प्रतापगढ़-कुंडा के एक छोटे से गाँव में 1922 में पैदा हुए 88 वर्षीय कृपालु महाराज के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संत होने की कहानी कम रोचक नहीं है। वे बताते हैं कि 14 वर्ष की उम्र में ही उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हो गई थी। उन्होंने प्रतापगढ़ और इंदौर में अपनी शिक्षा ग्रहण की।
इंदौर के महू संस्कृत कॉलेज से आचार्य की डिग्री लेने के बाद वे प्रवचन में जुट गए। चित्रकूट, महोबा, मथुरा, वृंदावन, इलाहाबाद और झाँसी में प्रवचन के मार्फत शिष्य बनाने लगे। कृपालु महाराज मुख्य रूप से राधा-कृष्ण के भक्त हैं।
प्रतापगढ़ में जब अपने जन्मस्थल पर उन्होंने विराट श्रीराम-जानकी मंदिर का निर्माण शुरू करवाया तब लोगों को उनके विश्व व्यापी संपर्कों के बारे में पता चला। कृपालु महाराज ने न सिर्फ मंदिर का निर्माण कराया बल्कि कई कॉलेजों की स्थापना भी कराई।
कई अस्पताल भी खोले जहाँ पर लोगों को मुफ्त दवा और भोजन प्रदान किया जाता है। उत्तरप्रदेश के राज्यपाल रहे विष्णुकांत शास्त्री उनके यहाँ नियमित रूप से आते-जाते थे।
बाबा अपने कार्य को लेकर अक्सर चर्चा में रहते थे। उनके आश्रम में अक्सर भंडारा किया जाता है जहाँ पर बर्तन और वस्त्र आदि भी प्रसाद के रूप में मिलते थे। उनके देश-विदेश सहित कई स्थानों पर आश्रम हैं।