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14 तानाशाह, जिनसे आज भी त्रस्त है दुनिया

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संकलन : अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
 
तानाशाही विचारधारा दुनिया के लिए उतनी ही खतरनाक है जितना कि अव्यवस्थित लोकतंत्र। लोकतंत्र की खामियों के कारण ही तानाशाह पैदा होते हैं। जितने तानाशाही वामपंथी रहे हैं, उतने ही दक्षिणपंथी भी। दोनों ही तरह की विचारधारा ने धरती को खून से लथपथ ‍किया है। आज भी इनकी विचारधारा मानने वाले लोग मौजूद है। भारत के लिए मार्क्सवाद या लेनिनवाद उतना ही खतरनाक है जितना क‍ि फासीवाद या हिटलरवाद। भारत यदि इस तरह की विचारधारा को पालता और पोसता है तो उसका पतन भी वैसे ही होगा, जैसा कि सोवियत संघ या जर्मन का हुआ या जैसा की इराक का हुआ और जैसा कि सीरिया का हो गया।
वामपंथी मानते हैं कि दुनिया में क्रांति सिर्फ हथियारों के माध्यम से ही आ सकती है। कट्टरपंथी धार्मिक समूह भी यही मानता है तभी तो दोनों में गठजोड़ है। दोनों ही तरह के लोग अपनी विचारधारा को दुनिया पर जबरदस्ती लादना चाहते हैं। आज बहुत से ऐसे तानाशाह हैं जिन्हें लोग क्रांतिकारी मानते हैं। दरअसल, वे पहले क्रांतिकारी थे फिर शासक बने और फिर शासक से तानाशाह बन बैठे। इन तानाशाहों ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए सभी तरह के बुरे और क्रूर मार्गों को अपनाया। हम आपको ऐसे क्रूर तानाशाहों के बारे में बताएंगे जिनके कारण दुनिया का वर्तमान ही नहीं बदला, भविष्य भी उनके कारण आज तक प्रभावित हो रहा है। आओ जानते हैं दुनिया के 14 क्रूर तानाशाहों के बारे में...जिनकी विचारधारा के कारण भारत में भी अशांति फैली हुई है।
 
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एडोल्फ हिटलर (adolf hitler) : खुद को आर्य कहने वाले जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर को सबसे क्रूर माना जाता था, क्योंकि उसने लाखों यहुदियों को जिंदा जला दिया था। एडोल्फ हिटलर का जन्म ऑस्ट्रिया में 20 अप्रैल 1889 को हुआ था। वो राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन कामगार पार्टी (NSDAP) का नेता था और कई सालों तक जर्मनी का शासक रहा। उनकी पार्टी का चिह्न एक स्वस्तिक था। 
 
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हिटलर मानता था‍ कि बाहर से आए यहुदियों ने हमारे सभी संसाधनों पर कब्जा कर लिया तथा वे देश के सबसे अमीर बन बैठे हैं और अपने धन के बल पर वे राजनीति को संचालित करते हैं। हिटलर की खास बात यह थी कि हिटलर शाकाहारी था और उसने पशु क्रूरता के खिलाफ एक कानून भी बनाया था। यह भी कि हिटलर का पहला प्यार एक यहूदी लड़की ही थी।
 
हिटलर को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार माना गया है। उसके आदेश पर नाजी सेना ने पोलैंड पर आक्रमण किया। फ्रांस और ब्रिटेन ने पोलैंड को सुरक्षा देने का वादा किया था और वादे के अनुसार उन दोनों ने नाजी जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। यूरोप की धरती पर कत्लेआम मचाने के लिए हिटलर को सबसे ज्यादा क्रूर शासक के रूप में जाना गया।
 
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बेनिटो मुसोलिनी ( benito mussolini ): मुसोलिनी भी हिटलर की विचारधारा का था। बेनिटो मुसोलिनी इटली का नेता था जिसने राष्ट्रीय फासिस्ट पार्टी का नेतृत्व किया। वो फासीवाद के दर्शन की नींव रखने वालों में से प्रमुख नेता था। उसने दूसरे विश्वयुद्ध में एक्सिस समूह में मिलकर युद्ध किया।
 
मुसोलिनी का जन्म 1883 की 29 जुलाई को इटली के प्रिदाप्यो नामक गांव में हुआ था। 18 वर्ष की अवस्था में वो एक स्कूल में टीचर बना। 19 साल की उम्र में वह भागकर स्विट्जरलैंड चला गया।
 
मुसोलिनी ने 1935 में अबीसीनिया पर हमला किया और कहा जा सकता है कि यहीं से द्वितीय महायुद्ध का प्रारंभ हुआ। पराजयों के कारण 25 जुलाई 1943 तक ऐसी स्थिति हो गई कि मुसोलिनी को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और वो हिरासत में ले लिया गया। तब सितंबर में ही हिटलर ने उसे छुड़ाया और वो उत्तर इटली में एक कठपुतली राज्य के प्रधान के रूप में स्थापित किया गया। 
 
26 अप्रैल 1945 को मित्र सेनाएं इटली पहुंच गईं। देश के गुप्त प्रतिरोधकारियों ने इनका साथ दिया। उसी दिन मुसोलिनी स्विट्जरलैंड भागने की चेष्टा करते हुए पकड़ लिया गया और 28 अप्रैल 1945 को उसे मृत्युदंड दिया गया।
 
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व्लादिमीर इलीइच लेनिन vladimir lenin (1870-1924) : उसे मजदूर वर्ग का महान नेता और शिक्षक माना जाता है, लेकिन सच यह है कि दुनियाभर में इसके समर्थक मजदूरों की महज राजनीति कर सत्ता हथियाने का ही कार्य करते हैं। मजदूर तो आज भी मजदूर है। वाममंथी विचारधारा लोगों को समान रूप से गरीब बनाना जानती या चाहती है, अमीर नहीं।
 
व्लादिमीर इलीइच लेनिन दुनिया की पहली सफल मजदूर क्रांति के नेता थे। लेनिन के नेतृत्व में सोवियत संघ में पहले समाजवादी राज्य की स्थापना हुई थी। उसने मजदूरों को यह बताया कि शोषण-उत्पीड़न और बंधनों से मुक्त होकर अपना हक मांगना है, लेकिन जब मजदूरों के कंधे पर चढ़कर लेनिन सत्ता में आए तब वे बदल गए। मजदूर आज भी मजदूर है। लादा गया समाजवाद ज्यादा समय तक नहीं चला।
 
