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जन्माष्टमी 2020 : श्रीकृष्ण ईश्वर हैं या नहीं?

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अनिरुद्ध जोशी

शनिवार, 8 अगस्त 2020 (10:49 IST)
वेदों के अनुसार परामात्मा अर्थात ईश्वर या ब्रह्म और परब्रह्म के संबंध में साकार और निराकार की विवेचना की गई है। वेदों का ईश्वर अजन्मा और अप्रकट है। यही बात उपनिषद और गीता भी कहती है परंतु इसी के साथ यह भी कहा गया है कि आत्मा उस ब्रह्म का ही अंश है। योग द्वारा चित्त को स्थिर करके आत्मा परमात्मा में लीन अर्थात ब्रह्मलीन हो जाता है। तब वह आत्मा ईश्वरतुल्य कही कई है ईश्वर नहीं। अब यह जानना जरूरी है कि श्रीकृष्ण ईश्वर है या नहीं?

'ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः।।'
उल्लेखनीय है कि अक्रूरजी, अर्जुन और उद्धवजी के मन में यह शंका उत्पन्न हुई थी कि श्रीकृष्ण ईश्वर या भगवान है या नहीं, जिसकी शंका का समाधान उन्होंने किया था।
 
श्री कृष्ण को महर्षि गर्ग मुनि और महर्षि वेद व्यास परमात्मा मानते थे। महाभारत को छोड़कर कृष्ण के जीवन चरित्र के संबंध में पुराणों या अन्य ग्रंथों में महिमापूर्ण चित्रण किया गया। जबकि गीता और महाभारत में अनेक स्थानों पर श्रीकृष्ण ने स्वयं को कभी ईश्वर या परमात्मा नहीं कहा।
 
गीता के श्लोक 13-19 में परमात्मा, आत्मा और प्रकृति में भेद माना है। गीता और महाभारत में कई स्थानों पर भगवान कृष्ण ने परमात्मा की सत्ता को स्वीकार कर यह सिद्ध किया है कि वे स्वयं परमात्मा नहीं हैं। गीता में अनेक स्थानों पर परमात्मा को अन्य वचन में कहा गया है। जहां उत्तम पुरुष (मैं) में लिखा गया है वहां उक्त काल व परिस्थितिवश विशेष प्रयोजन में ऐसा हो सकता है।
 
भगवान का अर्थ है समस्त ऐश्वर्य-युक्त हो तथा धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान वैराग्य से युक्त हो। जो योगयुक्त मोक्ष में स्थित है उसे ही स्थितप्रज्ञ, भगवान, अरिहंत या बुद्ध कहा जाता है। भगवान शब्द का उपयोग परमात्मा या ईश्वर के लिए भी किए जाने से भ्रम उत्पन्न होता है।
 
कृष्ण के बाल जीवन पर अनेक किस्से लिखे गए हैं लेकिन महाभारत में कृष्ण के बाल्यकाल का वृत्तांत नहीं मिलता। महाभारत के हरिवंश पर्व में ही कृष्ण का जीवन वृत्तांत मिलता है। महाभारत के भीष्म पर्व में भीष्म द्वारा कृष्ण की जो महिमा का वर्णन किया गया है वह शिशुपाल द्वारा आपत्ति लिए जाने के कारण ही किया गया था। यह सब वचन प्रशंसा के निमित्त ही कहे गए थे। भीष्म ने कृष्ण के उत्तम चरित्र को देखकर उन्हें नारायण हरि का पद दिया था।
 
