वह आखिरी ओवर...

मुंबई इंडियन्स टीम का विश्लेषण

आईपीएल टूर्नामेंट की सबसे महँगी टीमों में से एक है मुंबई इंडियन्स। विश्व के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में शुमार सचिन तेंडुलकर के हाथों में इसकी कमान है। आईपीएल की शुरुआत में सचिन नहीं खेल पाए थे, लेकिन उनकी वापसी ने टीम को दमदार बनाया। आइए देखते हैं पहले आईपीएल टूर्नामेंट में मुंबई इंडियन्स टीम का प्रदर्शन कैसा रहा-

मुंबई इंडियन्स के लिए टूर्नामेंट की शुरुआत की खराब रही। आईपीएल शुरू होने से पहले ही लसिथ मलिंगा और सचिन तेंडुलकर इंजुरी के कारण टीम से बाहर हो गए। सचिन ने तो बीच में वापसी भी कर ली लेकिन मलिंगा तो अपनी चोट की वजह से टीम से जुड़ ही नहीं पाए। इसके बाद हरभजनसिंह के थप्पड़ कांड ने टीम का नाम खराब किया।

शान पोलाक की कप्तानी में टीम ने कुछ मैच जीतकर उम्मीदें जगाईं और उम्मीदों को और बल मिला जब सचिन की वापसी हुई। सचिन की वापसी (14 मई, विरुद्ध चेन्नई सुपर किंग) से टीम में ऐसा जोश आ गया कि चेन्नई सुपर किंग के खिलाफ उसने 157 रनों के लक्ष्य को 14वें ओवर में ही पा लिया। हालाँकि इस मैच में सचिन ने केवल 12 रनों का योगदान दिया लेकिन उनकी मौजूदगी ही अपने आप में बड़ी बात है।

इसके बाद सौरव गांगुली की कोलकाता नाइट राइडर्स को मुंबई इंडियन्स ने बुरी तरह रौंदा और केवल छह ओवर के खेल में उसे आठ विकेट से हरा दिया। इसके बाद 18 मई को मुंबई इंडियन्स ने डेक्कन चार्जर्स को भी 25 रनों से हराया।
जीत का सिलसिला ऐसा चला कि एक के बाद एक सफलता मिलती ही गई...लेकिन 21 मई को किंग्स इलेवन पंजाब के खिलाफ एक जीता हुआ मैच मुंबई इंडियन्स ने गवाँ दिया। आखिरी चार ओवर में मुंबई इडियन्स को 34 रन बनाने थे और उसके सात विकेट बाकी थे। हड़बड़ाहट में मुंबई ने यह मैच हाथ से निकाल दिया, जिसका खमियाजा उसे उठाना पड़ा।

यहाँ तक भी हालात काबू में थे, मुंबई इंडियन्स को टूर्नामेंट में वापसी के पूरे मौके थे, लेकिन दिल्ली डेयरडेविल्स के खिलाफ अगले मैच में निर्णायक मौके पर सचिन से गेंदबाजी परिवर्तन में कुछ चूक हो गई, जिससे एक बार फिर मुंबई इंडियन्स जीतते-जीतते रह गई। इस मैच में शान पोलाक और ड्वान स्मिथ जैसे प्रभावी गेंदबाजों से केवल 3-3 ओवर ही करवाए गए जबकि वे अपेक्षाकृत किफायती गेंदबाजी कर रहे थे। एक क्रिकेटर के रूप में सभी खिलाड़ी सचिन का सम्मान करते हैं, इसलिए उनकी कप्तानी पर सवाल उठाने वाला कोई न था।

खैर...राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ मुंबई इंडियन्स के पास एक मौका और था, जिसे उसने सिर्फ इसलिए गँवा दिया कि उसके खिलाड़ी ऐन वक्त पर क्रिकेट के बुनियादी उसूलों से हट गए थे। (फर्नान्डो द्वारा निर्णायक मौके पर वाइड करना और जयसूर्या के हाथों से रन आउट न होना इसका उदाहरण है।)

आखिरी ओवर में राजस्थान को जीत के लिए 15 रनों की जरूरत थी और नीरज पटेल और रवींद्र जड़ेजा क्रीज पर थे। आ‍शीष नेहरा से केवल तीन ओवर करवाए गए, जबकि पूरे टूर्नामेंट में प्रभावी गेंदबाजी करने वाले शान पोलाक के ओवर पहले ही पूरे करवा दिए गए। यदि आखिरी ओवर दिलहारा फर्नान्डो के बजाय शान पोलाक ने किया होता तो हो सकता है कि कहानी दूसरी होती। दिलहारा फर्नान्डो द्वार किए गए उस आखिरी ओवर पर एक नजर-

पहली गेंद- फुलर लेंग्थ गेंद, एक रन।
दूसरी गेंद- तीन रन। इन साइड एज के बाद गेंद डीप फाइन लेग पर गई, तब तक तीन रन बन चुके थे।
तीसरी गेंद- फिर फुलर लेंग्थ गेंद और पटेल को जैसे इसका इंतजार ही था, फ्रंटफुट पर आकर बेहतरीन स्ट्रेट ड्राइव। गेंदबाज के ऊपर से छह रन।
चौथी गेंद- ऑफ स्टम्प पर फुलटॉस। एक रन। अब दो गेंदों पर चार रनों की जरूरत।
पाँचवीं गेंद- फुलर लेंग्थ गेंद। एक रन। एक गेंद पर तीन रनों की जरूरत।
छठवीं गेंद- वाइड। एक अतिरिक्त रन और एक गेंद का इजाफा। अब एक गेंद में दो रनों की जरूरत।
छठवीं गेंद- 2 रन। और दबाव में मुंबई इंडियन्स ने मैच गँवा दिया। पटेल ने इस गेंद को पुल करना चाहा लेकिन पूरी तरह बैट पर ले न सके। रन आउट का मौका था, लेकिन जयसूर्या के हाथों से गेंद फिसल गई और वे मौका चूक गए। जयसूर्या ने गेंद नहीं बल्कि इस भव्य टूर्नामेंट का सेमीफाइनल में जाने का मौका अपने हाथों से टपका दिया।

यह आखिरी ओवर का विश्लेषण था, इससे साफ पता चलता है कि गेंदबाज फर्नान्डो के साथ पूरी टीम दबाव में थी और सचिन ने टीम और गेंदबाजों से दबाव कम करने की जाहिर तौर पर कोई कोशिश नहीं की।

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