किट-किट-किट दांत बज रहे,
भीषण जाड़ा आया भाई,
दादी अम्मा को देखो तो,
हरदम ओढ़े रहे रजाई,
कंबल ओढ़े आग तापते,
फिर भी देह नहीं गरमाई,
पानी लगता दुश्मन जैसा,
छूने से डर लगता भाई
सूरज निकला धूप आ गई,
चारों ओर खुशियां छा गई,
चाय छलक जाती है कप से,
भीषण जाड़ा आया भाई।
- मोहित परमार