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जलवायु परिवर्तन से बांग्लादेश में कैसे आई विनाशकारी बाढ़?

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शनिवार, 25 जून 2022 (07:49 IST)
बेतहाशा और अनियमित बारिशों के चलते बांग्लादेश के कई हिस्से विनाशाकारी बाढ़ की चपेट में हैं। प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा है कि देश को इस तबाही से फौरन राहत मिलने की उम्मीद नहीं है।
 
बांग्लादेश के कई इलाके पिछले कुछ दिनों से विनाशकारी बाढ़ से घिरे हैं। अब तक 36 लोगों की मौत हो गई है और हजारों लाखों लोग बेघर हो चुके हैं। देश के 64 में से कम से कम 17 जिले प्राकृतिक आपदा से प्रभावित हुए थे। कई इलाकों मे बिजली भी गुल हो गई थी। ज्यादातर प्रभावित जिले उत्तर और पूर्वोत्तर सिलहट इलाके में हैं।
 
आने वाले दिनों में और अधिक वर्षा का अनुमान लगाया गया है। इसे देखते हुए बांग्लादेश के बाढ़ भविष्यवाणी और चेतावनी केंद्र ने मंगलवार को आगाह किया कि देश के उत्तरी इलाकों में जलस्तर खतरनाक ऊंचाई पर बना रहेगा। प्रभावित इलाकों में कई लोग भोजन, पीने के पानी और दूसरी अनिवार्य जरूरतों को हासिल करने के लिए जूझ रहे हैं। स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि पीने के पानी को साफ करने वाली गोलियां पहुंचाने के लिए चिकित्सा दल बाढ़ प्रभावित इलाकों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। 
 
भोजन और पानी की किल्लत
बांग्लादेश के आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे बाढ़ग्रस्त लोगों के लिए खाना और पीने का पानी पहुंचाने के लिए पुरजोर कोशिशों मे जुटे हैं। लेकिन कुछ प्रभावितों का कहना है कि सरकारी मदद सुस्त और नाकाफी है।
 
सिलहट और सुनामगंज क्षेत्रों में काम कर रहीं वॉलन्टियर नफीसा अंजुम खान ने डीडब्ल्यू को बताया कि "दूरदराज के इलाकों में लोगों को कुछ नहीं मिल पा रहा है। सात दिन से मैं उन इलाकों में काम करती आ रही हूं लेकिन मैंने किसी स्थानीय अधिकारी को उन इलाकों तक सहायता सामग्री पहुंचाने की कोशिश करते हुए नहीं देखा है।" उनका कहना है कि बाढ़ग्रस्त इलाकों में काम कर रहे समूह ही लोगों को सूखा भोजन दे पा रहे हैं जो काफी नहीं है। "लोग पके हुए खाने के लिए तड़प रहे हैं। बच्चों का खाना भी नदारद है।"
 
संयुक्त राष्ट्र बाल एजेंसी, यूनिसेफ ने कहा है कि बांग्लादेश की आपातस्थिति से निपटने के लिए उसे 25 लाख डॉलर की तत्काल जरूरत है। संस्था के मुताबिक बाढ़ग्रस्त इलाकों में पानी साफ करने वाली गोलियां, आपात चिकित्सा सामग्री और पानी के बर्तन पहुंचाने के लिए, वह सरकार के साथ मिलकर काम कर रही है। यूनिसेफ ने एक बयान में कहा, "16 लाख बच्चों समेत 40 लाख लोग पूर्वोत्तर बांग्लादेश में बाढ़ से घिरे हुए हैं और उन्हें मदद की तत्काल जरूरत है।"
 
जलवायु संकट से त्रस्त रहा है बांग्लादेश
प्रधानमंत्री शेख हसीना ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया और ऐसी प्राकृतिक विपदाओं का मुकाबला करने के लिए बेहतर तैयारियों पर जोर दिया। दौरे से लौटकर ढाका में एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि, "लंबे समय से हमने इस तरह का संकट नही देखा है। ऐसी विपदाओं से निपटने के लिहाज से बुनियादी ढांचा खड़ा किया जाना चाहिए।"
 
