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राजनीति की चौसर

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इंडियन प्रीमियर लीग
मनोज वर्म

इस खेल ने पुराना सफेद रंग बहुत पहले ही छोड़ दिया था। कारण सफेद रंग पर दाग ज्यादा चमकते हैं। चटक रंगीन रंगों में दाग-धब्बे दिखाई नहीं देते हैं। मगर, पिछले साल जब देश में क्रिकेट का ट्वेंटी-20 स्वरूप इंडियन प्रीमियर लीग के रूप में सामने आया तो क्रिकेट के बजाय चकाचौंध, ग्लैमर और कारोबार के खेल की चर्चा ज्यादा हुई।

खिलाड़ी महँगे दामों पर बिके और उन्हें खरीदने वालों में मुकेश अंबानी, विजय माल्या, प्रीति जिंटा और शाहरुख खान जैसे देश के नामचीन उद्योगपति और फिल्मी सितारे शामिल थे। इन बोली लगवाने वालों के पीछे नेता खड़े थे, जिनमें से कई भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पदाधिकारी भी हैं। तभी यह साफ हो गया था कि अब क्रिकेट भद्रजनों का खेल नहीं रहा।

इस खेल और खिलाड़ियों की लगाम सियासी और कारोबारियों के हाथों में आ गई है। लिहाजा राजनीति की मंडी में क्रिकेट दाँव पर लग गया और आईपीएल देश से बाहर दक्षिण अफ्रीका चला गया।

कारोबार और ग्लैमर के आकर्षक मिश्रण वाली लगभग एक अरब डॉलर की धूम-धड़ाके वाली आईपीएल में भला कारोबारी क्यों न उतरते, लिहाजा अंबानी और माल्या भी हाथ आजमाने क्रिकेट के मैदान में उतर पड़े।

उद्योगपति मुकेश अंबानी ने पिछले साल मुंबई टीम को 447 करोड़ रुपए में खरीदा तो विजय माल्या बेंगलुरू टीम के लिए 446 करोड़ रुपए खर्च कर मालिक बन गए। फिल्मी हीरोइन प्रीति जिंटा ने नेस वाडिया के संग 304 करो़ड़ रुपए में मोहाली की टीम को खरीदा जबकि हीरो शाहरुख खान 300 करोड़ रुपए खर्च कर कोलकाता टीम के मालिक बन गए।

असल में क्रिकेट और राजनीति में खासी समानता है। क्रिकेट देश में आमजन का खेल बन चुका है तो राजनीति भी बिना जनता के नहीं चल सकती। खासतौर से चुनावी मौसम में। जाहिर है इंडियन प्रीमियर लीग राजनीति की भेंट चढ़ रहा है।

वैसे भी लोकसभा चुनाव के लिए किसी पार्टी के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं है। राजनीतिक पार्टियाँ इस समय जनता से जुड़े किसी भी मुद्दे को लपकने के लिए बेकरार हैं। क्रिकेट चूँकि देश के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है इसलिए वे इंडियन प्रीमियर लीग पर राजनीति कर रही हैं।

खेलों को राजनीति से दूर रखना चाहिए लेकिन राजनीति के खिलाड़ी अपनी राजनीति के लिए खेलों को दाँव पर लगाने से भी बाज नहीं आते।

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