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खाटू श्याम बाबा के बारे में 7 अनसुनी बातें जो आप शायद ही जानते होंगे

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हमें फॉलो करें Khatu Shyam Baba

WD Feature Desk

, शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026 (18:23 IST)
Untold story of khatu shyam baba: राजस्थान के शेखावाटी के सीकर जिले में रिंगस के पास स्थित स्थित है परमधाम खाटू। यहां विराजित हैं खाटू श्यामजी। खाटू का श्याम मंदिर बहुत ही प्राचीन है। यहां पर प्रतिवर्ष फाल्गुन माह शुक्ल षष्ठी से बारस तक यह मेला लगता है। चलिए जानते हैं बाबा श्याम की अनसुनी बातें।
 

1. मोरवीनंदन:

कौन है खाटूश्यामजी: पांडु पुत्र भीम के पुत्र घटोत्कच और घटोत्कच के पुत्र बर्बरिक थे। बर्बरीक को ही बाबा खाटू श्याम कहते हैं। इनकी माता का नाम हिडिम्बा है। बर्बरीक की माता का नाम कामकटंककटा था, जिन्हें मोरवी के नाम से जाना जाता है। अत: अपनी माता के नाम के कारण उन्हें मोरवीनंदन भी कहा जाता है। 
 

2. दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर:

बर्बरीक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। वे एकलव्य, अर्जुन और कर्ण से कहीं ज्यादा बड़े और महान धनुर्धर थे।
 

3. अग्निदेव से मिला था धनुष:

बर्बरीक वीर योद्धा थे और तीनों लोकों को जीतने की सामर्थ्य रखते थे। बर्बरीक ने अपनी मां से ही युद्ध कला सीखी थीं और भगवान शिव को अपनी कठोर तपस्या से  प्रसन्न किया तथा 3 अमोघ बाण भी प्राप्त किए थे। इसी कारण उन्हें तीन बाणधारी के नाम से भी जाना जाता है। बर्बरीक से प्रसन्न होकर अग्नि देव ने धनुष प्रदान किया था। 
 

4. महाभारत युद्ध में लड़ने की इच्छा:

जब कौरवों-पांडवों के बीच महाभारत युद्ध तैयारियां जोरों पर थीं और चारों ओर इस युद्ध की चर्चाएं थीं तब यह समाचार जब बर्बरीक को मिला तो उनकी भी युद्ध में शामिल होने की इच्छा हुई। वे अपनी मां से युद्ध में शामिल होने की अनुमति लेने पहुंचे तथा अपनी मां से आशीर्वाद लेकर उन्हें यह वचन दिया कि वे हारे हुए पक्ष का ही साथ देंगे। नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर युद्ध में शामिल होने के लिए निकल पड़े। युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। बर्बरीक की इस घोषणा से कृष्ण चिंतित हो गए। बाद में ब्राह्मण बनकर श्रीकृष्ण ने उनका शीश दान में मांग लिया। 
 

5. शीश दान:

बर्बरीक द्वारा अपने पितामह पांडवों की विजय हेतु स्वेच्छा के साथ शीशदान कर दिया गया। बर्बरीक के इस बलिदान को देखकर दान के पश्चात श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को कलियुग में स्वयं के नाम से पूजित होने का वर दिया। आज बर्बरीक को खाटू श्याम के नाम से पूजा जाता है। जहां कृष्ण ने उसका शीश रखा था उस स्थान का नाम खाटू है। तभी तो उन्हें कहते हैं- मां सैव्यम पराजित:। अर्थात जो हारे हुए और निराश लोगों को संबल प्रदान करता है। यानी हारे का सहारा खाटू श्याम हमारा। लेकिन वचन देने के कारण बर्बरीक ने प्रार्थना की कि आप अपने वास्तविक स्वरूप के दें, त‍ब श्री कृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और बर्बरीक को उनकी इच्छानुसार अपने विराट रूप में दर्शन दिए। और इस तरह खाटू में भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की पूजा श्याम के रूप में की जाती है। 
 

6. जन्म और शीशदान:

खाटू श्यामजी का जन्म देवउठनी एकादशी के दिन हुआ था और धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार, दानवीर बर्बरीक (खाटू श्याम जी) ने अपना शीश फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को भगवान श्रीकृष्ण को दान में दिया था। ही कारण है कि खाटू श्याम जी के मुख्य मंदिर (सीकर, राजस्थान) में फाल्गुन शुक्ल एकादशी और द्वादशी को सबसे बड़ा मेला भरता है। भक्त मुख्य रूप से द्वादशी के दिन ही बाबा के इस सर्वोच्च बलिदान को याद करते हैं।
 

7. शीश और धड़:

कहते हैं कि कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद खाटू श्याम के शीश और धड़ को अलग अलग नदियों में विसर्जित रख दिया गया था। पानी में बहती हुई धड़ तो हरियाणा के हिसार जिले के बीड़ गांव तक चला गया और शीश सिकर के खाटू नाम की जगह पर पहुंच गया। लोगों को जब यह मिला तो उन्होंने इसे वहीं स्थापित कर दिया।

Edited by Anirudh Joshi

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