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15 August Independence Day | आजादी के आंदोलन का भूला-बिसरा चेहरा 'स्वामी श्रद्धानंद'

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अनिरुद्ध जोशी

भारत में आजादी के आंदोलन में नरम दल और गरम दल से जुड़े नेताओं को ही स्वतं‍त्रता दिवस पर याद किया जाता है परंतु यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि आजादी की अलख जनाने वाले हमारे कई संत थे जिन्होंने सामाजिक उत्थान और आंदोलन के साथ ही स्वतंत्रता आदोलन में भी अपना योगदान दिया है। उन्हीं में से एक नाम है स्वामी श्रद्धानंद।
 
स्वामी श्रद्धानंद का जन्म 22 फरवरी 1856 को पंजाब के जालंधर में हुआ था और उनका निर्वाण 23 दिसंबर 1926 को दिल्ली के चांदनी चौक में हुआ था। स्वामी श्रद्धानंद का मूल नाम मुंशीराम था। वे भारत के महान राष्ट्रभक्त संन्यासियों में अग्रणी थे।
 
स्वामी श्रद्धानंद ने देश को अंग्रेजों की दासता से छुटकारा दिलाने और दलितों को उनका अधिकार दिलाने के लिए अनेक कार्य किए। पश्चिमी शिक्षा की जगह उन्होंने वैदिक शिक्षा प्रणाली पर जोर दिया। इनके गुरु स्वामी दयानंद सरस्वती थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर स्वामीजी ने आजादी और वैदिक प्रचार का प्रचंड रूप में आंदोलन खड़ा कर दिया था जिसके चलते गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी।
 
धर्म, देश, संस्कृति, शिक्षा और दलितों का उत्थान करने वाले युगधर्मी महापुरुष श्रद्धानंद के विचार आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं। उनके विचारों के अनुसार स्वदेश, स्व-संस्कृति, स्व-समाज, स्व-भाषा, स्व-शिक्षा, नारी कल्याण, दलितोत्थान, वेदोत्थान, धर्मोत्थान को महत्व दिए जाने की जरूरत है इसीलिए वर्ष 1901 में स्वामी श्रद्धानंद ने अंग्रेजों द्वारा जारी शिक्षा पद्धति के स्थान पर वैदिक धर्म तथा भारतीयता की शिक्षा देने वाले संस्थान 'गुरुकुल' की स्थापना की। हरिद्वार के कांगड़ी गांव में 'गुरुकुल विद्यालय' खोला गया जिसे आज 'गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय' नाम से जाना जाता है। 

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