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चली है रानी मुनिया

प्रभात, जयपुर

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हिन्दी कविता
ND
बनठन पानी लेने को चली है रानी मुनिया
मुनिया का नाटक देखे दुनिया

मुनिया और झुनिया नाटक में जा रही पानी को,
चलने को आवाज लगा रही चुनिया रानी को।

चुनिया बोली रुको बहन, दुह आऊं गैया को,
पलना में झुलना दे आऊं रोते छैया को।

मुनिया बोली बहन सांझ ढलती ही जा रही है
वापस भी आना है तू क्यों देर लगा रही है।

घर के भीतर से चुनिया बोली आऊं-आऊं,
चिल्लावेंगे बहुत ससुर हुक्का भर आऊं।

झुनिया बोली बहना चुनिया नदी दूर भारी,
रस्ते में लेगी घेर रात ये काली अंधियारी।

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आ गई चुनिया संग तो जोड़ी मिल गई तीनों की,
बीती बातें की जी भर तीनों ने महीनों की।

आते-आते जब तीनों को हो गई इतनी देर,
रोने लगे सियार हो गया चारों ओर अंधेर।

मुनिया, चुनिया, झुनिया तीनों घर के घेरे में,
जाती हुई दिखी फिर गुम हो गई अंधेरे में।

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