Publish Date: Tue, 07 Jun 2011 (19:03 IST)
Updated Date: Tue, 07 Jun 2011 (19:01 IST)
बारिश का मौसम सिर पर है। एक बार फिर मकानों की छतों पर जमा होने वाले वर्षा के पानी को जमीन में उतारने (रूफ वाटर हार्वेस्ंिटग) के कार्यक्रम की जोर-शोर से चर्चा होगी। इस संबंध में राज्य शासन ने आदेश तो पहले से ही जारी कर रखे हैं, किंतु उसका ईमानदारी व गंभीरता से पालन होता किसी भी जिले में नजर नहीं आ रहा है।
वर्षा के जल को सहेज कर रखने तथा भूमिगत जल के संरक्षण व संवर्द्धन के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। इनमें छतों से भू-जल पुनर्भरण पद्धति (रूफ वाटर हार्वेस्ंिटग सिस्टम) भी शामिल है। मगर इस सिस्टम को लगाने के लिए न लोक निर्माण विभाग गंभीर है और न नगरीय निकाय। शासन के आदेश में दंड अथवा जुर्माने का कोई प्रावधान नहीं है।
'नईदुनिया' ने इस सिलसिले में मालवा-निमाड़ अंचल के विभिन्ना जिलों में अध्ययन करने का प्रयास किया है। इसमें पाया है कि आम नागरिक ही नहीं बल्कि शासन और नगरीय निकायों के जिम्मेदार अधिकारियों एवं इंजीनियरों को भी इस मामले में जागरूक और संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। नियमों में प्रोत्साहन के साथ दंड का भी प्रावधान किए जाने की जरूरत है।
कवायद न के बराबर
वर्षा जल को जमीन में उतारने की कवायद धार शहर में न के बराबर है। शासकीय भवनों में भी इस सिस्टम की उपेक्षा की गई है।
नहीं आई चेतना
वर्षा जल को सहेजने की महत्ता और आवश्यकता को समझने के बावजूद झाबुआ में अब तक जनपुर्नभरण कार्य के प्रति लोगों में चेतना जागृत नहीं हुई है। तीन साल में झाबुआ नगर में 20-25 लोगों ने ही जलपुर्नभरण की व्यवस्था की है।
आदेश की उपेक्षा
आलीराजपुर शहर तथा जिले में कहीं भी सरकारी भवनों में शासन आदेश का पालन नहीं हो रहा है। नपा ने एक वर्ष में लगभग 125 भवनों के निर्माण की स्वीकृति दी है, लेकिन उसे यह जानकारी नहीं है कि कितने भवनों में वर्षा जल सहजने की व्यवस्था की गई है।
सरकारी भवनों में सुस्ती
खरगोन में भी नवीन निजी भवनों के निर्माण पर जरूर ध्यान दिया जा रहा है परंतु सरकारी भवनों पर अधिकारियों का रवैया अभी भी सुस्त ही दिखाई देता है। मकान मालिक से रूफ हार्वेस्ंिटग सिस्टम लगाने के एवज में नकद धरोहर राशि जमा करवाई जा रही है। मगर नगरीय निकाय में निरीक्षण का कोई रिकार्ड नहीं है। बड़वानी जिले में भी कई शासकीय भवनों में इस प्रणाली को नहीं अपनाया गया है। एक वर्ष में महज 11 शासकीय व निजी भवनों यह सिस्टम लगाया गया है।
Naidunia
Publish Date: Tue, 07 Jun 2011 (19:03 IST)
Updated Date: Tue, 07 Jun 2011 (19:01 IST)