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अफ्रीका में इबोला जैसे खतरनाक मारबर्ग वायरस की दस्तक, 2 की मौत, 98 क्वारंटीन

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मंगलवार, 19 जुलाई 2022 (13:08 IST)
घाना। पश्चिम अफ्रीकी देश घाना ने पिछले दिनों मारबर्ग वायरस (Marburg virus) के पहले दो केस दर्ज किए। घाना की सेनेगल लेबोरेटरी ने दो मरीजों में इस वायरस के पाए जाने की पुष्टि की है। विशेषज्ञों की मानें तो, ये बीमारी इबोला जितनी खतरनाक है और दुनिया में इसके लिए अभी तक कोई भी दवाई या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। 
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, मारबर्ग वायरस का पहला केस घाना के एक 26 वर्षीय व्यक्ति में मिला था जिसकी अगले दिन मौत हो गई थी। दूसरा केस एक एक 51 वर्षीय महिला का आया, जिसे उसी दिन मृत घोषित कर दिया गया था। 
 
घाना के स्वास्थय अधिकारियों के अनुसार 98 अन्य लोगों को संदिग्ध मानकर क्वारंटीन कर दिया गया है। WHO, अफ्रीका के निदेशक ने मारबर्ग संक्रमण को लेकर अफ्रीकी देशों के लिए चेतावनी जारी करते हुए विशेष सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं। 
 
क्या है मारबर्ग वायरस?
मारबर्ग वायरस या MVD को मारबर्ग हेमोरेजिक फीवर के नाम से भी जाना जाता रहा है। यह वायरस इंसानों के शरीर में घुसकर एक बड़ी बीमारी का रूप धारण करने की क्षमता रखता है, जिसकी मृत्युदर 88 प्रतिशत से ज्यादा हो सकती है। इस बीमारी को आज से करीब 40 साल पहले जर्मनी के दो शहरों में देखा गया था। वैज्ञानिकों के अनुसार यह वायरस इबोला परिवार का ही सदस्य है, दोनों बीमारियां दुर्लभ हैं और तेजी से फैलती हैं। यह वायरस कोरोना की ही तरह चमगादड़ों से फैलता है और एक व्यक्ति से दूसरे में भी संचारित हो सकता है। 
 
मारबर्ग वायरस के संभावित लक्षण:
इससे होने वाली बीमारी के लक्षण 2 से 21 दिनों के बीच नजर आने लगते हैं। तेज बुखार, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, उल्टी-दस्त, डायरिया, पेट दर्द ठंड लगना और वजन कम होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं। WHO का कहना है कि इस वायरस से संक्रमित व्यक्ति की हालत बेहद अजीब हो जाती है। उसकी आंखें गहरी और चेहरा भावहीन हो जाता है।
अगर वायरस 2 हफ्तों से ज्यादा किसी व्यक्ति के शरीर में रहता है तो उसे लिवर फेलियर होने और अत्यधिक सुस्त होने का खतरा बना रहता है। भारी मात्रा में रक्तस्त्राव होने से व्यक्ति की जान भी जा सकती है। 
 
मारबर्ग का उपचार कैसे किया जाए?
मारबर्ग वायरस (MVD) को मलेरिया, टाइफाइड आदि अन्य वायरल बुखारों से अलग करना मुश्किल है। हालांकि, सैंपल की लैब टेस्टिंग के बाद संदिग्धों में वायरस की पुष्टि कर दी जाती है। 
फिलहाल, इस बीमारी के लिए कोई भी दवा या ट्रीटमेंट दुनिया में उपलब्ध नहीं है। WHO के अनुसार प्रारंभिक स्टेज पर लक्षणों के आधार पर दवाइयां देकर मरीज का उपचार किया जा सकता है। ऐसी वायरल बीमारियों में ORS और इंट्रावेनस फ्लुइड्स आदि मुख्य रूप से दिए जाते हैं। 

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