बसंत त्रिपाठी
मुझे रोशनी चाहिए थी
लहलह लहकती हुई
सबसे पहले मैंने खिड़कियाँ खोलीं
फिर दरवाजे
रोशनदान तो खुले ही थे
केवल एक मटमैली बुझी-बुझी सी रोशनी
घर के भीतर आई
जैसे बुस जाता है गर्मियों में रात का बचा खाना
बिजली नहीं थी सो बल्ब जलाने का प्रश्न भी नहीं था
और बल्ब भी एक पीले रंग के अलावा
क्या दे सकते थे आखिरकार
यह एक बंद सुबह थी
बाहर उदास रंग था
आसमान में मोटी परतों वाले बादल
मुझे सूरज का टेलीफोन नंबर मालूम नहीं था
और अगर मालूम होता भी
तो क्या वह रिसीवर उठाता?
बिजली विभाग और सूरज के बीच
यह जो समझौता हुआ है
उसकी शर्तों में दुनिया के बहुत से अँधेरे छुपे हैं
लेकिन हमें रोशनी चाहिए
लहलह लहकती हुई रोशनी।