अटल थे, अटल हैं, अटल रहेंगे : अविस्मरणीय संस्मरण

-राजशेखर व्यास 
 
वे साधारण परिवार में जन्मे, साधारण से प्राइमरी स्कूल में पढ़े और साधारण से प्राइमरी स्कूल टीचर के बच्चे हैं। उनके पिता का नाम था कृष्णबिहारी वाजपेयी और दादा थे पंडित श्यामलाल वाजपेयी। उन्होंने सारे देश के सामने एक बार कहा था- 'मैं अटल तो हूं पर 'बिहारी' नहीं हूं। तब लोगों ने इसे अजीब ढंग से लिया था। लोगों को लगा कि वे 'बिहार' का अपमान कर रहे हैं। वस्तुत: उन्होंने कहा था कि असल में उनके पिता का नाम 'वसंत-विहार', 'श्याम-विहार', 'यमुना-विहार' की तरह ही 'विहार' है, तो उनका मूल नाम है- अटल विहारी।
 
वर्ष 2002 में बतौर प्रधानमंत्री जब उन्होंने मेरे पूज्य पिताजी पर डाक टिकट जारी किया था। कार्यक्रम का आयोजन उन्होंने प्रधानमंत्री आवास, अपने घर- 'पंचवटी' में ही किया था। अपने देश में एक अजीब परंपरा है, जिस महापुरुष पर डाक टिकट जारी होता है, उसके परिवार के लोग, बच्चे ही कार्यक्रम के लिए 'बैक ड्रॉप' का निर्माण करते हैं, वही कार्ड छपवाते हैं और निमंत्रण पत्र बांटने का जिम्मा भी महापुरुष के परिवार वालों का ही होता है। दिलचस्प यह है कि जब किसी राजनेता का डाक टिकट जारी हो तो यही सारे काम सरकार करती है। समारोह में तो मैंने कह भी दिया था कि मैं तो ठीक हूं, पूज्य व्यासजी का पुत्र हूं, पर मैं अटलजी के बारे में सोच-सोचकर चिंतित हूं कि उनके 'बैक ड्रॉप' की व्यवस्था कौन करेगा! इस पर खुलकर ठहाके लगे और अटलजी भी खूब हंसे। तो ये प्रसंग मजेदार है। लेखकों के बच्चों से कार्यक्रम के लिए बैक ड्रॉप बनाकर लाने के लिए कहा जाता है, लेकिन राजनेताओं से नहीं। राजनेताओं के बच्चे हों, न हों ये काम उनके लिए 'डाक-तार' विभाग करता है।
 
खैर मैंने बैक ड्रॉप और कार्ड तो प्रभात प्रकाशन पर बनवाए और छपवाए। उस पर मैंने भी वही अट‍ल विहारी लिखवाया। उस दौर में अटलजी के एक पीए थे- राजप्रताप सिंह। वे कहने लगे- पंडितजी! आपको पता नहीं है कि अटलजी का असली नाम क्या है। इस पर मैंने कहा, आप यहां प्रधानमंत्री निवास में बैठे हैं महाराज! ये तो बीबीसी लंदन ने शुरू कर दिया एबी वाजपेयी। तो सब इसी पर चल पड़े। तब उन्होंने अटलजी से ही पूछ लिया। अटलजी ने पुष्टि की और कहा- राजशेखरजी ठीक कह रहे हैं। 
 
पंडितजी यानी मेरे पिता पद्मभूषण पं. सूर्यनारायण व्यास पर डाक टिकट जारी करते हुए उन्होंने कहा कि पंडिजी एक पत्रिका निकालते थे- ‍'विक्रम'। उन्होंने कहा- हम उस पत्रिका को पढ़ने के लिए दौड़भाग किया करते थे यानी उसे लेने ग्वालियर स्टेशन जाते थे। पत्रिका पढ़ने के लिए घर में मारा-मारी मच रहती थी। भाई-बहनों में होड़ लगी रहती थी। कौन पहले पढ़ेगा। खुद अटलजी ने अपने जीवन की शुरुआत भी पत्रकारिता से की थी। 'वीर अर्जुन' के संवाददाता रहे। बाद में 'राष्ट्रधर्म' लखनऊ में भी रहे। वहां उनके साथ भी मेरी खूब चिट्ठी-पत्री होती रही। अटलजी 'वीर अर्जुन' के आरंभिक संवाददाता थे। 'वीर अर्जुन' में सरदार भगत सिंह ने भी काम किया था। कम लोगों को ये जानकारी है कि श्यामाप्रसाद मुखर्जी के साथ जब अटलजी पहली बार कश्मीर दौरे पर गए तो उस दौर में जो कुछ हुआ, कैसे श्यामाप्रसादजी को रोका गया, उन्होंने उसे अपनी आंखों से देखा। अटलजी ने कहा कि अपने ही राष्ट्र में जाने से अपने एक राजनेता को कैसे रोका जा सकता है! इसे लेकर वे विचलित हो उठे थे। श्यामाप्रसादजी नेहरूजी के मंत्रिमंडल में भी रहे थे। अटलजी पर इस बात का गहरा प्रभाव पड़ा। 
 
संसद में एक बार अटलजी ने लिए किसी  ने कहा कि वे आदमी तो अच्‍छे हैं, लेकिन पार्टी ठीक नहीं है। इस पर अटलजी ने अपने भाषण में कहा भी था कि मुझसे कहा जाता है कि मैं आदमी तो अच्‍छा हूं, लेकिन पार्टी ठीक नहीं है। मैं कहता हूं कि मैं भी कांग्रेस में होता अगर कांग्रेस विभाजन की जिम्मेदार नहीं होती। यूं तो वे भी पुराने कांग्रेसी थे। पहले सभी कांग्रेसी थे। आरंभिक दिनों में विजयाराजे सिंधिया भी कांग्रेस में थी, जिवाजीराव सिंधिया भी कांग्रेस में थे। कांग्रेसी इस आरोप का उत्तर नहीं दे पाएंगे, क्योंकि कांग्रेस ही शायद कांग्रेस का इतिहास नहीं जानती। 

उन पर जो सबसे पहला आरंभिक प्रभाव था वो कई कवियों का रहा। मध्यप्रदेश के ही कई कवि अटल विहारी वाजपेयी के कॉलेज में थे। डॉक्टर शिवमं‍गलसिंह 'सुमन' एक प्रगतिशील कवि और लेखक भी थे। अटलजी ने लाल किले से उनकी कविताएं भी पढ़ी हैं और अटलजी की जो बहुत मशहूर कविता है हार नहीं मानूंगा रार नई ठानूंगा' और 'काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं...' उस पर सुमनजी का प्रभाव है। इसी तरह की एक और कविता- है 'गीत नया गाता हूं...।' उनकी भाषा पर भी सुमनजी का प्रभाव है। दिलचस्प बात ये है कि सुमनजी की भाषण शैली और कविता पाठ में निरालाजी का प्रभाव है। ये बात मुझे नीरजजी ने एक बार बताई थी कि सुमनजी निरालाजी की शैली में कविता पढ़ते हैं। 
 