लेनिन का जन्म 22 अप्रैल 1870 को रूस के सिम्बीर्स्‍क नामक एक छोटे-से शहर में हुआ था। उनके पिता शिक्षा विभाग में अधिकारी थे। उन दिनों रूस में जारशाही का निरंकुश शासन था और मजदूर तथा किसान आबादी भयंकर शोषण और उत्पीड़न का शिकार थी। दूसरी ओर पूंजीपति, जागीरदार और जारशाही के अफसर ऐयाशीभरी जिंदगी बिताते थे। 
 
लेनिन के बड़े भाई अलेक्सान्द्र एक क्रांतिकारी संगठन के सदस्य थे जिसने रूसी बादशाह (जिसे जार कहते थे) को मारने की कोशिश की थी। लेनिन 13 वर्ष के थे तभी अलेक्सान्द्र को जार की हत्या के प्रयास के जुर्म में फांसी पर चढ़ा दिया गया था। उनकी बड़ी बहन आन्ना को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। इन घटनाओं ने उनके दिलो-दिमाग पर गहरा असर डाला और निरंकुश जारशाही के प्रति उनके मन में गहरी नफरत भर दी। लेकिन साथ ही उन्हें यह भी लगने लगा कि अलेक्सान्द्र का रास्ता रूसी जनता की मुक्ति का रास्ता नहीं हो सकता।
 
कानून की पढ़ाई करने के दौरान उन्होंने विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेना शुरू किया और कार्ल मार्क्‍स तथा फ्रेडरिक एंगेल्स की रचनाओं से उनका परिचय हुआ। रूसी क्रंतिकारी विचारक प्लेखानोव द्वारा बनाए गए ‘श्रमिक मुक्ति दल’ में वे सक्रिय हुए। फिर वे रूस के सबसे बड़े औद्योगिक शहर सेंट पीटर्सबर्ग आकर मजदूरों को संगठित करने के काम में जुट गए। बस यहीं से उनका सत्ता का सफर शुरू हुआ। लेनिन ने अपना दर्शन खुद गढ़ा और अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘क्या करें’ में उन्होंने सर्वहारा वर्ग की नए ढंग की क्रांतिकारी पार्टी के सांगठनिक उसूलों को प्रस्तुत किया।
 
क्रांति के अपने सिद्धांत को लेनिन ने अक्टूबर क्रांति के जरिए साकार कर दिखाया। क्रांति में हजारों मजदूरों का खून बहा। मजदूरों के नेतृत्व में आखिरकार लेनिन ने सत्ता परिवर्तन कर दिया। कम्युनिस्ट पार्टी की अगुवाई में सारे देश के मेहनतकश अपने राज्य की हिफाजत करने के लिए उठ खड़े हुए। 1917 से 1921 तक रूस में भीषण गृहयुद्ध चलता रहा, लेकिन आखिरकार शोषकों को कुचल दिया गया और लेनिन की देखरेख में समाजवादी निर्माण का काम जोर-शोर से शुरू हो गया।
 
1918 में क्रांति के दुश्मनों की साजिश के तहत एक हत्यारी द्वारा चलाई गईं गोलियों से लेनिन बुरी तरह घायल हो गए थे। कुछ सप्ताह बाद वे फिर काम पर लौट आए लेकिन कभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो सके। 21 जनवरी 1924 को सिर्फ 53 वर्ष की उम्र में लेनिन का निधन हो गया। लेनिन की मृत्यु के बाद जोसेफ स्टालिन ने उनके काम को आगे बढ़ाया। उन्होंने ही मार्क्‍सवादी विचारधारा को मार्क्‍सवाद-लेनिनवाद का नाम दिया।
 
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जोसेफ स्टालिन : इस रूसी तानाशाह ने राजधानी मॉस्को के निकट अपने घर में 5 मार्च 1953 को अपने बिस्तर में ही दम तोड़ दिया था। स्ट्रोक आने के बाद ही उसने बिस्तर पकड़ लिया था। माना जाता है कि वो 2 करोड़ लोगों की मौत का जिम्मेदार था। अपने शासन का विरोध करने के कारण उसने इन लोगों को मरवाया था।
 
1924 में लेनिन की मृत्यु के बाद बाद रूस की बागडोर स्टालिन के हाथों में आ गई थी। स्टालिन ने न सिर्फ लेनिन की नीतियों को आगे बढ़ाया बल्कि उनमें कतोर्ता लाकर कुछ और परिवर्तन भी किए। अपने विरोधियों को नष्ट करने के नाम पर स्टालिन ने जगह-जगह सेना से लोगों का दमन करवाया।
 
स्टालिन ने शीतयुद्ध के दौरान रूस को दुनिया का दूसरा परमाणु शक्ति संपन्न देश बनाया। 1939 में ग्रेट पर्ज के नाम पर सेना की मदद से लाखों हत्याएं करवाईं।
 
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माओ जेदोंग या माओ या माओ त्से तुंग : माओ को लोग आधुनिक चीन का निर्माता भी मानते हैं। हालांकि चीन ने अब माओ का मार्ग छोड़ दिया है लेकिन इस विचारधारा के कारण भारत अब परेशान है। अमीर घर से आए माओ ने चीन में कम्युनिस्ट राज की स्थापना की। इसके लिए उन्होंने हजारों लोगों की हत्याएं कीं। 
 
1949 से लेकर माओ की मृत्यु तक चीन में उनकी सरकार रही। लेनिन और मार्क्स को कट्टरता की हद तक मानने वाले माओ की विचारधारा से अब चीन धीरे-धीरे बाहर निकल रहा है। हालांकि उनकी विचारधारा को हू जिन्ताओ ने आगे बढ़ाया लेकिन अब वर्तमान के नेता कम्युनिस्ट पार्टी से तो हैं, लेकिन उन्होंने खुली अर्थव्यवस्था का समर्थन करते हुए अब पूंजीवाद का मार्ग अपना लिया है।
 