हसीना ने ये भी कहा कि देश को इस संकट से फौरन निजात तो नहीं मिल पाएगी। उनके मुताबिक पूर्वोत्तर से बाढ़ का पानी जल्द ही घट जाएगा लेकिन बाढ़ फिर बंगाल की खाड़ी की ओर, दक्षिणी इलाके को अपनी चपेट में लेगी। उन्होंने कहा, "हमे उससे मुकाबले की तैयारी करनी चाहिए। हम लोग ऐसे भूभाग में रहते हैं जहां अक्सर बाढ़ आती है और ये बात हमें अपने ध्यान में रखनी होगी। हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए।"
 
बांग्लादेश को दुनिया के सबसे ज्यादा जलवायु-पीड़ित देशों में एक माना जाता है। ऐसी आपदाओं का सबसे ज्यादा असर गरीबों पर ही पड़ता है। भारत के मेघालय राज्य की पहाड़ियों से बहकर पहुंचे बारिश के पानी से मौजूदा संकट और विकट हुआ है। मौसिनराम और चेरापूंजी जैसे दुनिया के सबसे गीले इलाकों में से कुछ इलाके मेघालय में हैं। सरकारी डाटा के मुताबिक दोनों जगहों पर रविवार को 38 इंच से ज्यादा बारिश हुई थी।
 
बांग्लादेश की इंजीनियरिंग और टेक्नोलजी यूनिवर्सिटी के जल और बाढ़ प्रबंधन संस्थान में प्रोफेसर जीएम तारेकुल इस्लाम कहते हैं कि बाढ़ लाने वाली इन अनियमित, बेतहाशा और समय पूर्व बारिशों के पीछे जलवायु संकट एक कारक है। उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "भारत के चेरापूंजी और दूसरे इलाकों में अनियमित बारिश इस बाढ़ का प्रमुख कारण है। ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से जलवायु बदली है और बारिश का पैटर्न भी। अब हम लोग देख रहे हैं कि भारी बारिश बहुत ज्यादा होने लगी है।"
 
जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की पिछले अगस्त में प्रकाशित छठी आकलन रिपोर्ट में भी बताया गया है कि 1950 के दशक से भारी वर्षा की घटनाएं ज्यादा होने लगी हैं। इस बदलाव को रिपोर्ट में मानव जनित जलवायु परिवर्तन से जोड़ा गया है।  
 
विकट हालात के दूसरे कारण
प्रोफेसर इस्लाम कहते हैं कि बाढ़ इस क्षेत्र के लिए नई बात नहीं है लेकिन जलवायु परिवर्तन ने मॉनसून को पिछले दशकों में ज्यादा अस्थिर बना दिया है। नतीजतन भारी बारिश के बीच सूखे की लंबी अवधियां भी पड़ने लगी हैं।
 
वह बताते हैं, "ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से ज्यादा से ज्यादा जलीय वाष्प, बादलों के रूप में आकाश में जमा हो जाता है, जब बारिश गिरती है तो ऊपर जमे वाष्प को भी अपने साथ ले आती है। इसलिए बारिश ज्यादा अनियमित और ज्यादा भारी हो जाती है। इसका मतलब यह है कि मॉनसून की पूरी अवधि के दौरान हमें औसत बारिश नहीं मिलती, बल्कि हम मूसलाधार बारिश की छोटी छोटी अवधियों का सामना करते हैं।"
 
बाढ़ की अत्यधिक तीव्रता के लिए, जानकार दूसरे कारणों को भी जिम्मेदार मानते हैं। जैसे कि खनन गतिविधियों में इजाफा और भारतीय क्षेत्र में जंगलों की कटाई। प्रोफेसर इस्लाम कहते हैं, "जब पत्थरों की खुदाई की जाती है और पेड़ काटे जाते हैं तो पानी के निचले इलाकों की ओर बहने की रफ्तार भी तेज हो जाती है। इसीलिए हम देखते हैं कि पानी तेजी से बहता आता है और नदियां उफनने लगती हैं। इससे नदी का आकार भी बदल जाता है। पानी के साथ बहकर आने वाली अतिरिक्त गाद, नदी के तल पर जमा होकर बाढ़ की तीव्रता बढ़ा देती है।"
 
रिपोर्टः जोबेर अहमद
चित्र सौजन्य : ट्विटर

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