जितेन्द्र पुरी गोस्वामी
माँ तेरी उपमा मैं किससे करूँ?
तुम अद्वितीय पावन धारा
गंगा सी कल कल बहती।
कैसे पढूँ तेरा निर्मल मन
यह क्या, सात जन्म भी कम।
तुमने एक आदर्श माता के
गाड़े हैं कई परचम
ममता के फूलों से लदी शाखा का
तुम हो सुंदर कल्पतरू।
माँ तेरी उपमा मैं किससे करूँ?
मेरे मन के भावों को जानने वाली
तुम हो जननी अंतर्यामी
मैंने तुम्हें माना है हे माते!
जग में स्वामियों की स्वामी!
तेरा मन प्रेम का असीम सागर
अचरज होता मुझको भारी,
कभी न छलके ये गागर।
मन करता है तेरा दामन
सभी सुखों से भरूँ।
माँ तेरी उपमा मैं किससे करूँ?