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हाथ के ऐसे पंखे नहीं देखे होंगे आपने

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हाथ के पंखे नायाब होते जा रहे हैं। किसी जमाने में ऐसे पंखे बनाना हुनर माना जाता था। दिल्ली के इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स में इन दिनों ऐसे ही पंखों की प्रदर्शनी चल रही है। देखिए उसी से कुछ हाथ के नायाब पंखे।
 
 
19वीं सदी का पंखा
जाने माने पेंटर जतिन दास ने भुवनेश्वर में पंखों का एक म्यूजियम बनाया है। इसमें दुनिया भर से जमा किए गए 8.5 हजार से ज्यादा हाथ के पंखे हैं। इनमें से पांच सौ चुनिंदा पंखों को दिल्ली की प्रदर्शनी में पेश किया गया है। राधा और कृष्ण की तस्वीर वाला यह पंखा 19वीं सदी का है, जो कभी राजस्थान के नाथद्वार मंदिर में इस्तेमाल होता था।
 
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डांसिंग डॉल
फिल्म अभिनेत्री नंदिता दास के पिता जतिन दास के पंखों के कलेक्शन में भारत के अलावा चीन, जापान, कोरिया, बर्मा, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया, अफ्रीका और मिस्र जैसे देशों के पंखे भी शामिल हैं। उनके मुताबिक इन पखों की कीमत दो हजार से लेकर बीस लाख रुपये तक है। यह तस्वीर एक जापानी पंखे की है जिसे डांसिंग डॉल का नाम दिया गया है।
 
 
दुनिया भर के पंखे
76 वर्षीय जतिन दास कहते हैं कि वे जब भी किसी देश की यात्रा पर जाते हैं, तो वहां के पंखे हासिल करने की कोशिश करते हैं। उनके मुताबिक, "मैं भारत में किसी चौकीरदार, बावर्ची या चपरासी से कहता हूं कि वह अपनी मां के बनाए पंखे मुझे लाकर दे। पहले तो वे हंसते हैं लेकिन फिर अपने घर से पंखे लाकर देते हैं और वे नायाब होते हैं।"
 
 
इस्तांबुल का शाही पंखा
ये पंखा तुर्की के बादशाह के पंखे की नकल है। इसे इस्तांबुल के सोफिया म्यूजियम से हासिल किया गया। इस पंखे में मोती जड़े हैं और यह 18वीं सदी के आखिर का है। इस तरह के शाही पंखों में खालिस सोने का इस्तेमाल होता है और उनके किनारों पर मोती लगे होते हैं। इस पंखे को सफेद बत्तख और मोर के पंखों से तैयार किया जाता है।
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परों वाले पंखे
खूबसूरत परों वाले इन पंखों का इस्तेमाल कभी शाही परिवारों या फिर धार्मिक स्थलों पर किया जाता था। ये पर मोर, शुतुरमुर्ग, हंस या फिर दूसरे पक्षियों के होते हैं। परों को मिलाकर सिलाई की जाती है और उनके चारों तरफ बेहतरीन कपड़े या कीमती पत्थर लगाए जाते हैं। इन पंखों का इस्तेमाल मंदिरों में मूर्तियों को पंखा झलने में भी होता था।
 
 
ताड़ के पंखे
ताड़ के पत्तों से बने पंखों का इस्तेमाल अब भी भारत और पाकिस्तान में खूब होता है। यहां तस्वीर में दिखाया गया पंखा मंदिरों के शहर बनारस से है। इन पंखों को खूबसूरत बनाने के लिए इन पर पेंटिग भी की जाती है। जतिन दास कहते हैं कि इस संग्रह को उन्होंने पिछले 40 बरसों के दौरान जमा किया है।
 
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कसीदाकारी वाले पंखे
कभी कभी कसीदाकारी को भावनाएं व्यक्त करने का माध्यम भी बनाया जाता है। खूबसूरत डिजाइन और दिलचस्प पैटर्न वाले ये पंखे दस्तकारों के महारथ का सबूत है। इनमें अलग अलग की तरह की सिलाई होती है। इन्हें शीशों और पत्थरों से सजाया जाता है। अपनी खूबसूरती की वजह से यह कई बार दुल्हन के दहेज का भी हिस्सा होते हैं।
 