माओ क्रूर जरूर था लेकिन उसने चीन को एक नया जन्म दिया। चीन को एक नई दिशा दी। दूसरे तानाशाहों की तरह वह खुद के लिए नहीं, चीन के लिए जिया। हालांकि इस पर लोगों में मतभेद हैं। कुछ लोग मानते हैं कि माओ एक तानाशाह थे, जो अपनी सैन्य नीतियों और कानूनों के जरिए हर चीज पर नियंत्रण रखते थे। उन्होंने लोगों की स्वतंत्रता खत्म कर दी थी। कहा जाता है कि कानून के दुरुपयोग के अलावा माओ के शासनकाल में उनकी गलत नीतियों की वजह से लाखों लोगों की मौत हुई थी।
 
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मुअम्मर गद्दाफी ( Muammar Gaddafi ): गद्दाफी पर हजारों लोगों को मौत के घाट उतार देने का इल्जाम है। लीबिया के सिरते शहर में एक घुमक्कड़ बद्दू कबीले में जन्मे मुअम्मर गद्दाफी का उदय दरअसल 1967 में अरब-इसराइल युद्ध में अरब जगत की हार से उपजी अरब राष्ट्रवाद की लहर से हुआ था। इस हार से कई अरब देशों में भारी असंतोष फैल गया था। लीबिया में वहां के शासक इदरिस को इस हार के लिए दोषी ठहराया जा रहा था। 
 
पहले से ही राजशाही से असंतुष्ट लीबियाई जनता के मिजाज को समझते हुए लीबियाई सेना के 27 वर्षीय कैप्टन ने राजशाही को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई। इदरिस के इलाज के लिए विदेश जाते ही मौके का फायदा उठाते हुए गद्दाफी ने रक्तहीन क्रांति से 1 सितंबर 1969 को इदरिस के तुर्की से वापस लौटते ही तख्ता पलट दिया। 
 
गद्दाफी मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर से प्रेरित था, लेकिन थोड़े ही समय में गद्दाफी निरंकुश शासक बन गया। खुद को कर्नल घोषित कर गद्दाफी ने उत्तरी अफ्रीका के सबसे क्रूर तानाशाह के रूप में लीबिया पर 42 साल राज किया। गद्दाफी अपनी कबीलाई पहचान पर बेहद गर्व करता था। वह अपने मेहमानों का स्वागत पारंपरिक तंबू में ही किया करता था। यहां तक कि विदेश यात्राओं के दौरान भी गद्दाफी की जिद होती थी कि वो होटल के बदले अपने साथ लाए आलीशान टेंट में ही ठहरे। 
 
गद्दाफी हमेशा खूबसूरत महिला अंगरक्षकों की टोली से घिरा रहता था। यूक्रेनी नर्स और सुनहरे बालों वाली अंगरक्षकों जैसे शौक ने जल्द ही विदेशी मीडिया में गद्दाफी को सुर्खियों में ला दिया। गद्दाफी का शासन सिद्धांत यही था कि अलग-अलग जनजातियों को आपस में भिड़वा दो और राज करो। अमेरिकी खुफिया एजेंसी द्वारा गद्दाफी का तख्ता पलटने के लिए कई प्रयास किए गए। उसके बाद से गद्दाफी ने धार्मिक समर्थन के लिए अंग्रेजी कैलेंडर के महीनों के नाम तक बदल दिए। 
 
गद्दाफी ने लीबिया की आर्थिक दशा पर ध्यान देते हुए तेलशोधक कंपनियों को चेतावनी देते हुए कहा कि या तो वे नया करार करें या देश से बाहर निकल जाएं। इसके बाद लीबिया की आर्थिक स्थिति में भारी उछाल आया। इससे पहले लीबिया की अर्थव्यवस्था विदेशी तेलशोधक कंपनियों के रहमो-करम पर थी। इसके बाद तो सभी अरब देशों ने गद्दाफी के फॉर्मूले का अनुसरण किया। अरब देशों में 'पेट्रोबूम' का श्रेय बहुत हद तक गद्दाफी को ही दिया जाता है। 
 
गद्दाफी ने अपनी एक अलग ही राजनीतिक विचारधारा बनाई। उसने एक किताब भी लिखी 'ग्रीन बुक', इस किताब में 'लोगों की सरकार’ के बारे में बखान किया गया था। 1977 में गद्दाफी ने लीबिया को एक जम्हूरिया घोषित किया जिसका अर्थ था ‘लोगों का राज’। इसके पीछे तर्क दिया गया कि लीबिया अब सही मायनों में लोकतंत्र बन गया है जिसे लोकप्रिय स्थानीय क्रांतिकारी परिषदें चला रही हैं। जनता के दबाव को कम करने के लिए कर्नल गद्दाफी ने अरब सोशलिस्ट यूनियन नाम की राजनीतिक पार्टी को मंजूरी भी दे दी।
 
इस्लामी गणतंत्र का नारा लगाते हुए गद्दाफी ने 1973 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगा दी। सत्ता के मद में चूर गद्दाफी ने 1980 में कबाइली गुटों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। अफ्रीका के अरब देशों के समर्थन के लिए गद्दाफी ने उत्तरी अफ्रीका के गैर अरब लोगों के समुदाय पर निशाना साधा। 1987 में गद्दाफी ने चाड में ईसाइयों के खिलाफ भी युद्ध छेड़ दिया जिसके परिणामस्वरूप हजारों लोगों की मौत हुई। 
 
सांस्कृतिक क्रांति के दौरान गद्दाफी ने सभी निजी व्यवसाय बंद करवा दिए तथा शैक्षणिक किताबों को आग के हवाले करवा दिया। अपने आलोचकों को गद्दाफी ने मौत के घाट उतरवा दिया। अमेरिका, यूरोप और मध्य-पूर्व में बसे अपने आलोचकों को मारने के लिए गद्दाफी ने भाड़े के हत्यारों का भी इस्तेमाल किया। 
 
गद्दाफी ने उत्तरी आयरलैंड के आईआरए जैसे आतंकी गुटों के साथ-साथ फिलीपीन्स में अबू सय्याफ जैसे खतरनाक आतंकी सगठन को भी समर्थन दिया। गद्दाफी पर स्कॉटलैंड के लॉकरबी में दिसंबर 1988 में पैन एम के एक विमान को उड़ाने की साजिश का भी आरोप लगा था। पश्चिमी देशों को गद्दाफी कभी नहीं सुहाया। 
 
