-बिस्मिल्लाह
आज हर कोई कान पर यूँ हाथ लगाए नजर आता है, जैसे जन्म के साथ ही कान को हाथ से जोड़ दिया गया हो। पहले-पहले तो लगता था कि आशिकबाजी का प्रसाद मिला है और गाल की ललाई छुपाई जा रही है। यह भी लगता रहा कि क्रिकेट की कमेंट्री आ रही होगी..., और जो खेल से अनजान थे, वे समझते थे कि कव्वालों की सोहबत में उठ-बैठ रहा है।
जितने दिमाग, उतनी आशंकाएँ! मगर बाद में तो कोई पिटकर भी आ रहा हो तो शंका का लाभ मिल जाता था कि मोबाइल फोन सुन रहा होगा। तब घरेलू फोन पर भी लोग सवार रहते थे मगर यदाकदा बाहर निकलते थे तो अपनी विशुद्ध-सिंगल काया के साथ भी पाए जाते थे। ऐसा नहीं होता था कि उनके हाथ में फोन न हो तो आप अचकचा जाएँ और बड़बड़ाने लगे... कहीं ये वो तो नहीं! घर में होते थे तो फोन को देखकर ही समझ में आ जाता था कि चोंगा किन हाथों की वजह से क्रेडिल से दो फुट ऊपर हवा में तैर रहा है। बाहर भी रिसिवर को मायनस करने के बाद उन्हें पहचान लिया जाता था।
मगर ये मोबाइल सेवा...! उनके कान की तरह अब शरीर का हिस्सा हो गया है। पत्नी को चाय का भी बोलना होता है तो मोबाइल से लैंड लाइन पर लगाने में नहीं हिचकते हैं। सबसे मुश्किल पल वे होते हैं, जबकि मोबाइल ऐसे पड़ा रहता है, जैसे बच्चा मस्ती करने के बाद गहरी नींद में सो रहा हो। मगर उनसे मोबाइल की यह अदा देखी नहीं जाती है। उन्हें हर पल लगता है कि अब रोया-तब रोया... नहीं... नहीं... बजा! हसरतभरी निगाह से यूँ देखते हैं मोबाइल को जैसे तांत्रिक, श्मशान में नरमुंड को देखता है।
आ क्यों नहीं रहा है कोई फोन...? नहीं आएगा तो क्या मैं हाथ पर मोबाइल धरे बैठा रहूँगा? धिक्कार है ऐसे जीवन पर...! लगा... उठ... हिम्मत कर... जो नंबर याद आए, उसे लगा ले। नहीं हो तो राँग नंबर ही लगा दे... और यह भी न कर सके तो सौ नंबर लगा दे, रेलवे-बस पूछताछ, 197 कहीं तो लगा। वक्त गुजरा जा रहा है... चूके मत चौहान! तभी घंटी बजती है। लैंड लाइन की है। वह गुस्सा हो जाता है कि मोबाइल है... पता नहीं है क्या! उसकी नाराजी उस रेलवे कर्मचारी जैसी है, जो अपने रिश्तेदार से इसलिए खफा है कि वह बस से क्यों आया!
सोचता है उठूँ... या बजने दूँ लैंडलाइन फोन को! हेठी लगती है उसे। गुलामी मानता है... कि चलकर उस तक जाना होता है। न यह पता चलता है कि किसका फोन है और न नंबर देखकर काटने की सुविधा! डर यह भी है कि फोन उठाने गया और इधर कहीं मोबाइल बज गया तो! मन को समझाता है कि यह आवाज मिथ्या है... इसके बहकावे में नहीं आना! मोबाइल की मरणासन्न हालत उसे उकसा रही है... मगर वह विश्वामित्र नहीं है... कि बहक जाए। कि तभी लैंड लाइन फोन थक-हार कर चुप हो जाता है... और मोबाइल बज उठता है 'यार, फोन क्यों नहीं उठा रहा है... घर पर नहीं है क्या?'