महत्वपूर्ण बात ये है कि अटलजी राजनीति में नेहरूजी के बाद एक अनूठे नक्षत्र हैं। यहां तक कि जब अटलजी पहली बार संसद में पहुंचे तो उनका भाषण सुनकर नेहरूजी ने कहा था- यह नौजवान नहीं, मैं भारत के 'भावी प्रधानमंत्री' का भाषण सुन रहा हूं। ये बात उनके बायोडाटा में लिखी हुई है। ये बात कहना कोई साधारण बात हनीं है। यह एक दृष्टा की दृष्टि है। हीरे की परख जौहरी ही कर सकता है। बात ये है कि प्रतिभा की परख प्रतिभा ही कर सकती है। नेहरूजी ने पहले ही दिन देख लिया कि भारत का भावी प्रधानमंत्री बोल रहा है। अटलजी  प्रधानमंत्री बने, एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार प्रधानमंत्री बने। उन्होंने जवाहरलालजी और इं‍दिराजी के रिकॉर्ड को भी तोड़ा। भारत में ऐसा कोई प्रधानमंत्री नहीं हुआ, शायद कोई हो, जो तीन-तीन बार प्रधानमंत्री बने।
 
अटलजी का राजनीति में कभी कोई ग्रुप था ही नहीं। अटलजी को भगवान राम की तरह हैं जिनके पास हनुमान भी अपना नहीं किसी और का है। हनुमान सुग्रीव के थे। मसलन- प्रमोद महाजन थे, जो लालकृष्ण आडवाणी के आदमी माने जाते थे, मगर भगत रहे अटलजी के। आप अटलजी की एक और विशेषता देखें। अटलजी के जो सबसे बड़े सलाहकार थे वे कांग्रेस के दिग्गज नेता द्वारकाप्रसाद मिश्र के बेटे थे। अटलजी के सबसे अच्‍छे मित्र थे शहाबुद्दीन, जिन्हें अटलजी राजनीति में लाए, वे आईएफएस और मुसलमान हैं। विश्व में किसी राजनेता का ऐसा नै‍तिक साहस है कि, बिल क्लिंटन का भी नहीं, कि किसी से उनके क्या संबंध हैं, आध्यात्मिक संबंध, प्रेम संबंध या भावनात्मक संबंध, वे सब जगजाहिर हैं। 
 
श्रीमती शीला कौल  जो उनके साथ रहती थी। आप इसे मित्रता कहे, प्रेम संबंध कहें, मीरा का संबंध कहें, या फिर राधा का संबंध कहें, लिव-इन-रिलेशन कहें, लेकिन मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं कि वे जो करते थे, खुलकर करते थे। वही करते, जो उन्हें उचित लगता। कृष्ण की तरह करते, जैसे कृष्ण ने सत्यभामा और रुक्मिणी के होते हुए राधा के संबंध को छुपाया नहीं। जब वे कष्ट में रहे, तब तो मैंने उन्हें रायसीना रोड के सुधीर के ढाबे से 'दाल' मंगाकर भी खाते देखा है। तब तो भारतवर्ष में कहीं से उनका कोई रिश्तेदार नहीं आया। अब तो अनूप मिश्रा और करुणा शर्मा भी देखी जाती हैं, जो रिश्तेदार हैं। परिवारजन भी आ गए, प्रधानमंत्री जो बन गए। पर तब एकमात्र शीलाजी रही, जो सुख-दुख में उनके साथ खड़ी थी। लेकिन किसी ने इसे देखा नहीं। हिन्दुस्तान के किसी राजनीतिज्ञ ने, प्रेस ने इस विषय को उठाया भी नहीं, कि प्रधानमंत्री आवास में एक महिला भी रहती है। 
 
मुझे याद है पहली बार प्रधानमंत्री बनने पर जब मैं उन्हें बधाई देने गया था तो सौ. 'ऊषा सिंहल' के साथ गया था। सौ. ऊषा दीदी माननीय अशोक सिंहलजी की इकलौती बहन थी। इनके सात भाई थे- अशोक भैया, आनंद भैया, पूर्व जीडी पुलिस और ब्लड प्रेशर के नाम से मशहूर भारतेंदु प्रकाश सिंहल, विचारक, चिंतक और लेखक, उद्योगपति विवेक सिंहल, और अब नहीं रहे पीयूष सिंहल- इन सात भाइयों की एक बहन। वे कहती थीं, ये सात भैया एक तरफ और राज भैया एक तरफ। मुझे उषाजी अपना भाई मानती थी और राखी बांधती रही। ऊषाजी अटलजी को भी राखी बांधती रही हैं। उन्हें पतरकु (दुबले-पतले वाले) भैया कहती रहीं। उस समय अटलजी के सेवक सर्वस्व थे शिवकुमार मूंछड़जी।
 
दीदी ने शिवकुमारजी के सामने ही एक बार पूछ लिया अटलजी से कि क्या शीलाजी भी यहीं रहती हैं पतरकू भैया!  तो अटलजी शर्माने लगे और कहने लगे- हां, यहीं रहती हैं ऊषा बहिन। लेकिन ये विश्व के इतिहास की एक अनोखी घटना है। क्या कोई ऐसी और घटना बता सकता है, जहां प्रधानमंत्री के घर में एक अनजान महिला जो उनकी पत्नी नहीं हो, उसके बाद भी अपने दत्तक दामाद के साथ वहीं रहती हो। रंजन भट्टाचार्य के साथ दत्तक बेटी भी। तो प्रेस ने क्यों नहीं उठाया ये सवाल। कभी किसी ने ध्यान भी नहीं दिया। मैं सच लिखता हूं कि तो सच सबको बुरा लगता है। ये सच कहने का साहस मेरे संस्कारों का है। मेरे रीढ़ की हड्डी अभी तक तनी हुई है। 
 
जब मैंने प्रभाष जोशी जी पर लेख लिखा तो करीब 160 से ज्यादा पत्र मेरे पास आए। इनमें शरद पवार और काजमी जैसे लोगों के पत्र भी हैं जिनमें लिखा है कि आप में अपने पिता की ही तरह हंस की प्रवृत्ति है कि दूध और जल को अलग कर देते हैं। कंकड़ से मोती चुनने और नीर क्षीर विवेक का। ये सब जो तुलनात्मक अध्ययन है वो मैं इसलिए बता रहा हूं कि कांग्रेस क्या, कोई पार्टी क्या, कोई मीडिया क्या, ये मुद्दा कोई इसलिए नहीं उठा पाया, क्योंकि ये जो सज्जन थे जवाहरलाल नेहरू के साले, कमला नेहरूजी के भाई थे उन्हीं की पत्नी थीं श्रीमती कौल। कांग्रेस इस मुद्दे को उठा नहीं सकती थी, लेकिन प्रेस ने भी नहीं उठाया। इसकी वजह आपने नहीं सोची होगी।
 