2011 में ट्यूनीशिया से फैली अरब क्रांति से सबसे बुरी तरह लीबिया ही झुलसा है और गद्दाफी के खात्मे के बाद यहां की प्रचुर तेल संपदा के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। गद्दाफी के अंत से 'तेल के खेल' में उलझे अरब राष्ट्रों के लिए एक चेतावनी उठी है जिसे अनसुना नहीं किया जा सकता। 
 
लीबिया पर 42 वर्षों तक एकछत्र राज करने वाले तानाशाह मरने से पहले जान बख्शने के लिए सरकारी सैनिकों से खूब गिड़गिड़ाए। गद्दाफी के आखिरी शब्द थे- 'मुझे गोली मत मारो'। 
 
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इदी अमीन idi amin (1920-2003) : युगांडा के शासक इदी अमीन ने 1971 में सत्ता हथिया ली थी। उसने केवल 8 साल देश पर राज किया लेकिन ये 8 साल जनता के लिए दुखभरे 80 साल बन गए। अमीन 6 लाख लोगों की मौत का जिम्मेदार था। अमीन को लगता था कि किसी भी काम के लिए उससे बेहतर और बड़ा कोई नहीं हो सकता।
 
इदी अमीन सेना प्रमुख और युगांडा के राष्ट्रपति थे। यह मध्य अफ्रीकी देश है। इनका कार्यकाल 1971 से 1979 तक रहा। इस तानाशाह पर नरभक्षी होने के आरोप भी लगे। इदी अमीन ने अपने कार्यकाल के दौरान युगांडा को गरीबी के गर्त में ढकेल दिया था।
 
अमीन ने खुद को 'हिज एक्सीलेंसी' और 'प्रेजीडेंट फॉर लाइफ' घोषित कर लिया था। अमीन का तर्क था कि राष्ट्रमंडल का प्रमुख उन्हें होना चाहिए न कि महारानी एलिजाबेथ को। अमीन की 5 पत्नियां और दर्जनों बच्चे थे फिर भी वो सदैव शादी के लिए कम उम्र लड़की की तलाश में रहता था। उसका मानना था कि कोई भी योग्य लड़की युगांडा के महाराज की धर्मपत्नी बनने के लिए तत्पर रहेगी। 
 
1976 में अमीन ने कहा कि वो स्कॉटलैंड का राजा है। दरअसल, उसने खुद को 'किंग ऑफ स्कॉट' तक घोषित कर लिया था। अमीन का क्रूर शासन उस वक्त खत्म हो गया, जब तंजानिया ने कंपाला को अपने अधिकार में ले लिया था। अमीन वहां से भाग निकला और साल 2003 में उसकी सऊदी अरब में मौत हो गई थी।
 
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सद्दाम हुसैन (1937-2006) : saddam hussein सद्दाम हुसैन पर हजारों कुर्द, शिया और तुर्की के मुसलमानों की मौत का इल्जाम है। उसने इराक के शियाओं को हाशिये पर धकेल रखा था। शियाओं के पवित्र स्थान करबला पर जाने पर रोक लगा रखी थी। इराक में सद्दाम हुसैन की मर्जी के खिलाफ एक पत्ता भी नहीं हिलता था। उसने और उसके बेटों ने इराकी जनता को त्रस्त कर रखा था। उसने शियाओं पर इतने जुल्म ढाए थे कि इंसानियत भी रो पड़ी थी।
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सद्दाम हुसैन के जुल्मोसितम की कहानी जितनी खौफनाक है उनके राष्ट्रपति बनने का सफर उतना ही दिलचस्प। 2 दशकों तक इराक के राष्ट्रपति रहे सद्दाम हुसैन का जन्म 28 अप्रैल 1937 को बगदाद के उत्तर में स्थित तिकरित के पास अल-ओजा गांव में हुआ था। उनके जन्म से पहले ही उनके पिता की मौत हो गई थी। साल 1957 में 20 साल के सद्दाम ने बाथ पार्टी की सदस्यता ली। पार्टी में रहकर उन्होंने सुन्नी जगत में अपनी अलग छवि बनाई और पर्दे के पीछे अपना एक अलग समूह तैयार करते रहे। 16 जुलाई 1979 को अल बकर को सत्ता से हटाकर वे स्वयं इराकी गद्दी पर बैठ गए। 
 
1962 में इराक में विद्रोह हुआ और ब्रिगेडियर अब्दुल करीम कासिम ने ब्रिटेन के समर्थन से चल रही राजशाही को हटाकर सत्ता अपने कब्जे में कर ली। लेकिन उनकी सरकार के खिलाफ भी बगावत हुई हालांकि ये नाकाम रही। सद्दाम हुसैन भी इस बगावत में शामिल थे और पकड़े जाने के डर से सद्दाम भागकर मिस्र में जाकर छिप गए।
 
1968 में एक बार फिर इराक में विद्रोह हुआ और इस बार 31 वर्षीय सद्दाम हुसैन ने जनरल अहमद हसन अल बक्र के साथ मिलकर सत्ता पर कब्जा किया। वक्त के साथ-साथ सद्दाम हुसैन ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली और वे अपने रिश्तेदारों तथा सहयोगियों को सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करते चले गए।
 
सत्ता संभालते ही उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों को मारना शुरू कर दिया। इसी दौरान 1982 में सद्दाम हुसैन ने अपने ऊपर हुए एक आत्मघाती हमले के बाद दुजैल गांव में 148 लोगों की हत्या करवा दी थी। अगस्त 1990 में इराक ने कुवैत को तेल के दामों को नीचे गिराने के आरोप लगाकर उसके साथ जंग छेड़ दी। जनवरी 1991 में अमेरिकी फौज के दबाव के दखल के बाद इराकी सेना को कुवैत से पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस जंग में हजारों इराकी सैनिक मारे गए और पकड़े गए।
 
लेकिन इस शिकस्त के बाद सद्दाम को इराक में शिया समुदाय के विद्रोह का सामना पड़ा और साल 2000 आते-आते अमेरिका में जॉर्ज बुश की ताजपोशी ने सद्दाम सरकार पर दबाव और बढ़ा दिया। इसके बाद 2002 में संयुक्त राष्ट्र के दल ने इराक का दौरा किया और वहां रासायनिक और जैविक हथियारों का जखीरा ढूंढने की कोशिश की लेकिन इसमें उन्हें कोई कामयाबी नहीं मिली। 
 
