- सरोज कुमार
बीत गए केशरिया
दिन पलाश के
ले लो, ले लो झुमके अमलतास के।
ओ पीपल, नीम, बड़, सुरजना
कौन जिसे नहीं है मुरझना?
डलिया में दो दिन की
सौ दिन के फूल
कोई फिर क्यों मुरझे बिन हुलास के?
ले लो, ले लो झुमके अमलतास के।
झूल रहे चमकीले सौ-सौ फानूस,
इंकलाब? पीली तितलियों के जुलूस।
सूरज के घोड़े बहके-
ऐसी आग,
धूप निकल भागी है, बिन लिबास के,
ले लो, ले लो झुमके, अमलतास के।
मौसम के हाथों पर मेहँदी के चित्र
धूँ-धूँ दोपहरी, ये तपस्वी विचित्र।
किसकी बिरुदावली के
स्वर्ण मालकौंस
कोई तो बतला दे, ये तलाश के,
ले लो, ले लो झुमके अमलतास के।