विचार करें क्योंकि अटलजी का 'चरित्र' सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था। उनके चरित्र पर कोई धब्बा नहीं है। उसके बावजूद उन्होंने अशोक सिंहलजी के डांटने पर एक बार संसद में कहा था कि, 'मैं कुंआरा तो हूं ब्रह्मचारी नहीं।' इसे कहने के लिए बेहद नैतिक साहस चाहिए। 
 
प्रो. रज्जू भैया ने भी कहा था कि ये कहने के लिए बहुत नैतिक साहस चाहिए। लेकिन अशोक सिंहलजी को ये बात बुरी लगी थी। उन्होंने कहा- ये क्या कोई कहने वाली बात है कि 'मैं कुंआरा तो हूं ब्रह्मचारी नहीं यानी चरित्रहीन हूं।' मगर ये बात नहीं है। जयप्रकाश नारायण ने एक बार गांधीजी के सामने शपथ ली, मैं प्रभावतीजी के साथ बिस्तर पर नहीं सोऊंगा। ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा। पर प्रकाश झा ने एक लंबी फिल्म जयप्रकाशजी पर बनाई थी। उस पर मैंने पचासों आपत्तियां की थीं और बहुत अखबारबाजी भी हुई। पार्लियामेंट में भी हंगामा हुआ। इस फिल्म में एक इंटरव्यू में प्रकाश झा ने जयप्रकाशजी के मुंह से कहलवाया कि- 'मैं ऐसा नहीं रह पाया। ब्रह्मचर्य का वैसा पालन नहीं कर पाया जैसा प्रभावती करती रहीं। इसका आशय था कि जय बाबू कहीं-कहीं स्खलित हुए। मैंने इस पर आपत्ति भी ली थी। लेकिन अटलजी का ये नैतिक साहस। गांधीजी को हम लोग बहुत ज्यादा मानते हैं। उनकी इस बात के लिए बहुत सम्मान देते हैं। उनके नैतिक साहस का सम्मान करते हैं। गांधीजी की आत्मकथा की बात करते हैं। उनके 'सत्य के प्रयोग' की बहुत बात करते हैं लेकिन अटलजी के अनुभव या कहें कि एक्सपीरिएंस विद ट्रुथ पर आज तक कोई बात नहीं हुई। शायद ही कोई कर पाए। फिर भी उन्होंने देखा जाए तो ये सब कहा। ये हिम्मत की बात है। साहस का विषय है कि भारत की राजनीति में पहला पुरुष है जिसके घर में एक महिला मित्र है। जो महिला है उनसे उनका क्या रिश्ता है ये पूछने का साहस किसी के पास नहीं है!
 
राजनीति में उनका कोई गुरु नहीं है जबकि लोग कहते हैं कि उनके गुरु 'अमुक' रहे हैं। कभी लोग बलराज मधोक को बता देते हैं। लोग कहते हैं कि मधोकजी ही उन्हें जनसंघ में ले आए जबकि पहले से ही बलराज मधोक उन पर आरोप लगाते रहे हैं कि वे जनसंघ में 'कांग्रेस के एजेंट' थे। जनसंघ में वे 'जवाहरलाल नेहरू के आदमी' हैं, पर आज बलराज मधोक दिल्ली में किसी को हैंडपंप से पानी खींचते नजर आते हैं। जनसंघ के संस्थापक मधोकजी रहे और तीन बार प्रधानमंत्री बने अटलजी! तो इस आदमी में कोई न कोई खूबी तो ऐसी होगी। इन खूबियों को जरा देखिए और सोचिए। सबसे बड़ी खूबी कि गोविंदाचार्य ने कह दिया कि आप उन्हें 'मुखौटा' कह सकते हैं, वे 'मुखौटा' हैं कि नहीं इस बारे में आगे जाकर भारतीय जनता विश्लेषण करे इसलिए ये बात तो आप इतिहास पर छोड़िए।
 
बड़ी बात ये है कि वे कांग्रेस के तमाम नेताओं को भी उतने ही प्रिय हैं जितने अपनी पार्टी को। बहुत से कांग्रेसी नेताओं को मैंने उनकी प्रशंसा करते सुना है। कम्युनिस्टों को और जॉर्ज फर्नांडीस जैसे ट्रेड यूनियन नेताओं को भी। अटलजी के एक आवाहन पर 'जॉर्ज' उनकी सरकार में शामिल हो जाते हैं। कभी बड़ौदा डाइनामाइट कांड और रेल हड़ताल के जनक जॉर्ज आज कहीं नहीं रहे। वे न तो 'कामरेड' हैं, न कांग्रेसी हैं और न ही भाजपाई लेकिन वे अटलजी को छूत की बीमारी समझते हैं। वे जिन्हें 'छूते' हैं उसे भाजपाई राजनीतिक बीमारी हो गई। इसमें ममता बनर्जी का भी नाम आता है। पहले वे ज्योति बसु से लड़ रही थीं और उनकी उत्तराधिकारी देखी जा रही थीं। उनकी पूरक भी मानी जा रही थीं। ममता दी के नाम से बंगाल कांपता था। अटलजी ने पहले उन्हें अपने साथ कर लिया फिर
उनका कद बढ़ाया और फिर घटा दिया और उनके राजनीतिक कद बढ़ाकर नैतिक मूल्यों का कद खत्म कर दिया। फिर काफी मेहनत-मशक्कत के बाद आज उन्हें अपनी साख के साथ अपनी जगह तलाशनी पड़ रही है। अटल विहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति एकमात्र व्यक्ति हैं जिनके पास शरद यादव और रामविलास पासवान जैसे लोग भी मौजूद थे तो जॉर्ज जैसे तुनकमिजाज भी उन्हें अपना गुरु मानते थे।
 
अटलजी कवि भी हैं। 'झींगा मछली' भी खा लेते थे। मदिरापान भी कर लेते थे। भांग भी खा लेते थे और इसे स्वीकार भी करते थे। भांग खूब खाते थे। उज्जैन से उनके लिए भांग आती रही है। मिठाई खाने के शौकीन हैं। अस्वस्थ और घुटने के दर्द के बाद भी अपना दर्द जुबान पर नहीं आने देते तो शायद उनकी शक्ति 'विजया' रही होगी।
 
मुझे एक समारोह में उन्होंने समय दिया था 35 मिनट का और खुद ही समारोह में डेढ़ घंटे तक पंडित व्यासजी पर बोलते रहे। उन्होंने पंडितजी के व्यंग्य-लेख भी पढ़कर सुनाए और खूब आनंद भी लिया। उन्होंने पंडित व्यासजी का जिक्र करते हुए कहा कि वे 'बोल्शे‍विक' क्रांति के क्रांतिकारी थे तो भारतीय सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक क्रांति के पुनर्जागरण के दूत भी थे। विक्रम विश्वविद्यालय बनाया। विक्रम कीर्ति स्मृति मंदिर बनाया। कालिदास समारोह शुरू कराया।
 