बावजूद इसके मार्च 2003 में अमेरिका ने अपने मित्र देशों के साथ इराक पर हमला कर दिया और आखिरकार 40 दिन की जंग के बाद 9 अप्रैल 2003 को सद्दाम हुसैन की सरकार को गिरा दिया गया। इसके बाद 13 दिसंबर 2003 को सद्दाम हुसैन को तिकरित के एक घर में अंदर बने बंकर से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद सद्दाम पर कई मामलों में मुकदमा चलाया गया। 
 
आखिरकार 5 नवंबर 2006 को सद्दाम हुसैन को मौत की सजा सुना दी गई और उत्तरी बगदाद के खदीमिया इलाके के कैंप जस्टिस में फांसी दे दी गई। इसके साथ ही दुनिया से एक और तानाशाह का वजूद हमेशा-हमेशा के लिए मिट गया, लेकिन आज इराक में उसकी जगह इस्लामिक स्टेट ने जगह बनाना शुरू कर दी है। इसका प्रमुख बगदादी सद्दाम से भी खतरनाक मंसूबों के साथ आगे बढ़ रहा है।
 
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याह्या खां : जनरल आगा मोहम्मद याह्या खां का जन्म कालवाल में हुआ था। उन्होंने 1969 में पाकिस्तान की सत्ता संभाली और सत्ता संभालने के साथ ही मार्शल कानून लागू कर दिया। याह्या खां ने राजनीतिक सियासत को कुचलने के लिए पूर्वी पाकिस्तान में सेना और सुरक्षा बलों का उपयोग किया जिसकी वजह से वर्ष 1971 में भारत और पाक के बीच युद्ध हुआ।
 
ढाका के मुद्दे और सेना के भारत के सामने सरेंडर करने से वो पाकिस्तान के सबसे बड़े विलेन बन गए। जुल्फिकार अली भुट्टो ने उनकी जगह ली और उन्हें नजरबंद कर दिया। याह्या की 1980 में रावलपिंडी में मौत हो गई और उन्हें राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया।
 
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मोहम्मद जिया उल हक : पाकिस्तान के इस सैन्य प्रमुख ने 1977 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो का तख्ता पलटकर सत्ता हथियाई थी। उन्होंने पाकिस्तान में सैन्य शासन लागू कर दिया और भुट्टो को फांसी दे दी थी।

पहले वे सेनाध्यक्ष के रूप में पाकिस्तान के सैन्य शासक बने फिर 1978 में उन्होंने खुद को पाकिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर दिया। 1988 में जिया उल हक की एक सैन्य विमान में विस्फोट से मौत हो गई थी। उन्होंने एक ओर जहां हजारों शियाओं का कत्ल किया तो दूसरी ओर भारत के कश्मीर को अशांत क्षेत्र बनाने के लिए एक योजना बनाई। जिस पर बाद के शासकों ने काम किया।
 
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होस्नी मुबारक ( hosni mubarak ): पूरा नाम मुहम्मद होस्नी सईद इब्राहीम मुबारक। जन्म 4 मई 1928 को। वे अरब गणराज्य मिस्र के चौथे राष्ट्रपति थे। उन्हें 1975 में उपराष्ट्रपति नियुक्त किया गया और 14 अक्टूबर 1981 को राष्ट्रपति अनवर अल-सादात की हत्या के बाद उन्होंने राष्ट्रपति का पद संभाला। मुहम्मद अली पाशा के बाद वे सबसे लंबे समय से मिस्र के शासक रहे हैं। यह भी आश्चर्य है कि 1995 में इन्हें जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
 
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दरअसल, मिस्र के राष्ट्रपति अनवर अल-सादात की एक सैनिक परेड के दौरान कुछ इस्लामिक कट्टरपंथियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद उपराष्ट्रपति होस्नी मुबारक को राष्ट्रपति की गद्दी पर बैठा दिया गया। नवंबर 1981 में जनमत के आधार पर उन्हें राष्ट्रपति चुन लिया गया। इसके बाद 1987, 1993, 1999 और 2005 तक हर बार वे राष्ट्रपति पद पर काबिज रहे। 
 
गरीबी और दमन से नाराज हजारों लोगों ने 25 जनवरी 2011 से मिस्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया जिसे रोकने के लिए होस्नी मुबारक ने पुलिस और टैंक भेजे। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई मुठभेड़ में काहिरा, सुएज और एलेक्सेंड्रिया में 24 लोग मारे गए और 1,000 से भी ज्यादा घायल हुए। 
 
फरवरी के पहले हफ्ते में काहिरा के तहरीर चौक पर लाखों लोग इकट्ठा हुए और उन्होंने मुबारक से देश छोड़ने के लिए कहा। मुबारक ने पहले कहा कि वे मिस्र नहीं छोड़ेंगे और इसकी वजह उन्होंने यह बताई कि जनता गरीबी एवं बेरोजगारी से मुक्ति और लोकतांत्रिक सुधार संभवत: नहीं चाहती। 
 
उन्होंने कहा कि वे प्रगति की राह पर चलते रहेंगे, लेकिन 11 फरवरी 2011 को मुबारक ने जनता के आगे घुटने टेक दिए और इस्तीफा दे दिया। 
 
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किम जोंग : 4 साल में सैकड़ों लोगों को तोप से उड़ा देने और फांसी पर चढ़ा देने का इल्जाम है किम जोंग पर। किम जोंग इल अपने पिता किम उल सुंग की मौत के बाद तानाशाह बना था। उत्तर कोरिया सरकार की ओर से जोंग की गोपनीयता बनाए रखने की वजह से उसे ज्यादा नहीं जाना जाता। ये दुनिया के वंशवादी साम्यवादी शासक थे। उनकी मानवाधिकारों की हत्या करने के लिए और मिसाइलों के परीक्षण से लेकर जनता को धमकाने के लिए आलोचना की गई।
 
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जोंग के इस तानाशाही रवैये से अमेरिका ने 2002 में ईरान और इराक के साथ उत्तर कोरिया को ‘एक्सिस ऑफ एविल’ घोषित कर दिया था। नॉर्थ कोरिया को इस दौरान काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जोंग के तानाशाही रवैये से उत्तर कोरिया अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में अलग-थलग हो गया था। जोंग की साल 2011 में मौत हो गई।
 