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खस के पंखे
खस एक किस्म की घास है, जो भींगने के बाद बहुत अच्छी खुशबू देती है। इसीलिए इन पंखों को इस्तेमाल करने से पहले पानी से भिगोया जाता है। एक जमाने में घरों में खस के पंखे बहुत आम थे, लेकिन अब ये कहीं कहीं ही दिखाई देते हैं। ऐसे पंखों के दस्ते यानी उनके पकड़ने वाली जगह आम तौर पर बांस की बनी होती है।
 
 
रंग बिरंगे पंखे
दस्ती पंखे कई तरह की घास के बनाए जाते हैं। अलग अलग रंगों का इस्तेमाल कर इन्हें खूबसूरत बनाया जाता है। उप महाद्वीप में यह हुनर मां से बेटी को मिलता है। भारत के उत्तर प्रदेश और उड़ीसा राज्यों में इस तरह की घास के पंखे बनाए जाते हैं। आम तौर पर गांवों में बिजली गुल रहने की वजह से इन पंखों का खूब इस्तेमाल होता है।
 
 
जरदोजी वाले पंखे
जरदोजी एक तरह की कसीदाकारी ही है लेकिन इसमें मखमल के कपड़े पर चांदी या सोने के धागे से कढ़ाई की जाती है। इसके लिए एक खास तरह की सुई इस्तेमाल की जाती है। किसी पेंसिल या स्टेंसिल के जरिए डिजाइन उतारा जाता है और फिर उस पर जरदोजी की जाती है। इसे और खूबसूरत बनाने के लिए इसमें मोती या पत्थर लगाए जाते हैं।
 
 
मोतियों वाले पंखे
इस तरह के मोतियों वाले पंखे तैयार करने में काफी मेहनत लगती है। ऐसे पंखे गुजरात के कच्छ इलाके में बनाए जाते हैं। आदिवासी महिलाओं को इन्हें तैयार करने में महारथ है। वे पंखों पर डिजाइन बनाने के लिए प्लास्टिक के धागों का इस्तेमाल करती हैं। पंखे के किनारों को सुंदर बनाने के लिए आम तौर पर ऊन या धागे का इस्तेमाल किया जाता है।
 
 
चमड़े के पंखे
ये पंखे आम तौर पर भारत के पश्चिमी हिस्से में मिलते हैं। पुरूष इन पंखों को खास तौर पर पसंद करते हैं। एक खास तकनीक से इन पर पैटर्न बनाए जाते हैं। शीशे और पत्थर भी लगाए जाते हैं। ऐसे पंखे बनाने के लिए आम तौर पर ऊंट का चमड़ा इस्लेमाल होता है। अफ्रीका और इंडोनेशिया में भी चमड़े के पंखे लोकप्रिय हैं।
 
 
धातु के पंखे
धातु के इस्तेमाल से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है। इससे पंखे भी बनाए जाते हैं। ऐसे पंखे तैयार करने में आम तौर पर चांदी या तांबे का इस्तेमाल किया जाता है। इन पंखों को शाही या धार्मिक कार्यक्रमों में प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इन पर बेहद बारीकी से नक्काशी की जाती है।
 
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यादगार पंखे
किसी जमाने में खास कार्यक्रमों के लिए विशेष पंखे तैयार किए जाते थे। ये अलग अलग साइज और डिजाइन के होते हैं। इन पर कई बार विशेष कार्यक्रमों के आयोजकों का नाम भी होता है, ताकि उन्हें बाद में भी याद रखा जा सके। यह तस्वीर इसी तरह के एक यादगार पंखे की है।
 
 
बांस के पंखे
बांस का इस्तेमाल अलग अलग चीजें तैयार करने के लिए किया जाता है। दुनिया के बहुत से हिस्सों में बांस के पंखे लोकप्रिय हैं। इसके लिए पहले बांस से पतली तैयार की जाती हैं। उन्हें अलग अलग रंगों में रंगा जाता है और फिर अपनी पसंद के डिजाइन के हिसाब से उनसे पंखे तैयार किए जाते हैं।
 

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