उन्होंने कहा कि पंडित सूर्यनारायण व्यास ने सोवियत रूस में कालिदास पर डाक टिकट निकलवा दी। किस तरह सिद्ध किया कि भारत के सारे राष्ट्र नेता बाहर से पढ़कर आए थे। गांधीजी हों, सुभाष बाबू हों, नेहरूजी हो या फिर अंबेडकरजी, सब विदेशों से ही शिक्षा हासिल करके आए थे। बातचीत में उस समय के नेता शेक्सपीयर की ही बातें करते थे। पंडित व्यास ने उन्हें बताया कि भारत में कालिदास हैं, विक्रमादित्य हैं। हमें सदियों से पढ़ाया जा रहा है कि तुम दो सौ साल के अंग्रेजों के और पांच सौ साल से मुगलों के गुलाम रहे तो उस समारोह में अटलजी ने कहा कि पंडित व्यासजी ने विक्रम नाम का चरित्र दिया कि हम पराक्रमी रहे हैं हमेशा से। हम कभी हारे नहीं। हम कभी थके नहीं। पंडित सूर्यनारायण व्यास ने विक्रम के नाम पर मंदिर और मठ नहीं बनवाए। उन्होंने विश्वविद्यालय और शिक्षा अनुसंस्थान बनावाए। भारतीय संस्कृति की स्थापना के पुनर्जागरण में पंडित सूर्यनारायण व्यास का वही स्थान है, जो राजा राममोहन राय का, मदन मोहन मालवीय का या टैगोर का। अटल विहारी वाजपेयी ने कहा कि 'इस तरह उनके बारे में हनुमान चालीसा के स्वर में न पढ़कर उनके जीवन कृतित्व और चरित्र पर अनुसंधान होना चाहिए। उस इंसान ने आपको राष्ट्र का खोया हुआ गौरव लौटाया। मैं उन्हें 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रणेता' मानता हूं।'
 
उसी समारोह के आरंभ में अटलजी ने कहा कि आजकल मेरे घुटनों पर सबका ध्यान जाता है और क्योंकि वो दुखता है तो मेरे पूरे शरीर का ध्यान भी घुटनों पर ही चला जाता है। पर यही हाल क्या हमारी राजनीति के साथ नहीं हो गया है! पूरे देश का ध्यान 'राजनीति' पर बहुत ज्यादा जाता है इसलिए कि 'राजनीति' भी दुखता हुआ घुटना है। जो चीज ज्यादा दुखती है ध्यान उसी पर जाता है। इतनी सुंदर बात से उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत की थी। जिस आदमी में इतनी निर्मलता हो, उसी में कटु नीतिज्ञ 'चाणक्य' भी छुपा हुआ हो, बहुत कम लोग समझ पाते हैं। उस आदमी ने बिना कुछ कहे उमा भारती को रास्ता दिखा दिया- जब वे पथभ्रष्ट हो गई थीं। वो आदमी जो कभी भाजपा का हीरो हुआ करता था- कल्याण सिंह, अटलजी ने उनका भी 'समापन समारोह' कर दिया। वही कल्याण सिंह अपनी वापसी का चारों तरफ रास्ता खोजते फिरे। सबसे बड़े 'मित्र' तो उनके लालकृष्ण आडवाणी माने जाते रहे, जिन्हें दुनिया सबसे बड़ा शत्रु भी मानती है। सुबह-शाम साथ-साथ खाना, फोटो खिंचवाना, साथ-साथ जन्मदिन मनाना, लेकिन मुझे बालकवि बैरागी के साथ एक समारोह में एक मजेदार दृश्य का आनंद मिला। वहां कन्हैयालाल नंदनजी और आलोक मेहता भी थे। पं. विद्यानिवास मिश्रजी का जन्मदिन था। यह समारोह प्रभात प्रकाशन का था। 
 
भोज के दरम्यान, क्योंकि बालकवि वैरागी, अटलजी के 'मंच' के मित्र भी थे, वैरागीजी ने कहा कि अटलजी ये जो राजशेखरजी हैं। ये पंडित सूर्यनारायण व्यास के पुत्र हैं। अटलजी ने कहा, 'मैं खूब जानता हूं।' वे बोले तो क्या पंडित सूर्यनारायण व्यास का 'जन्म शताब्दी समारोह' हम सबको नहीं मनाना चाहिए। क्या ये बच्चा ही दौड़-भाग करेंगे! क्या वे इन्हीं के बाप भर थे। हमारा शरीर, ये जीवन सब उन्हीं का दिया हुआ है। वे हम सबके भी पिता थे। तो अटलजी ने भी कहा कि हमारा ये देह जीवन भी उन्हीं का दिया हुआ है। हम सब ग्वालियर निवासी उनके ऋणी हैं। मध्यभारत के लोग तो ऋणी रहेंगे ही। तो बालकवि वैरागीजी ने कान में कहा कि जल्दी से दौड़कर एक पत्र टाइप करा लाओ कि क्या काम हमें सरकार से करवाने हैं। डाक टिकट, फिल्म बनवानी वगैरह, सब टाइप करा लाओ। हस्ताक्षर करवा लूंगा। अटलजी अच्छे मूड में हैं। प्रसन्न मुद्रा में उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए। उन्होंने पूछा और क्या होना चाहिए और सब हुआ। दिलचस्प बात है कि बाल कविजी ने अटलजी से वहीं कोने में पूछा कि सुना है कि क्या राजनीति से संन्यास लेने वाले हैं। ऐसी चर्चा है। दिल्ली में बीच-बीच में लौहपुरुष का नाम आता है कि वे प्रधानमंत्री बनने आ रहे हैं, आप रिटायर हो रहे हैं क्या! कान में बैरागीजी के कहने लगे। मैं नहीं जानता क‍ि वो कितना सत्य था। कानाफूसी सी थी। मैं दूर से सुन रहा था। बैरागीजी, उन्होंने कहा कि मरते मर जाऊंगा, पर इस रथी को प्रधानमंत्री नहीं बनने दूंगा और दोनों हंसते-हंसते बाहर आ गए। बैरागी दादा बोले कि आडवाणी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे ये। मैंने प्रभाष दादा और आलोक मेहता, नंदनजी और उन सब ने मेरा मुंह दबाया और बोले यहां चारों ओर सीआईडी और सीबीआई रहती है। ऐसी अनेक बातें मेरे मन में समाई हुई हैं। उन दिनों अटलजी के घुटने के दर्द की बहुत चर्चा थी प्रेस में। हमारे इंदौर के डॉक्टर चितरंजनजी ने चि‍कित्सा भी की थी तो मीडिया ने और भाजपा के ही उनके वैचारिक शत्रु मित्र राजनेताओं ने उनके रिटायरमेंट की बात उड़ा दी थी तभी अटलजी ने कहा अभी न मैं टायर हुआ हूं न रिटायर हुआ हूं, न होऊंगा। तब मुझे बैरागी दादा ने कहा था, यह घुटनों से ज्यादा घुटन का दर्द है। 'कोइलेशन' सर्वदलीय सरकार के अपने दर्द हैं और इस बात को प्रो. रज्जू भैया ने बहुत पहले भांप लिया था और इन्हें सत्ता में आने से यह कहकर मना कर किया था कि पूर्ण बहुमत न मिले तो सत्ता में आना ऐसा ही है, जैसे नेहरू और जिन्ना का ‍पार्टिशन पर भी सत्ता स्वीकारना। विदेशी इतिहास में इसे ओल्ड मैन इन हरि कहते हैं। 
 