अगले पन्ने पर तेरहवां क्रूर तानाशाह... 
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फ्रांसवा डूवलियर Francois Duvalier (1907-1971) : अक्सर तानाशाह बहुत डरे हुए होते हैं। हैती के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसवा डूवलियर भी डरे हुए थे। अपने 14 साल के शासनकाल में कई तरह के अजीबोगरीब कार्य किए। मूलत: वे घोर अंधविश्वासी थे और उनका मानना था कि हर महीने की 22 तारीख को उनमें आत्माओं की ताकत आ जाती है। 
 
इसलिए वो हर महीने की 22 तारीख को ही अपने आवास से बाहर निकलते थे। उनका दावा था कि 22 नवंबर 1963 को उन्हीं की आत्माओं की शक्तियों की वजह से अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की हत्या हुई थी। 6 बार उनकी हत्या के लिए प्रयास किए गए थे लेकिन वो हर बार बच निकले थे। वर्ष 1971 में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।
 
अगले पन्ने पर चौदहवां क्रूर तानाशाह... 
 

अयातुल्ला खुमैनी ( ayatollah khomeini) : हालांकि अयातुल्लाह खुमैनी अब तो हट गए हैं लेकिन उनके कारनामों के कारण उनके देश और दुनिया के लोगों को त्रासदी झेलना पड़ी। उन्हीं के काम को अहमदीनेजाद ने आगे बढ़ाने का जिम्मा उठाया है। 
 
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खुमैनी से अमेरिका और इसराइल हमेशा परेशान रहे। उन्होंने अपनी ताकत और धन के दम पर पश्‍चिम और दक्षिण एशिया में विद्रोही समूह को खूब हवा दी। उनका दावा था कि 25 साल में हो जाएगा इसराइल का खात्मा। उनकी इसराइल विरोधी नीति और परमाणु कार्यक्रम के चलते अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे। उन्होंने ही सलमान रुश्दी की किताब 'सैटेनिक वर्सेस' पर प्रतिबंध लगा दिया था।
 
अयातुल्लाह खुमैनी इसलिए तानाशाह माने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने दूसरे मुल्कों में तानाशाही तरीके से दखलअंदाजी की। 1970 के दशक में खुमैनी के चलते इस्लामी देशों की राजनीति में शिया संप्रदाय का वर्चस्व बढ़ने लगा। सऊदी अरब पड़ोस में ईरान के बढ़ते प्रभाव से क्षुब्ध था। 1979 में सऊदी अरब के पूर्वी प्रांतों में पहली बार शिया समुदाय ने सल्तनत के खिलाफ सिर उठाना शुरू कर दिया था। दु‍नियाभर में रह रहे शिया समुदाय को वह हवा दे रहा था। अयातुल्ला खुमैनी के हाथों में ईरान का नेतृत्व आते ही मक्का में हज के दौरान हर साल शिया समुदाय के लोग सऊदी प्रशासन के विरोध में प्रदर्शन करने लगे। 
 
दरअसल, मक्का सऊदी अरब में है। वहां सऊदी अरब के अहले हदीस समुदाय का वर्चस्व चलता है। वे शिया समुदाय की बढ़ती आक्रामकता से खिन्न थे। 1981 में ईरान से प्रशिक्षित 72 आतंकवादी बहरीन में घुसे और बहरीन को लगभग बंधक बना लिया था। 1984 में तो ईरान ने हजयात्रा के दौरान भयंकर हंगामे की योजना तैयार की। उस योजना के तहत ईरान ने हज के लिए सबसे बड़ी संख्या 1,54,000 हजयात्रियों को मक्का भेजा। ईरानियों ने मक्का में दंगा कर दिया। 
 
इसी साल कुवैत में भी ईरान के समर्थन से आतंकी हमले हुए। कुवैत में शिया समुदाय की आबादी लगभग 25 से 35 फीसदी है। ईरान के इस प्रभाव से लड़ने के लिए अरब देशों ने पाकिस्तान सहित सभी सुन्नी देशों और लोगों से ईरान के खिलाफ उठ खड़े होने की अपील की। पाकिस्तान में जिया-उल-हक सरकार ने शिया समुदाय का कल्लेआम शुरू करना शुरू कर दिया। शिया लोगों को कत्ल करने के लिए सिपाही-शहाबा नामक एक संगठन गठित हुआ। इस संगठन को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का पूरा समर्थन प्राप्त था।
 
अयातुल्ला खुमैनी के उदय ने अरबों के बीच वर्चस्व का नया संघर्ष छेड़ दिया। 1980-88 के बीच लंबा ईरान-इराक युद्ध हुआ, जो अनिर्णीत रहा। ईरान पर नियंत्रण करने में विफल रहने पर सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर आक्रमण किया और वहीं से दुनिया का भविष्य बदल गया।

अगले पन्ने पर अंत में कुछ और तानाशाहों के नाम... 

सपरमूरत नियाजोव (1940-2006) : तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति नियाजोव खुद को एक ऐसे तानाशाह के रूप में पेश करते थे, जैसे कोहन के काल्पनिक पात्र 'डिक्टेटर' का चरित्र है। उन्होंने अपनी 15 मीटर ऊंची सोने की परत चढ़ी प्रतिमा बनवाई थी जिसका मुख सूरज की तरफ था।
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हालांकि तुर्कमेनिस्तान की अधिकांश जनता गरीबी में जीवन जी रही थी, लेकिन नियाजोव ने राजधानी में एक बर्फ का महल बनवाया और रेगिस्तान के बीचोबीच एक झील के निर्माण का आदेश दिया।
 
उन्होंने अपने नाम पर शहर, पार्क बनवाए। यहां तक कि जनवरी महीने का नाम बदलकर उसका नामकरण अपने नाम पर कर दिया। वर्ष 1997 में धूम्रपान छोड़ने के बाद उन्होंने अपने सारे मंत्रियों को ऐसा ही करने को कहा था। उन्होंने नाटक, ओपेरा को तो प्रतिबंधित किया ही, साथ ही पुरुषों के लंबे बाल रखने पर प्रतिबंध लगा दिया।
 
