद होना नहीं चाहिए। मुख्य द्वार के सम्मुख सीढ़ी, खम्भा, कीचड़ तथा मंन्दिर आदि नहीं होने चाहिए।
यदि बहुमंजिला इमारत है तो भूखंड पर पश्चिमी अथवा उत्तर दिशा की ओर अतिथि कक्ष का निर्माण उचित रहता है।