जब मैं पहली बार दिल्ली आया तो डॉ. चित्रा चतुर्वेदी 'कार्तिका' जो मध्यप्रदेश की प्रख्यात लेखिका थीं, उनके पिता बैरिस्टर बृजकिशोर चतुर्वेदी उज्जैन के -सूबासाब'- अंग्रेजों के जमाने के कलेक्टर थे। वो ग्वालियर हाईकोर्ट के 'चीफ जस्टिस' भी रहे। मेरे पिता को आजादी की लड़ाई में 1942 में 'इंडियन डिफेंस एक्ट' के तहत एक बार सजा हुई थी। शासन चाहता था कि इस मामले में पं. सूर्यनारायण व्यासजी को सजा हो। व्यासजी के कुछ पत्र और कागजात पकड़ में आए थे। पंडितजी उस मामले में गिरफ्तार हुए। व्यासजी के केस की पैरवी कन्हैयालाल माणिकलाल 'मुंशी' और सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई शरतचंद्र बोस ने की। धारा शास्त्री- वकील जो बाद में गवर्नर हुए और केंद्र में मंत्री भी हुए। उस समय नब्बे-नब्बे हजार की जमानत हुई। फिर सरकार के विपरीत फैसला देते हुए इच्छा के विरुद्ध बैरिस्टर बृजकिशोरजी ने लिखा कि शासन एक निरपराध, निर्दोष, विद्वान को फंसाने का कार्य कर रहा है। और इस फैसले के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। उसी चतुर्वेदी ‍‍परिवार से मेरी बहुत अंतरंगता थी, आत्मीयता थी। उनकी बेटी चित्रा 'दीदी' मेरे लिए मां जैसी थी। मैं अपनी गर्मियों की छुट्टियां बिताने जबलपुर ही जाता था। बाद में जब मैं संघर्ष की शुरुआत कर रहा था तो दीदी ने कहा, जब दिल्ली जाओ तो अटलजी से जरूर मिलना और मुझे उस समय पता चला कि दोनों के संबंध बेहद आत्मीय थे। चित्रा दीदी ने उसे बेहद छुपाकर रखा था। दीदी ने भी शादी नहीं की थी और अटलजी के बारे में सभी जानते हैं। (दोनों की आत्मीयता का स्तर क्या था, इस बारे में कुछ भी कह पाना मुश्किल है। खासकर आज जब चित्रा दीदी नहीं हैं।) 
 
जब मैं चिट्ठी लेकर आया तो उन्होंने बड़े ही प्यार से बिठाया। तब मैं पं. रतनलाल जोशी के घर रहता था। वे उन दिनों 'हिन्दुस्तान' के संपादक थे। उन्होंने एकदम से फोन किया- राजशेखरजी आए हैं, पं. सूर्यनारायण व्यास के राजकुमार। अटलजी ने कहा कि इन्हें रायसीना रोड भिजवा दो। अटलजी तब तक सांसद ही नहीं, मोरारजी सरकार में मंत्री भी हो चुके थे। मंत्री रहते हुए अटलजी ने घर बुलाया। बूंदी के लड्डू खिलाए और पूछा- बेटा क्या करते हों। तब तक मैं छोटा-मोटा प्रगतिशील लेखक बन गया था। मैंने उन्हें अपनी दो किताबें भेंट कीं और बताया क‍ि भग‍तसिंह पर काम कर रहा हूं। किताब नई छपकर आई थी- इंकलाब। फिर अटलजी ने कहा- अच्‍छा तो इंकलाब लाओगे! हां, सूर्यनारायण व्यास के बेटे हो तो और क्या लाओगे! बहुत सी बातें होती रही। फिर पूछा, पंडितजी से ज्योतिष का ज्ञान तुमने ग्रहण किया या नहीं! वो तो तुम्हें विरासत में मिला ही होगा। मैंने उनसे तमककर कहा कि 'मैं ज्योतिष में विश्वास नहीं रखता और न ही मैं उसे वैज्ञानिक मानता हूं।' उस वक्त 19-20 साल का रहा हूंगा। अटलजी ने समझाया। ऐसा मत कहो, ये बहुत भारी विज्ञान है। इससे तुम्हारे पिताजी ने 'भारत की आजादी का मुहरत' निकाल दिया था। इससे तुम्हारे पिताजी ने राजेंद्र बाबू के राष्ट्रपति बनने से पहले ही उनके बारे में लिख दिया था। ये उन्होंने 1938 में ही लिख दिया था कि जवाहरलाल देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। अपने घर की इस महान परंपरा को मत छोड़ो। इस सबका विज्ञान से कोई विरोध नहीं है। खगोल की तरह ही ये ए‍क विज्ञान है। काफी देर तक बातें होती रहीं और वे मुझे समझाते रहे। भोजन का समय हो चला। उन्होंने भोजन के लिए मुझसे कहा। मैंने उनसे निवेदन किया कि रतनलालजी के यहां मेरा भोजन बनता है और वे भोजन पर मेरा इंतजार कर रहे होंगे। मैंने उनसे क्षमा मांगी। तो उन्होंने पूछा- 'चाय पीते हो'। मैंने कहा- हां। इस पर अटलजी ने कहा- चाय मत पिया करो। दूध पीयो और सुबह-सुबह खूब दंड बैठक किया करो। खूब घूमो दिल्ली। अगर दिल्ली में खाली घूम लोगे तो आधी दिल्ली जीत लोगे। इस बीच चाय आ गई। लेकिन चाय पिलाते हुए वे कहते रहे- दिल्ली को संघर्ष से जीता जाता है। चाय मत पिया करो। दूध पियो और रबड़ी खाओ। चाय के दौरान ही कहते रहे- चाय पीने से ओज और तेज नष्ट होता है। इन आशीष वचनों के साथ उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी। मैंने उनके पैर छू लिए, क्योंकि वे मध्यभारत के थे। बड़नगर और ग्वालियर के थे और हम ब्राह्मणों की परंपरा होती थी। उस उम्र में नास्तिक होते हुए भी मेरे मन में उनके प्रति एक आदर भाव जन्मा। उनका वाणी और क्षमता को परखते, देखते, सुनने मैं भी उनके लाखों दीवानों में शामिल हो गया था।
 