सद्दाम हुसैन की तरह ही उन्होंने एक किताब लिखी। 'रुखनामा' तुर्कमेनिस्तान के इतिहास पर उनके विचारों का संग्रह है। स्कूल और विश्वविद्यालयों में इसे पढ़ाया जाना अनिवार्य कर दिया गया। 2006 में उनका निधन हो गया और 2011 में उनकी स्वर्ण प्रतिमा भी हटा दी गई।
 
पॉल पॉट : पॉल पॉट और उसकी सेना ने 1975 में कंबोडिया की सत्ता संभाली थी। वो 1976 में नई साम्यवादी सरकार का प्रधानमंत्री बना था और अपनी तानाशाही शुरू कर दी। पॉट और उनकी सेना को खमेर रूज के नाम से जाना जाता था। इसने माओवादी कृषक सोसायटी बनाने के लिए निजी संपत्ति, मुद्रा और कई शहरों को खत्म कर दिया था। 
 
इसके शासन के दौरान जनसंख्या का करीब 20% हिस्सा बेगार, अकाल आदि से मारा गया था। 1979 में वियतनाम के कंबोडिया में मिल जाने पर पॉट को बाहर कर दिया गया था लेकिन वो खमेर रूज में सक्रिय रहा। 1985 में रूज से रिटायर हुआ। उसकी 1998 में मौत हुई, लेकिन मौत के कारणों पर रहस्य बरकरार है। हालांकि आधिकारिक घोषणा की गई थी कि उसकी मौत हार्टअटैक से हुई है।
 
किंग अब्दुल्ला (सऊदी अरब) : 1995 से सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे हैं सऊदी शाह किंग अब्दुल्ला। आज भी सऊदी अरब में महिलाएं गाड़ी ड्राइव नहीं कर सकती हैं। परिवार के पुरुष सदस्यों की अनुमति के बगैर नौकरी करना तो दूर वह घर से बाहर शॉपिंग करने भी नहीं निकल सकती हैं। किंग अब्दुल्ला के शासनकाल में सऊदी अरब में मानवाधिकारों का जमकर उल्लंघन हुआ।
 
उमर अल बशीर (सूडान) : 62 वर्षीय बशीर 1989 में एक विद्रोह का नेतृत्व करने के बाद सत्ता पर काबिज हुए और आज ‍तक सूडान के सर्वेसर्वा हैं। पश्चिमी सूडान के दारफुर में फरवरी 2003 से अब तक बशीर के शासनकाल में 1 लाख 80 हजार लोगों को मौत के घाट उतारा जा चुका है और 20 लाख से ज्यादा बेघर हो गए हैं। बशीर के सैनिकों का वर्चस्व अभी तक यहां पर कायम है। अब उत्तरी अफ्रीका में फैलती बेचैनी से सूडान भी विचलित होने लगा है।
 
अलेक्जेंडर लुकाशंको : अलेक्जेंडर लुकाशंको ने 1994 में बेलारूस के राष्ट्रपति का पद संभाला था और वे अब तक अपनी गद्दी पर कायम हैं। लुकाशंको ने 1975 से 1977 तक फ्रंटियर ट्रूप्स में बॉर्डर गार्ड के तौर पर और फिर सोवियत आर्मी में 1980 से 82 तक काम किया। 
 
1977-1978 में लुकाशंको ने मोगीलेव में कॉमसोमोल यानी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ सोवियत यूनियन की युवा शाखा बनाई, साथ ही कृषि फॉर्म के निदेशक के रूप में काम किया। 1990 में वे बेलारूस की सुप्रीम काउंसिल में अकेले ऐसे डिप्टी बने जिन्होंने कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेडेंट स्टेट्‌स बनाया।
 
लुकाशंको ने 1993 में बेलारूसी संसद की एंटी करप्शन कमेटी के चेयरमैन के रूप में स्पीकर स्टैनीस्लाव के साथ 70 सरकारी अधिकारियों को दोषी बताते हुए सबसे इस्तीफा दिलवाया। 1994 में नए बेलारूसी संविधान के निर्माण के साथ हुए राष्ट्रपति चुनाव में लुकाशंको जीत गए। राष्ट्रपति बनने के बाद सुप्रीम सोवियत के नियम-कानूनों को छिन्न-भिन्न करते हुए लुकाशंको ने देश का प्रतीक चिह्न भी बदल दिया। 
 
नए संविधान से लुकाशंको के शासन को कानूनी तौर पर तानाशाही की इजाजत मिल गई। लुकाशंको की आर्थिक नीति अनिश्चित और कथित मार्क्सवादी दृष्टिकोण वाली रही है। यहां के 80 प्रतिशत संसाधन राज्य द्वारा नियंत्रित हैं। रूसी समर्थन की वजह से ही समय पर वेतन और पेंशन का भुगतान हो पा रहा है। मानवाधिकार हनन बड़े पैमाने पर है। विपक्षी दलों के नेता नजरबंद कर दिए जाते हैं। लुकाशंको की कैबिनेट के ही दो सदस्य रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। 2006 के चुनाव में लुकाशंको ने विपक्ष के खड़े होने पर प्रतिबंध लगा दिया। 
 
निकोलाई चाउसेस्कू : : रोमानिया के इस कम्युनिस्ट तानाशाह का अंत भी बहुत बुरा हुआ था। वर्ष 1989 में क्रिसमस के दिन बुखारेस्ट में सेना के बंदूकधारियों ने उसे मौत के घाट उतार दिया था। कई सैनिकों में उसे मारने की होड़ थी। इस वजह से लॉटरी निकालकर यह तय किया गया कि निकोलाई का अंत कौन करेगा?
 
