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मनोचिकित्सक को मनोरोग का खतरा

बीमारी का इलाज बना बीमारी का सबब...

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मनोचिकित्सक
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शक पहले ही था, अब पुष्टि भी मिल रही है। दूसरों के अवसाद या नैराश्य का इलाज करने वाले मनोरोग चिकित्सक 'डिप्रेशन' कहलाने वाले दुख, चिंता या अवसाद से घिरजाने के सबसे निकट होते हैं। जर्मनी में उल्म विश्वविद्यालय के शोधकों ने पाया है कि हर दूसरा मनोचिकित्सक या मनोपचारक स्वयं भी डिप्रेशन की ड्योढ़ी पर खड़ा दस्तक दे रहा होता है। हर पाँचवाँ स्वयं ही पूरी तरह अवसादग्रस्त होता है। यही नहीं, इस बीच यह कोई बिरली बात नहीं रही कि मनोचिकित्सक और उपचारक अपने इलाज के लिए स्वयं भी किसी दूसरे मनोचिकित्सक की शरण लेने लगे हैं।

उल्म विश्वविद्यालय के शोधकों ने पाया कि अपने अध्यन के दौरान उन्होने जिन चिकित्सकों से संपर्क किया, उनमें से चार प्रतिशत ठीक उसी समय अपना उपचार करवा रहे थे।13 प्रतिशत मनोचिकित्सक वही गोलियाँ निगल रहे थे, जो वे अपने रोगियों को भी लिखते हैं। इन शोधकों का अनुमान है कि मनोचिकित्सा के व्यवसाय में लगे लोगों को स्वयं ही जिन भारी मानसिक तनावों को झेलना पड़ता है, वह उन्हें भी अवसाद-विषाद से घिरा मनोरोगी बना देता है। आत्महत्या पर उतारू या आक्रामक क़िस्म के मनोरोगियों से निपटना उन के लिए भी दिन में तारे गिनने जैसा बन जाता है।

उल्लेखनीय है कि जर्मनी में औसतन हर दूसरा आदमी अपने जीवन में कभी न कभी मनोचिकित्सा करवा चुका होता है। लोग बात-बात पर मनोचिकित्सक के पास दौड़ते हैं। अतीत के कुछ अध्ययन दिखाते हैं अस्पताली डॉक्टर भी अकसर अवसाद से पीड़ित होते हैं या तथाकथित बर्न-आउड-सिंड्रोम के आगे घुटने टेक देते हैं।

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इस बीमारी में तन-मन इस बुरी तरह थक जाता है कि वह जवाब दे बैठता है। रोगी कुछ भी करने-धरने की स्थिति में नहीं रह जाता। नींद उड़ जाती है। दिमाग काम नहीं करता। तरह-तरह की शारीरिक बीमारियाँ भी आ घेरती हैं। बुद्धिजीवी वर्ग बर्न-आउड-सिंड्रोम से कहीं अधिक पीड़ित होता है।

हो सकता है कि यह सब जर्मनी की अपनी विशेषता हो। दूसरे देशों में स्थिति इतनी चिंताजनक न हो। जैसी भी हो, प्रश्न यह है कि मनोचिकित्सक जब स्वयं ही मानसिक रोगी हैं या आसानी से मानसिक रोगी बन सकते हैं, तो वे अपने रोगियों की भला कितनी अच्छी चिकित्सा कर पाते होंगे? जो स्वयं डूब रहा है, वह किसी दूसरे डूबते को भला कितना या कब तक बचा पायेगा? शोधकों के मन में यह प्रश्न शायद उठा ही नहीं।

असली समस्या शायद यह है कि केवल अपने स्वार्थ, अपने सुख-दुख की चिंता में व्यस्त रहने के अभ्यस्त पश्चिमी लोग इतने आत्मकेंद्रित और एकाकी होते जा रहे हैं, कि उन्हें अपना दुखड़ा सुनाने वाले तो बहुत मिलते हैं, पर सुनने वाला कोई नहीं मिलता। पैसा लेकर दूसरों का दुखड़ा सुनता है मनोचिकित्सक, जो सुनते-सुनते एक दिन खुद भी बीमार पड़ जाता है।

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