दूसरी भेंट और भी दिलचस्प है- माधवराव सिं‍धिया को हवाला कांड में आरोप लगाकर सरकार से बाहर कर दिया गया। उन्होंने इस्तीफा दिया जिसे स्वीकार कर लिया गया था। तो उन्होंने 'मध्यप्रदेश किसान विकास पार्टी' बनाई और वे अपनी पार्टी के 'अकेले' एक आदमी लड़ने लगे। हम उन अकेले सिं‍धियाजी के प्रचार में गए। चूं‍कि मैं सिं‍धियाजी के अति निकट उनके छाटे भाई जैसा था तो मैं प्राणपण से उनके चुनाव में भी लग गया। अपना लिखना-पढ़ना छोड़कर उनके बैनर-पोस्टर पंफलेट बनवाने, बांटने-बंटवाने में लग गया। अटलजी को पता चला कि राजशेखर उनके साथ है और उनका काम संभाल रहा है। ग्वालियर के उनके नजदीकियों में से एक शशिभूषणजी ने कहा दिया कि राजशेखर पं. सूर्यनारायण व्यासजी के बेटे तो उधर काम कर रहे हैं। ब्राह्मण, वकीलों के बीच दिनभर घूमकर सिं‍धियाजी के साथ प्रचार करते हैं। व्यासजी का हवाला देकर वोट मांगते हैं। अटलजी ने कभी बुरा नहीं माना। उन्होंने कहा, देखो सिं‍धिया घराने से व्यासजी के संबंध सात सौ साल पुराने हैं। वे उस परिवार के राजगुरु रहे हैं। माधवजी के साथ नहीं रहेगा अर्जुन तो फिर किसके साथ रहेगा। फिर वो विचारधारा से अलग नास्तिक किस्म का विद्वान बालक है, जो है सो अच्छा है।
अटलजी उस वक्त एक लाख छियासठ हजार वोट से चुनाव हार गए। हमें जीत के गर्व के बाद भी अंदर से कहीं रोना आ रहा था। जब काउंटिंग चल रही थी तभी मैंने सिंधियाजी से कहा, 'भैया, आप अटलजी के पांव छूकर उनसे आशीर्वाद जरूर लें।' सिंधियाजी को मेरी बात बहुत अच्छी लगी। उन्होंने मेरी बाजू पकड़कर कहा- 'यू आर ए जीनियस'। तुंरत जाकर अटलजी के पैर छू लिए। अटलजी ने उन्हें हृदय से लगा लिया और कहा, 'हमने तुम्हें गोद में खिलाया है श्रीमंत! हमने तुम्हें बचपन में खाना भी खिलाया है। आज तुम जीते, लो और मिठाई खाओ। इससे ज्यादा एक पिता के लिए और क्या प्रसन्नता होगी कि उसका पुत्र उसे परास्त कर दे'। ये शब्द जो अटलजी ने कहे थे तो उनके चेहरे पर कोई शोक और पीड़ा नहीं थी। घर जाकर मैंने उन्हें एक चिट्ठी लिखी। बधाई संदेश। 'बधाई संदेश' तो आपने लाखों पढ़े होंगे लेकिन ये अनोखा संदेश आज मैं आपको बताता हूं- मैंने लिखा- ''धन्य हैं वे लोग जो हार गए हैं अब उन्हें कोई हरा नहीं सकता। धन्य हैं वे लोग जो पीछे खड़े हैं अब उन्हें कोई पीछे नहीं हटा सकता। धन्य हैं वे लोग, जो झुक गए अब उन्हें कोई झुका नहीं सकता।' ऐसा कुछ था इस पत्र के बाद से अटलजी से और आत्मीयता बढ़ गई। उन्होंने इंदौर में अपने एक भाषण में कहा- जो 'नईदुनिया' में छपा भी- आजकल लोग मुझे सुनने कम, और देखने ज्यादा आते हैं कि मैं सिंधियाजी से हारने के बाद कैसा दिखाई दे रहा हूं। सुन लीजिए हमारे एक बाल मित्र हैं राजशेखर व्यास, उज्जैन वाले व्यासजी सूर्यनारायण व्यास के पुत्र!' लोग समझ गए होंगे कि मैं आरएसएसी हो गया होऊंगा कि मेरा नाम अटलजी ने क्यों कोट किया। मगर भाषण में उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा- 'उन्होंने एक बधाई संदेश भेजा है कि अब आप हार गए हैं और आपको कोई हरा नहीं सकता। अटलजी ने इसकी व्याख्या की कि 'जीते हुए को हार का भय लगता है। माधवरावजी अब हमसे इंदौर में लड़ लें। दिल्ली में लड़ लें। हम तो सब जगह लड़ने के लिए खड़े हैं। ग्वालियर तो उनका घर है। जीते हुए को हार का भय सताता है। हम तो हार गए हैं अब हमें कौन हराएगा। 'पर हारे को हरि नाम' नहीं पुकारूंगा। इस तरह उन्होंने उस मृत समारोह और पार्टी में प्राण संचार किया और फिर सत्ता में आए, ‍ शिखर तक पहुंचे। प्रधानमंत्री भी बने। तेरहवें दिन जब मैं प्रधानमंत्री आवास में उन्हें बधाई देने पहुंचा, बोले- क्या तेरहवीं पर मिलने आए हैं पंडितजी! मैंने कहा, नहीं, पंडितजी महाराज, मैं क्यों आपकी तेरहवीं देखूं। मैं तो चाहूंगा कि आपका आशीर्वाद हमेशा हमारे‍ सिर पर बना रहे।' कहने लगे, आपने हमारी जन्म कुंडली दे‍खी कि नहीं और मेरी ओर देखने लगे। ऐसा नहीं कि तब तक मैं ज्योतिष में पारंगत हो चुका था, लेकिन उनके ही वचनों से ज्योतिष का जिज्ञासु जरूर बन गया था। वैसे भी ज्योतिष तो मेरे रक्त में था। 
 
रज्जू भैया आरएसएस चीफ और फिजीक्स के प्रोफेसर होने के साथ-साथ बहुत बड़े विचारक भी थे। वे भी संपूर्णानंद, पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे दूसरे विचारकों के साथ मेरे पिता के भक्तों में थे और वे इस बात से बहुत नाराज थे कि अटल विहारी अभी सत्ता में क्यों आ रहे हैं। उनका आशय था कि पूर्ण बहुमत के बाद ही सत्ता लेनी चाहिए। सत्ता भोगी नहीं बनना चाहिए। जैसे आधी रात को जवाहर लाल नेहरू कुर्सी के लिए मरे जा रहे थे। गांधीजी बंटवारे में लगे थे। सत्ता का हस्तांतरण हम अभी नहीं स्वीकार करेंगे। देश में अभी और 5 साल युद्ध कर लेंगे। 45 में नहीं, 50 या फिर 52 में आजादी मिलती। ऐसा रज्जू भैया का विचार था। अखंड बहुमत के बाद ही सत्ता में आएंगे। अगर अखंड बहुमत नहीं मिला तो हम मंदिर नहीं बना सकेंगे और 370 भी नहीं खत्म कर सकेंगे। रज्जू भैया की सभी बहुत इज्जत करते थे।