 
श्रीमद्भभागवत पुराण में भगवान श्रीकृष्ण को परमात्मा की तरह चित्रित किया गया है। पुराणों के कृष्ण ब्रह्मा, विष्णु और महेष से भी उच्च अवस्था में दर्शाए गए हैं। गोलोक और वैकुंठ लोक को अन्य सभी लोकों से उपर बताया गया है। यह उसी तरह है जिस तरह की शिव पुराण में शिव सर्वोच्च सत्ता है तो विष्णु पुराण में विष्ण और शास्त्रों के पुराण में दुर्गा। परंतु ऐसे में पाठक को ये समझ में नहीं आता है कि आखिर सर्वोच्च सत्ता कौन है। इसका एक ही समाधान है कि वेदों को पढ़ा जाए। महर्षि वेद व्यास भी कहते हैं कि वेदों को ही प्रमाण मानना चाहिए और सभी भगवान उस एक ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता के ही अंश हैं। यहां यह समझने वाली बात भी है कि वेदों का ईश्वर 'ब्रह्म' है। वेदों का ईश्‍वर सृष्टि निर्माता, पालनकर्ता या ध्वंस कर्ता नहीं है परंतु उसके उपस्थित होने से ही यह ब्रह्मांड उसी में से उत्पन्न होकर उसी में लीन हो जाने वाला है। यह सभीकुछ उसकी शक्ति से ही संचालित हो रहा है।
 
 
ईश्वर ही है श्रीकृष्ण : अंतत: कहना होगा की सभी अवतारों में श्रीकृष्ण ही पूर्णावतार हैं। ऐसा क्यों कहा गया? दरअसल, कलाएं दो प्रकार की होती है सांसारिक और आध्यात्मिक। मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना की 16 कलाएं होती हैं। 
 
उपनिषदों अनुसार 16 कलाओं से युक्त व्यक्ति ईश्‍वरतुल्य होता है या कहें कि स्वयं ईश्वर ही होता है। 16 कलाएं दरअसल बोध प्राप्त आत्मा की भिन्न-भिन्न स्थितियां हैं। बोध अर्थात चेतना, आत्मज्ञान या जागरण की अवस्था या होश का स्तर। जैसे...प्राणी के अंतर में जो चेतन शक्ति है या प्रभु का तेजांश है उसी को कला कहते हैं। जिस प्राणी में जितनी चेतना शक्ति अभिव्यक्त हो रही है उतनी ही उसकी कलाएं मानी जाती हैं। इसीसे जड़ चेतन का भेद होता है। बोध की अवस्था के आधार पर आत्मा के लिए प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा के प्रकाश की 15 अवस्थाएं ली गई हैं। अमावास्या अज्ञान का प्रतीक है तो पूर्णिमा पूर्ण ज्ञान का।
 
 
1. पत्‍थर और पेड़ 1 से 2 कला के प्राणी हैं। उनमें भी आत्मा है। उन्हें सुख और दुख का आभास होता लेकिन उनमें बुद्धि सुप्त है। उन्हें भी अन्न और जल की आवश्यकता होती है।
 
2. पशु और पक्षी में 2 से 4 कलाएं होती हैं क्योंकि वे बुद्धि का प्रयोग भी कर सकते हैं।
 
3. साधारण मानव में 5 कला की और सभ्य तथा संस्कृति युक्त समाज वाले मानव में 6 कला की अभिव्यक्ति होती है।
 
4. जो मानव विशेष प्रतिभावाले विशिष्ठ पुरुष होते हैं उनमें भगवान के तेजांश की सात कलाएं अभिव्यक्त होती। तत्पश्चात 8 कलाओं से युक्त वह महामानव ऋषि, मुनि, संत और महापुरुष होते हैं जो इस धरती पर कभी-कभार दिखाई देते हैं।
 
 
5. मनुष्य की देह 8 कलाओं से अधिक का तेज सहन नहीं कर सकती। 9 कला धारण करने के लिए दिव्य देह की आवश्यकता होती है। जैसे सप्तर्षिगण, मनु, देवता, प्रजापति, लोकपाल आदि।
 
 
6. इसके बाद 10 और 10 से अधिक कलाओं की अभिव्यक्ति केवल भगवान के अवतारों में ही अभिव्यक्त होती है। जैसे वराह, नृसिंह, कूर्म, मत्स्य और वामन अवतार। उनको आवेशावतार भी कहते हैं। उनमें प्राय: 10 से 11 कलाओं का आविर्भाव होता है। परशुराम को भी भगवान का आवेशावतार कहा गया है।
 
7. भगवान राम 12 कलाओं से तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं से युक्त हैं। यह चेतना का सर्वोच्च स्तर होता है।  इन्हीं 16 कलाओं से युक्त और उसके पार है शिव। इसीलिए शिव को भी हिन्दू धर्म में सर्वोच्च सत्ता माना गया है।

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