Publish Date: Thu, 11 Jun 2026 (18:02 IST)
Updated Date: Thu, 11 Jun 2026 (18:06 IST)
मध्यप्रदेश में कांग्रेस सिर्फ चुनाव ही नहीं, बल्कि चुनाव लड़ने की बुनियादी समझ भी हारती जा रही है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस की विफलता की कहानी सुनाती ये घटनाएं अब महज 'तकनीकी चूक' नहीं लगतीं। यह मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के सांगठनिक नेतृत्व और राजनीतिक सूझबूझ पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान है। मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने का ठिकरा बीजेपी के सिर पर फोड़ा जा रहा है, लेकिन हकीकत तो यह है कि कांग्रेस के नेता, कार्यकर्ता और सदस्य ही जीतू पटवारी पर सवाल उठा रहे हैं।
1. मुख्य मुद्दा (Main Issue)
नेतृत्व और बुनियादी समझ पर सवाल: मध्य प्रदेश में कांग्रेस न सिर्फ चुनाव हार रही है, बल्कि चुनाव लड़ने की बुनियादी समझ भी खोती जा रही है। हाल ही में मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा नामांकन खारिज होना और इससे पहले अक्षय बम, मुकेश मल्होत्रा व राजेंद्र भारती जैसे मामलों ने पार्टी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इन लगातार हो रही 'तकनीकी चूकों' के केंद्र में प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी का सांगठनिक नेतृत्व है।
2. मीनाक्षी नटराजन नामांकन विवाद और 'क्रॉस वोटिंग' का डर
जानबूझकर नामांकन रद्द कराने का आरोप: इंदौर के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के अनुसार, मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होना जीतू पटवारी की एक सोची-समझी रणनीति (प्लान) का हिस्सा था। आरोप है कि पटवारी को चुनाव में 'क्रॉस वोटिंग' होने का डर था, जिससे उनकी भयंकर फजीहत होती। इसी थू-थू से बचने के लिए नामांकन को लीक करवाकर रद्द कराया गया। दोनों बड़े मामलों (अक्षय बम और नटराजन) में डमी उम्मीदवार न उतारना कांग्रेस की बहुत बड़ी रणनीतिक विफलता है।
3. वरिष्ठ नेताओं की प्रतिक्रियाएं और इस्तीफे/कार्रवाई की मांग
अजय चौरड़िया (पूर्व उपाध्यक्ष, मप्र कांग्रेस): "यह लिखकर रख लो कि मप्र कांग्रेस को जीतू पटवारी नहीं चला सकते। दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के मार्गदर्शन के बिना पार्टी चलना असंभव है। सच बोलने के कारण मुझे 6 साल के लिए निष्कासित किया गया, लेकिन मैं सच कहता रहूंगा।"
राकेश सिंह (पूर्व महासचिव, मप्र कांग्रेस): "इन संदिग्ध घटनाओं के कारण मप्र कांग्रेस में कई आशंकाएं जन्म ले रही हैं। राहुल गांधी को खुद इस मामले को संज्ञान में लेना चाहिए और नैतिकता के आधार पर इसकी उच्च स्तरीय जांच करानी चाहिए। प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की सख्त जरूरत है।"
4. जीतू पटवारी के व्यवहार और कार्यशैली पर गंभीर आरोप
अमर्यादित व्यवहार: संगठन के भीतर से फीडबैक है कि जीतू पटवारी का व्यवहार पार्टी के नेताओं, विधायकों और पार्षदों के साथ बहुत खराब है। वे विधायकों से 'तू-तड़ाक' (तू-तुकारे) से बात करते हैं और पार्षदों को तवज्जो नहीं देते। गाली-गलौज करना उनकी आम बात बन चुकी है, जिससे पार्टी में भारी असंतोष है।
सोशल मीडिया बनाम जमीनी हकीकत: नेताओं का आरोप है कि पटवारी सिर्फ फेसबुक पर 'रील' बनाकर अपनी छवि चमकाने में व्यस्त हैं। उन्हें पार्टी के भविष्य से कोई सरोकार नहीं है। उन्होंने खुद भी कथित तौर पर कहा है कि "पार्टी गई तेल लेने।"
चुनावी विफलता की आशंका: वर्तमान हालातों को देखते हुए नेताओं का मानना है कि आगामी समय में कांग्रेस के 20 विधायक जीतना भी मुश्किल हो जाएगा। चुनौती दी गई है कि पटवारी इंदौर, उज्जैन, मंदसौर, रतलाम, देवास और शाजापुर सहित 8 जिलों में एक भी विधायक के जीतने की गारंटी देकर दिखाएं।
5. कद्दावर नेताओं को हाशिये पर धकेलने की राजनीति
वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा: जीतू पटवारी के कार्यकाल में कांग्रेस के दो सबसे अनुभवी दिग्गज नेता—दिग्विजय सिंह और कमलनाथ—पूरी तरह हाशिये पर चले गए हैं। इसके अलावा, अरुण यादव को घर बैठा दिया गया है, कमलेश्वर पटेल के राजनीतिक कद को छोटा करने का प्रयास जारी है, और सज्जन सिंह वर्मा व अजय सिंह के साथ पटवारी का कोई तालमेल नहीं है।
6. विपक्षी दलों के हमले (बीजेपी का रुख)
सीएम मोहन यादव का तीखा बयान: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सुजालपुर की एक जनसभा में जीतू पटवारी पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें 'दो कौड़ी का अध्यक्ष' और 'रद्दी अध्यक्ष' तक कह दिया था। इस बयान पर खुद कांग्रेस के अंदरूनी खेमे से भी मौन समर्थन मिल रहा है।
7. अनुशासनहीनता पर कार्रवाई में ढिलाई (निर्मला सप्रे प्रकरण)
कानूनी कदम उठाने में विफलता: कांग्रेस नेता निर्मला सप्रे लगातार और खुलकर कांग्रेस विरोधी बयानबाजी कर रही हैं और बीजेपी के साथ मंच साझा कर रही हैं। दलबदल कानून के तहत जीतू पटवारी को अब तक उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द कराने की कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन इस गंभीर मुद्दे पर भी वे पूरी तरह निष्क्रिय और उदासीन नजर आ रहे हैं।
Edited By: Naveen R Rangiyal
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