जब सरकार बनी तो रज्जू भैया मुझे भी साथ लेकर बधाई देने गए। मुझे याद है। अटलजी, आडवाणीजी और अशोक सिंहलजी वहां बैठे थे। तब मैंने कहा कि मैंने मेरे घर भारती भवन में एक चित्र देखा है। डॉ. राधाकृष्णन् और राजेन्द्र बाबू और मेरे पिता बैठे हुए हैं। वह एक मशहूर चित्र है। आज ये अजीब सौभाग्य है कि अटलजी, आडवाणीजी और रज्जू भैया को साथ बैठा देख रहा हूं। मुझे बहुत आश्चर्यजनक लगता है और मैं इसे जीवनभर भुला नहीं सकता कि अटलजी जैसे बुजुर्ग ने उठकर कहा कि- नहीं, सौभाग्य हमारा है कि गुरु पूर्णिमा पर हमें आज व्यासजी के दर्शन हो गए। मैं बहुत विनीत भाव से खड़ा रहा, लेकिन गहरी बात ये है कि रज्जू भैया ने किस कारण से आरएसएस प्रमुख के पद से इस्तीफा दे दिया। बहुत कम लोग उस इस्तीफे की वजह जानते हैं। मेरे इस इस्तीफे की वजह के बहुत सारे पत्र हैं। उन्होंने हालांकि कूल्हे की हड्डी टूटने की वजह प्रेस में बताई। आरएसएस की एक परंपरा रही है कि कोई प्रमुख जीते जी इस्तीफा नहीं देता। जब प्रमुख का देहांत होता है, तो ही लिफाफा खोला जाता है। 
 
इस विषय में बहुत ज्यादा कहने‍-लिखने का अभी समय नहीं आया है। हां, इसकी एक वजह प्रमोद महाजन से मतभेद भी रही। उसे मैं यहां नहीं लिख सकता। बहुत से व्यक्तिगत कारण हैं और राष्ट्रीय कारण भी हैं। फिर मेरा लेख एक राजनीतिक लेख हो जाएगा, जबकि अटलजी पर ये मेरे व्यक्तिगत संस्मरण हैं। प्रधानमंत्री बनने पर उनके जो महत्वपूर्ण योगदान हैं और ऐसे बहुत से योगदान हैं उनमें उदारीकरण अहम है। इसके अलावा भारत-पाक के संबंध सुधारने की उन्होंने सच्ची कोशिश की। उसे आगे जारी रखना चाहिए था। जब तक भारत-पाक लड़ते रहेंगे, अमेरिका हथियार बेचता रहेगा। चीन आपको लड़वाता रहेगा, क्योंकि जिस दिन दोनों देश एक हो गए तो प्रो. अमर्त्य सेन के शब्दों में आपके रक्षा बजट का सारा पैसा आपके विकास पर खर्च होग। ये अमेरिका कभी नहीं चाहेगा, न ही चीन ये चाहेगा। प्रधानमंत्री अटलजी चाहते थे तभी उन्होंने लाहौर-दिल्ली बस चलवाई। आलोचनाओं के शिकार भी हुए। पोखरन विस्फोट करने में भी पीछे नहीं रहे।
 
तब वे इंदिराजी को 'दुर्गा' कहते थे और उन्होंने इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकारा भी। उन्होंने साफ किया कि वे इंदिराजी की कई नीतियों से सहमत थे और कई से नहीं। लेकिन वे मानते थे कि जवाहरलाल की विदेश नीति ही सही है। वे पंचशील के सिद्धांत पर काम कर रहे थे। अटलजी नेहरूजी के भक्त थे अंदर से। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर उन्होंने एक बार उछलकर कहा था, देखो जिस कुर्सी पर नेहरू बैठा करते थे, उस पर एक मास्टर का बेटा बैठ गया। ये अटलजी की ही खूबी थी कि वे अपने सारे राजनीतिक विरोधियों के एकसाथ रखते थे। द्वारिका प्रसाद मिश्र के बेटे बृजेश मिश्र तो उनके सलाहकार रहे ही। इससे ज्यादा गहरी मार्मिक बात क्या होगी, माधवराव सिंधिया की मृत्यु पर अटलजी को बिलख-बिलखकर रोते हुए मैंने देखा है। वह उनकी सहृदयता और मनुष्यता का ही लक्षण था। वे अपने विरोधी विचारकों को भी बहुत सम्मान देते थे। वरना सूर्यनारायण व्यास डाक टिकट तो पहले भी निकाला जा सकता था। कई सरकारें आईं और गईं। पंडित सूर्यनारायण व्यास का स्मारक बनाया जाना चाहिए था। 
 
मध्यभारत में आजादी की लड़ाई को जिंदा रखने का जिन्हें श्रेय दिया जाना चाहिए था तो उसमें तीन नाम हैं- सेठ गोविंद दास, माखनलाल चतुर्वेदी और सूर्यनारायण व्यास। माखनलालजी और सूर्यनारायणजी राजनीति में नहीं आए। सेठ गोविंददासजी सांसद बने, परंतु व्यासजी ने पूरे मालवा में प्रभातफेरी रोज निकाली। 1917 से 1942-43 की क्रांति तक। आजादी के लिए उनके योगदान के बाद भी कांग्रेस को कभी ये बात नहीं याद आई कि उन पर डाक टिकट निकाला जाना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के आते ही अटलजी के मन में ये आया कि उन पर डाक टिकट निकाला जाना चाहिए और उन्होंने निकाला भी। अपने ही घर में अपने वैचारिक विरोधियों का भी सम्मान करना कोई अटलजी से सीखे। अटलजी में सहृदयता कूट-कूटकर भरी हुई है। मुझे याद है कि इसी समारोह में राजेन्द्र यादव और कमलेश्वरजी ने आने से इंकार कर दिया था कि 'तुमने अटलजी के घर पर ये समारोह क्यों रखा?' थोड़ी सी नाराजगी सिंधिया घराने से भी आई थी। तो मैंने अटलजी से कहा कि बहुत से लोग आपके यहां आने से कतरा गए। प्रभाष जोशी भी नहीं आए। बालकवि बैरागीजी नहीं आए। राजेन्द्र यादवजी, कमलेश्वरजी नहीं आए। आलोक मेहताजी आए। प्रभाकर श्रोत्रिय, भारतेंदु प्रकाश सिंहल थे। सत्यनारायण जटिया थे। तपन सिकदर थे। साहित्य जगत के और भी बड़े-बड़े लोग। गंगाप्रसाद विमल, हिमांशु जोशी भी थे।
 