फ्रेंसिको फ्रांको : फ्रेंसिको फ्रांको स्पेन का सबसे क्रूर तानाशाह था। वो सार्वजनिक तौर पर अपने दुश्मनों को फांसी के लिए जाना जाता था। वो अपने लोगों की हत्याओं के लिए ज्यादा जाना जाता था। साथ ही वो उनकी हत्या गला घोंटकर करवाता था।
 
फर्डीनेंड मार्कोस : इन्होंने 21 साल तक फिलीपींस की सत्ता पर अपना कब्जा रखा। वहां की नाममात्र की संसद पूरी तरह इनके नियंत्रण में थी। अंततः 1986 के चुनाव में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी और निर्वासित जीवन बिताते हुए बाद में हवाई द्वीप में इनकी मृत्यु हुई। 
 
पार्क चुंग-ही : उत्तर कोरिया में इस तानाशाह ने 18 साल तक शासन किया। सत्ता में बने रहने के लिए संविधान में संशोधन किया तथा सारे देश में आपातकाल घोषित कर दिया। उन्होंने अपनी गुप्तचर व्यवस्था के माध्यम से शासन को अपने नियंत्रण में रखा।
 
एलफ्रैडो स्ट्रॉसनर : स्ट्रॉसनर ने 35 साल तक पैराग्वे में शासन किया। इस सैनिक शासक ने यूएस के सहयोग से अपना शासन बनाए रखा। बाद में इनके मातहत द्वारा विद्रोह कर देने के बाद सत्ता पर कब्जा कर लेने से इन्हें ब्राजील में निर्वासित जीवन बिताना पड़ा।
 
मोबुटू सीसी-सीको : कांगो पर इस तानाशाही नेता ने 32 सालों तक शासन किया। यह तानाशाह सार्वजनिक फांसी देने तथा भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान स्थापित करने के कारण चर्चा में रहा। एक सैनिक विद्रोह द्वारा पड़ोसी देश रवांडा के सहयोग से इन्हें सत्ता से हटाया गया। 1997 में निर्वासित जीवन बिताते हुए मोरक्को में इनकी मृत्यु हुई।
 
अगस्तो पिनोचे : चिली पर पिनोचे ने 16 वर्षों तक शासन किया। उन्होंने अपने देश में आर्थिक सुधार किए, पर ये अपने विरोधियों का बर्बरतापूर्वक दमन करने के लिए जाने जाते रहे। 1987 में अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण कराए गए जनमत संग्रह में इन्हें अपना पद छोड़ना पड़ा। 
 
मैन्युअल नोरिएजा : पनामा में नोरिएजा ने 6 सालों तक शासन किया। इन्हें अमेरिका का सहयोग प्राप्त था। इन पर ड्रग्स स्मगलिंग के आरोप भी लगे। 
 
सुहार्तो : सुहार्तो इंडोनेशिया के सैनिक शासक और दूसरे राष्ट्रपति थे जिनका कार्यकाल 1967 से 1998 तक रहा। सुहार्तो सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल थे। एक अनुमान के अनुसार इनके शासनकाल में 5 लाख इंडोनेशियन नागरिक मारे गए। सुहार्तो के बारे में यह भी कहा जाता है कि उन्होंने देश को गरीबी के गर्त से निकाला। लोकतंत्र समर्थकों के तीव्र विरोध के चलते उन्हें 1998 में बर्खास्त कर दिया गया। 
 
निकोली सियुस्यु : रोमानिया में इन्होंने 24 वर्ष तक शासन किया। इन्होंने अपने को एक कम्युनिस्ट के रूप में प्रचारित किया। एक जनविद्रोह के जरिए इन्हें पद से हटाया गया। 
 
अली अब्दुल्लाह सालेह : दक्षिण यमन में अलगाववादी आंदोलन के नेता सालेह। दक्षिणी और उत्तरी यमन के दोनों क्षेत्रों में जाति को लेकर गहरी खाई बना दी गई है। राष्ट्रपति सालेह ने 2013 में अपना पद छोड़ने की घोषणा करते हुए विपक्ष को राष्ट्रीय सरकार के गठन की पेशकश की, लेकिन विपक्ष ने इसे ठुकरा दिया। 
 
यमन के विभाजन से पहले 1977 में उत्तरी यमन की सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल रहे सालेह यमन के प्रथम राष्ट्रपति इब्राहीम अल हम्दी की हत्या के बाद 1982 में जनरल पीपुल्स कांग्रेस पार्टी के मुख्य सचिव बने और फिर 1983 में उत्तर यमन के राष्ट्रपति। 
 
सोवियत संघ के पतन के बाद दक्षिण यमन के कमजोर पड़ने पर उसे 1990 में उत्तर यमन से जोड़ा गया और इस संधि के बाद भी सालेह राष्ट्र प्रमुख बने रहे। इसके बाद यमन में बहुदलीय व्यवस्था की शुरुआत हुई और प्रत्येक 3 साल में संसदीय चुनाव कराने का फैसला लिया गया।  1993 के चुनाव में जनरल पीपुल्स पार्टी की जीत के साथ सालेह फिर राष्ट्र प्रमुख बने। 1999 में वे पूर्व राष्ट्रपति नजीब कहतन के बेटे एवं अपनी ही पार्टी के नेता अल शाबी को हराकर पुन: राष्ट्रपति बने।
 
सालेह ने अपने शासन के 24 साल पूरे होने के बावजूद 2006 में हुए चुनाव में धांधली करते हुए राष्ट्रपति पद हथिया लिया। इनके शासनकाल में देश को गरीबी, बेरोजगारी, सांप्रदायिक तनाव, भ्रष्टाचार, मानवाधिकारों का हनन और शोषण जैसी तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। 
 
मोहम्मद अय्यूब खान : मोहम्मद अय्यूब खान 1958 से 1969 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे। अय्यूब खान सबसे कम आयु के जनरल भी हुए हैं जिन्होंने सरकार से विद्रोह करके सत्ता पर कब्जा कर लिया था।
 
हुसैन मोहम्मद इरशाद : हुसैन मोहम्मद इरशाद बांग्लादेश के पूर्व सैन्य तानाशाह थे जिन्होंने 1981 से 1991 तक शासन किया। 1991 में उनके सत्ता से हटने के तुरंत बाद ही जापान से स्पीड बोट की खरीदारी में उन्हें 30 करोड़ टका यानी 43.43 लाख डॉलर की रिश्वतखोरी का दोषी करार दिया गया था। 
 
जनरल परवेज मुशर्रफ : परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के 10वें राष्ट्रपति थे। इन्होंने सेना प्रमुख रहते हुए अक्टूबर 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को हटाकर सत्ता हथियाई थी। अगस्त 2008 में पाकिस्तानी अवाम और अमेरिका के भारी दबाव के बाद इस नेता ने पद छोड़ा था। फिलहाल ये लंदन में रहते हैं।

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