सूर्यकुमार पांडेय
मौसम धूम-धड़ाकों का,
उड़ते हुए पटाखों का।
लो, छूटा अनार देखा,
भागा अंधकार देखो।
माला जैसी लगती है,
दीपों की कतार देखो।
मौसम दीप जलाने का,
जी भर मौज उड़ाने का।
घर-घर में पकवान बने,
हैं ढेरों सामान बने।
हैं लक्ष्मी, गणेश दोनों,
शक्कर से भगवान बने।
मौसम लाई-खीलों का,
दीयों और कंदीलों का।
धूम मच रही बड़ी यहाँ,
लगी दीयों की लड़ी यहाँ।
अंधकार की हार हुई,
उड़ी आज फुलझड़ी यहाँ।
मौसम खील-बताशों का,
मौसम खेल तमाशों का।