नवभारत टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया से भी लोग आए। दीपक चौरसिया जैसे नौजवान भी थे। पर जब मैंने अटलजी से कहा‍ कि कमलेश्वरजी और राजेन्द्रजी ने आने से मना कर दिया तो उन्होंने कहा कि 'बड़े लेखक होकर भी ये लोग क्षुद्र हृदय क्यों हैं? आखिर मैं न प्रधानमंत्री होता तो कोई और होता। कोई और पार्टी सत्ता में होती और व्यासजी पर तो डाक टिकट निकलना ही चाहिए था।' उनके अंदर का लेखक बहुत बड़ा रहा है, जो दूसरे लेखकों को सम्मान देता रहा है। वे बड़े कवि न माने जाते हो, आज के कड़े कवि जिन्हें लोग अज्ञेय या नागार्जुन जैसा न मानते हो, फिर भी वे लिख गए- 'हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं'- ऐसा एक नाम काल के कपाल कर लिख गया एक सामान्य ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने वाला! उनके पीछे कोई पैसे वाला सेठ, धनाढ्य सेठ नहीं, किसी बिरला या मफतलाल से कोई मदद नहीं मिली, कोई आर्थिक सहायता नहीं ली फिर भी राजनीति से कोई समझौता भी नहीं किया। मसलन धीरूभाई अंबानी को भारतरत्न देने की बात चली। कुछ सूत्रों का दावा है कि प्रमोद महाजन ने प्रस्ताव रखा था कि इसके लिए अंबानी बंधु तकरीबन 16 करोड़ रुपए पार्टी फंड देने को तैयार हैं।
 
अटलजी ने दृढ़ता से इससे इंकार कर दिया। अंदर के किसी आदमी ने मुझे बताया कि अटलजी ने कहा- 'भारतरत्न' कोई ऐसा रत्न नहीं है, जो हर किसी ऐरे-गैरे धीरू के गले में डाल दिया जाए। ये अटलजी का ही नैतिक साहस और बल था कि वे पैसे के आगे झुके नहीं। उन्होंने 'सम्मान' की राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा की। उनके ऊपर पैसे का कभी कोई दाग नहीं है। उनके रिश्तेदारों पर हो, तो हो, अटल विहारी वाजपेयी के धोती-कुर्ते पर कोई दाग नहीं है। उनके शरीर की चदरिया से भी ज्यादा उनकी आत्मा की चदरिया उजली है। उनके जीवन पर कोई कलंक नहीं है। वे चोर नहीं, चरित्रहीन नहीं हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि 'शीलाजी मेरी मित्र हैं और मेरे साथ रहती हैं।' मित्रता के दर्जे को समझ लो तो वो शारीरिक संबंधों तक ही सीमित नहीं रहती। उनकी मानसिक मित्रता हो सकती है, आध्यात्मिक या फिर भावनात्मक हो सकती है। मैं ये कोई 'बे‍निफिट ऑफ डॉउट' नहीं दे रहा हूं। मैं क्योंकि उनकी नैतिकता से परिचित हूं।
 
मैंने उनकी कुंडली देखी है और लोग गांधीजी के 'सत्य के प्रयोग' को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं। हालांकि कस्तूरबा गांधी उनके सत्य के प्रयोग से सहमत नहीं थीं। ये बात मैंने 'बा' पर बनाई फिल्म में भी विश्वंभर नाथ पांडे से लेकर सरोजनी महिषि, अरुणा आसफ अली से लेकर इंद्राणी, जगजीवन राम, मीरा कुमार के मुंह से सुनी है। इन लोगों ‍ने फिल्म में कहा है कि अगर 'बा' सत्य के प्रयोग करतीं तो गांधी बर्दाश्त नहीं कर पाते। अगर गांधीजी के प्रयोग हरिलाल करने लगता तो भी शायद उन्हें नहीं भाता। पद्मजा, सरोजनी नायडू या मनु-आभा के साथ जो बापू के सत्य के प्रयोग हुए या जो मीरा बेन के साथ सत्य के प्रयोग किए गए। जवाहरलाल नेहरूजी के अनेक प्रेम-प्रसंगों पर भी बार-बार बहसें होती हैं विदेश से फिल्म बनाने की बात आती है। अटलजी का जीवन खुली किताब की तरह है। उनसे ज्यादा राजनीतिक शालीनता का जीवन किसी का नहीं है। लेकिन सार्वजनिक रूप से ये सच कहने का साहस अटलजी में है। अपनी महिला मित्र को उन्होंने प्रधानमंत्री आवास में रखा। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के बावजूद। किसी प्रेस, किसी कम्यु‍निस्ट ने आवाज नहीं उठाई। अटलजी का चरित्र विराट है। इसे आप अटलजी का 'मुखौटा' कहें, जैसा कि गोविंदाचार्य ने कह दिया था। मगर आप देखें कि आज गोविंदाचार्यजी खुद कहां हैं? जिसने अटलजी को कुछ कहा, वो कहां है? ऐसा कि जैसे चन्द्रमा पर थूक दीजिए। अटलजी भारतीय राजनीति में जनसंघ के या कांग्रेस के नहीं, बल्कि एक ईमानदार किस्म के स्वाभिमानी-अध्ययनशील राजनेता रहे हैं। 
 
गोविंदाचार्य कहा कि अटलजी एक 'मुखौटा' हैं। बाहर कुछ और, और अंदर कुछ और। अंदर से कठोर 'संघी' हैं। मगर वे ऐसे होते तो राम जन्मभूमि पर 'मंदिर' ही बना देते। अगर उन्होंने मंदिर नहीं बनने दिया तो अशोक सिंहल का विरोध भी खूब सहा। उनकी लोकप्रियता अपार है। उसी से पार्टी जमी और टिकी रही, और ऊपर उठती गई। जनाधार का मतलब कि वो अकेले ऐसे नेता नहीं हैं कि उनके नाम पर एक पार्टी, जैसे आप कह सकते हैं कि महात्मा गांधी के नाम पर कांग्रेस खड़ी कर सकते हैं। हालांकि जनसंघ या बीजेपी से अटलजी को माइनस कर दिया जाए, तो ये पार्टी उस दौर में भी मृतप्राय: हो जाती। ये पहला आदमी है जिसने अपने राजनीतिक विरोधियों को गले लगाया। दुनियाभर की विचारधारा वाले लोगों को अपने साथ जोड़ा। क्या पासवान, क्या शरद यादव, क्या ममता बनर्जी, क्या जयललिता, क्या जॉर्ज फर्नांडीस और क्या नितीश कुमार? अटल विहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व की ये जो विराट उदार-हृदयता है, वहीं उन्हें अटल बनाती है। और जब तक देश के 'पटल' पर रहेंगे, वे जिएं या मरें, 'अटल' रहेंगे।
 
 
-राजशेखर व्यास

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