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अबकी कोलकाता पर 'कोलाइडर' का दारोमदार

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-कोलकाता से दीपक रस्तोगी

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वि‍श्व के सबसे महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक परीक्षणों में से एक 'बिग बैंग' परीक्षण के फेल होने के ठीक 13 महीने बाद कोलकाता से स्विट्जरलैंड के सीईआरएन गए 20 वैज्ञानिकों की एक टीम ने लार्ज हेड्रॉन कोलाइडर में फोटॉन डिटेक्टर और म्यून आर्म चालू करने में सफलता पा ली है। ये वैज्ञानिक वहाँ की 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में आखिरी परीक्षण कर रहे हैं। सब कुछ ठीक चला तो नवंबर के आखिरी हफ्ते से यहाँ बहु-प्रतीक्षित परीक्षण शुरू भी हो जाएगा।

कोलकाता की साहा इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फीजिक्स (एसआईएनपी) के निदेशक विकास सिन्हा जब इन बातों की चर्चा करते हैं तो जैसे कोलकाता में चले इस परीक्षण की तैयारियों के हर पल के बारे में विस्तार से बताना चाहते हैं। यहाँ एसआईएनपी और वैरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रॉन सेंटर (वीईसीसी) के कुल 20 वैज्ञानिकों ने मिलकर फोटॉन डिटेक्टर विकसित किए, साथ ही, कोलाइडर के म्यून आर्म के लिए महत्वपूर्ण 27 डायोड विकसित किए। इस परीक्षण में फोटॉन की किरणों को तेज रफ्तार के साथ एक-दूसरे से टकराया जाएगा। इससे एक नए सबसे क्षुद्र पदार्थ के अस्तित्व का पता चलने की संभावना जताई जा रही है। कोलकाता के वैज्ञानिक फोटॉन किरणों के टकराने के बाद की स्थितियों का भी अध्ययन वहाँ की सुरंग में करेंगे।

बिग बैंग परीक्षण की अवधारणा 1990 में तैयार की गई थी। तब से ही कोलकाता के दोनों संस्थान इस प्रयोग से जुड़े हुए हैं। यहाँ सुरंग में कोलकाता के वैज्ञानिक फोटॉन मल्टीप्लीसिटी डिटेक्टर (पीएमडी) और म्यून आर्म के प्रभार में हैं। पीएमडी फोटॉन किरणों के टकराने की रफ्तार मापेगा जबकि म्यून आर्म नए आस्तित्व में आए पदार्थ का विश्लेषण करेगा। म्यून आर्म विकसित करने की परियोजना एसआईएनपी ने पूरी की जबकि पीएमडी का जिम्मा वीईसीसी के पास था। दोनों यंत्रों के बारे में दावा है कि ये माइक्रोसेकेंड के भीतर अपना काम करेंगे।

कोलकाता के वैज्ञानिक 2007 में भी बिग बैंग के प्रयोग से जुड़े थे लेकिन तब सिर्फ यहाँ से डायोड भेजा गया था। पिछले साल अक्टूबर में एक साल की तैयारी के बाद परीक्षण शुरू किया गया लेकिन 60 टन लिक्विड हीलियम गैस के लीक होने से मामला अधर में लटक गया। इस बार कोलाइडर में खास सुरक्षा बरती जा रही है।

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पिछली दफा आतंकवादी कार्रवाई का अंदेशा जताया गया लेकिन जाँच में कुछ पता नहीं चल पाया। इस बार कोलाइडर में खास चौकसी के चलते 'कुछ अप्रिय' करने की कोशिश कर रहे फ्रांसिसी मूल के एक वैज्ञानिक को पकड़ा जा चुका है। उसके आतंकवादी नेटवर्क के संपर्क में होने का शक जताया जा रहा है। विकास सिन्हा के अनुसार, 'इस सफलता के बाद परीक्षण से जुड़े वैज्ञानिकों ने राहत की सांस ली है।'

इस बार कोलकाता के वैज्ञानिकों की भूमिका बढ़ी है। खासियत दोनों महत्वपूर्ण उपकरण हैं जिन्हें कोलकाता में तैयार किया गया है। विकास सिन्हा के अनुसार, दोनों यंत्रों का कोलकाता में कई दफा परीक्षण किया गया। इसके बाद ही दोनों को वैज्ञानिकों के दल के साथ पखवारा भर पहले स्विट्जरलैंड भेजा गया। जिनेवा में विश्व की सबसे बड़ी भूमिगत पार्टिकल फीजिक्स प्रयोगशाला- सीईआरएन के लिए 2007 में एसआईएनपी और वीईसीसी ने कंप्यूटर बैक-अप सिस्टम भी तैयार किया था।

यहीं विकसित मल्टीप्लेक्स्ड एनॉलॉग सिग्नल प्रोसेसर (मानस) के कोलाइडर में लगाया गया है। अभी तक सॉफ्टवेयर डिजाइनिंग के लिए पहचान बना चुके भारत के वैज्ञानिकों ने मानस के साथ ही चिप डिजाइनिंग की हार्डवेयर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कदम रखा। मानस के जरिए कोलाइडर में 'क्वार्क ग्लूकॉन प्लाज्मा' नामक पदार्थ का पता किया जाएगा। माना जा रहा है कि 14 खरब साल पहले 'बिग बैंग' के एक माइक्रोसेकेंड के बाद यह पदार्थ बना था। कोलाइडर में इसी पदार्थ की रचना करने की कोशिश हो रही है।

पीएमडी और म्यून आर्म के लिए जरूरी 11 लाख ऐसे माइक्रोप्रोसेसर को जनवरी में सीईआरएन को भेजा गया। चंडीगढ़ का सेमी कंडक्टर कॉम्प्लेक्स और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय भी इस परीक्षण में भाग ले चुके हैं। 'मानस' प्रोजेक्ट के मुखिया सुकल्याण चटर्जी के अनुसार, इस चिप के घरेलू उपयोग की संभावनाओं का पता लगाया जा रहा है। मसलन, स्कैनरों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। सीईआरएन में बंगाल के खाते में एक और उपलब्धि है। दुर्गापुर के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और खड़गपुर आईआईटी की छात्रा रही वैज्ञानिक अर्चना शर्मा ने 2001 में सीईआरएन में परमानेंट स्टाफ साइंटिस्ट के रूप में काम संभाला। वे सीईआरएन की ओर से भारतीय वैज्ञानिकों के साथ 'को-ऑर्डिनेट' कर रही हैं।

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