- के.पी.सक्सेना
मैं उनके घर पहुँचा तो पाया कि मिर्जा साहब नंगे बदन लुंगी लपेटे बैठे थे। प्लेट में चाय उड़ेल कर सुड़प रहे थे। तोंद सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की तरह आगे निकली हुई थी। सफाचट सर, दाढ़ी में चाय की बूँदें अटकी हुई थीं। मुँह ही मुँह बुदबुदा रहे थे - "कुएँ की गहराई मत नापो, अपनी रस्सी देखो।" मैंने टोका - "किस कुएँ की गहराई नाप रहे हो?
मैं तुम्हें आत्महत्या के आसान तरीके बताता हूँ। मिर्जा वैसे ही भड़क गए जैसे महिला आरक्षण पर मुलायम सिंह के बयान से बसपा वाले और वालियाँ। कतरी हुई सुपारी के दो लच्छे मुँह में झोंक कर बोले - "तुम मेरा दर्द नहीं समझोगे। तमाम उम्र नौकरी की, बैंक में जरा-सा चना-चबेना भर अकाउंट भी है पर आजतक एक लाकर नसीब न हुआ। मिल जाता तो चाभी शान से यों घुमाकर लोगों को दिखाते जैसे भाजपा वाले अपनी नई टीम का प्रचार कर रहे हैं।"
चाय की प्याली मिर्जा की नातिन से लेकर मैंने पूछा - "मिल भी गया तो लाकर में रखोगे क्या? नाती पोतों की चड्ढियाँ, पुरानी जूतियाँ, मेले से खरीदी गई पीतल की अँगूठियाँ या भाभी की खाँसी की दवा की शीशी?" मिर्जा की तोंद दो बार उछल कर शांत हो गई। ठंडी साँस खींचकर बोले - "लाल भय्या, गोरा बनने की चाह तो कौव्वे में भी होती है! ..लोगों के लॉकर अटे पड़े हैं। छह हजार की नौकरी, सोलह हजार की मलाई ऊपर से! देश सेवा के नाम पर दनादन सोने के बिस्कुट लाकर के पेट में समा रहे हैं।
मैं चार रुपए वाला पारलेजी वाला मैदे के बिस्कुट का पैकेट ही लॉकर में रखकर खुदा का शुक्र अदा कर लूँगा। सी.बी.आई. का छापा पड़ता है तो सबसे पहले लॉकर का पेट टटोला जाता है कि कितनी देश सेवा अंदर बंद है। मेरे लाकर पर छापा पड़ेगा तो नाम तो होगा कि मिर्जा रफीउद्दीन का भी लॉकर है। भले ही लॉकर के अंदर से बिस्कुट के चूरे पर रेंग रहा चीटियों का झुंड बरामद हो। मेरे ही एक अजीज के लॉकर पर छापा पड़ा! चाँदी की कई किलो सिल्लियाँ बरामद हुईं। मन ललक कर रह गया। उनका नौकरी करना वसूल हो गया। एक हम थे कि उम्र भर खुसकैट नौकरी बजाते रहे। एक पत्थर की सिल्ली (मसाला पीसने को) घर न ला पाए।
बेगम कहती हैं कि अल्लाह का शुक्र है! अमा असली शुक्र तो तब है कि कने एक लॉकर हो और लॉकर में ला ला कर रखने की तौफीक हो। बेगम कहीं से सुना सुनाया एक शेर भी पढ़ती हैं - "जिन्हें खुदा ने दिया है वह जागते हैं बहुत, जिन्हें वह भूल गया है वह खूब सोते हैं।" अमां ऐसा भी क्या सोना कि पास में एक लॉकर न हो, सोने का एक बिस्कुट न हो। लोगों का माल विदेशों के लॉकरों में हैगा। हमें मुहल्ले की बैंक में ही एक लॉकर मिल जाए तो उसमें अल्लम-गल्लम कुछ झोंक दें।
होने को तो हो कि हमारे लॉकर का नंबर ३९५ है। खुदा जाने जिसके लॉकर का नंबर ३९५ होगा उसकी कितनी समाज सेवा अंदर बंद होगी। ...तुम्हारी बैंक वालों से इतनी जान पहचान है। फलां-फलां बैंक में एक लाकर दिला दो, मियाँ। इधर लॉकर मिला, उधर किसी पार्टी में कूदकर लॉकर का सुहाग जिंदा कर देंगे। बस तुम देखते रहियो। पर मिले तो पहले।" ..मिर्जा ने तोंद के गोल गुंबद पर हाथ फेरा और एक-एक चाय का दूसरा ऑर्डर अंदर फेंक दिया।