किस तरह उसको घर हम कहें जिसमें हो कोई खिड़की नहीं सूने आंगन में कोई कैसे रहे खिलखिलाती जहां कोई लड़की नहीं मैं तो भोली थी और मैं तो अंजान थी एक दिन एक मुझको नियामत मिली एक नन्ही कली मेरे घर में मिली फूलों के पराग से थी वो सनी स्वर्ग की अप्सरा सी वो लगे मुस्कुराए तो जैसे कि हो रोशनी वो हंसे तो अमावस में हो चांदनी मेरा खुद का तो जैसे नया रूप है मेरे आंगन में जैसे खिली धूप हो जरा-जरा सी बात पर ठुनकती है वो पिता के लिए हिरण का छौना है वो भाई का प्यारा खिलौना है वो पड़ोसियों को प्यार की तस्वीर वो लगे मेरे लिए वो ख्वाब की ताबीर वो लगे दुनिया भर की बातों का खजाना है वो सवालों जवाबों का कारखाना है वो
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वो नाजुक कली है मेरे बाग की चलती, फिरती निशानी है अनुराग की उसे इस तरह से बनाना मुझे चालाक दुनिया से जो लड़ सके कितनी मुश्किल आए मगर तरक्की और घर का उजाला बने रूप नारी का सबसे निराला बने सब पूछे भला किसकी लड़की है ये इतरा कर, शरमा कर, मुस्कुराकर कहूं मेरी बेटी है ये।