यौमे आशूरा यानी मोहर्रम माह की दस तारीख। इस दिन को पूरे विश्व में बहुत अहमियत, अज्मत और फजीलत वाला दिन माना जाता है।
इस दिन खुदा की बड़ी-बड़ी नेमतों की निशानियां जाहिर हुईं और कर्बला की त्रासदी,'हजरते इमाम हुसैन की शहादत' का भी यही दिन है। इसलिए पूरे इस्लामी विश्व में इस दिन रोजे रखे जाते हैं, क्योंकि पैगंबर मोहम्मद भी इस दिन कर्बला की घटना से पहले भी रोजे रखते थे।
तैमूरी रिवायत को मानने वाले मुसलमान रोजा-नमाज के साथ इस दिन ताजियों-अखाड़ों को दफन या ठंडा कर शोक मनाते हैं।
यौमे आशूरा को सभी मस्जिदों में जुमे की नमाज के खुत्बे में इस दिन की फजीलत और हजरते इमाम हुसैन की शहादत पर विशेष तकरीरें होती हैं। इस दिन ज्यादातर मुसलमान अपना कारोबार बंद रखते हैं।
मस्जिदों में नफिल नमाजें अदा कर रोजा रखकर शाम को इफ्तार किया जाता है। घरों में किस्म-किस्म के खाने बनाए जाते हैं।
एक हजार मर्तबा कुल हुवल्लाह पढ़कर मुल्क और मिल्लत की सलामती की दुआएं की जाती है।