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बाल कविता : गरमी भारी

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बाल कविता
गरमी भारी
चैन न मिलता
चुभे लपट
बन तीर।

बंदर से
बोली घरवाली
चलो चलें कश्मीर।

तन से बहे पसीना खारी
क्या होगा ओ राम।
बोला गीदड़ आग लगी है
कहां करें विश्राम॥

भालूजी की गले की हड्डी
बनी रजाई खूब।
नहीं हटाई जाती तन से
गरमी लाती ऊब॥

कौआ कांव-कांव चिल्लाता
नहीं घड़े में नीर।
कंकड़ डाल-डाल के हारा
छूटा मन का धीर॥

गधेमलजी मस्त हुए हैं
रोज लगाते लोट।
कहते लोग व्यर्थ चिल्लाते
गरमी के मन खोट॥

- रामसेवक शर्मा

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