रोटी : सभ्य मानव का प्रथम आहार
होशंग घ्यारा
मजरूह साहब फरमा गए हैं, 'दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियाँ, खुद नाचती हैं सबको नचाती हैं रोटियाँ..।' रोटी महज रोटी नहीं है। यह पेट की ज्वाला शांत करने वाले प्रत्येक निवाले की प्रतीक है और शायद हमेशा से रही है। 'दो जून रोटी' की बात हो या 'गिव अस दिस डे अवर डेली ब्रेड' की प्रार्थना, यहाँ तात्पर्य केवल रोटी/ब्रेड से नहीं है। यहाँ अन्न ब्रह्म की प्रतिनिधि है रोटी। कहना मुश्किल है कि अनाज को पीसकर उसका आटा पाने, उस आटे में पानी मिलाने और फिर उसे पकाने व खाने का युगांतकारी काम सबसे पहले किसने, कब, कहाँ और कैसे किया था।
बहुत संभव है कि आज हर घर में रोज दोहराई जाने वाली यह क्रिया पहली बार कई चरणों में, कई गलतियाँ कर उनसे सीखते हुए, कुछ सुखद संयोगों पर सवार होते हुए, कई वर्षों का कालखंड लाँघते हुए पूरी की गई हो। वह आज की हमारी रोटियों की तरह वर्ताकार, पतली, बिलकुल सही सिकी हुई तो नहीं ही रही होगी। आटे के नाम पर भी संभवतः घास के बीज ही पत्थर से पीस लिए गए होंगे। मुहावरे की भाषा में कहें तो बहुत पापड़ बेलने पड़े होंगे संसार की उस पहली रोटी को बनाने में!
खैर, हम कह सकते हैं कि सभ्यता की राह में एक बहुत महत्वपूर्ण पड़ाव पार करने का सूचक था सबसे पहली रोटी का चूल्हे से उतरकर जबान तक पहुँचना। तब से लेकर आज तक रोटी भोजन की थाली में ही नहीं, सामाजिकता, संस्कृति और राजनीति तक में अपने अहम् स्थान को देख फूली नहीं समा रही। रूस की क्रांति में लेनिन द्वारा किए गए 'शांति, जमीन और रोटी' के वादे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
फ्रांस की क्रांति के अनेक कारणों में लगातार सूखे की वजह से उत्पन्ना खाद्यान्न संकट और रोटी के बढ़े हुए दामों के खिलाफ जनता का सड़कों पर उतर आना प्रमुख था। 'साथी' के लिए अँगरेजी शब्द 'कम्पेनियन' का उद्गम एक लैटिन शब्द से हुआ बताया जाता है, जिसका अर्थ है 'रोटी साझा करने वाला'। हमारा जीवन रोटी, कपड़ा और मकान के संघर्ष में कट जाता है और कई जगह हम रोटी-बेटी के रिश्ते निभाए जाते देखते हैं। आज भी हममें से कइयों के यहाँ तवे से उतरने वाली पहली रोटी पर गाय का अधिकार रहता है।
रूस तथा आसपास के देशों में मेहमानों का स्वागत रोटी और नमक के साथ करने की लंबी परंपरा रही है। मेहमान रोटी का एक टुकड़ा तोड़कर, उसे नमक में डुबोकर ग्रहण करता है। रूस में तो रोटी का मेहमाननवाजी से गहरा संबंध माना जाता है। नमक का संबंध किसी के साथ दीर्घावधि की जान-पहचान और दोस्ती से है। एक रूसी कहावत है कि आप तब तक किसी को जान नहीं सकते, जब तक कि उसके साथ आपने एक पुड (वजन का नाप, जो तकरीबन 16 किलो के बराबर होता है) नमक न खाया हो!
उक्रेन में तो रोटी परंपरागत रूप से भविष्य बताने के काम में लाई जाती रही है! एक प्रथा के अनुसार विवाह योग्य लड़की रात को सोने से पहले रोटी पर नमक छिड़ककर खाती थी। जब नींद में उसे प्यास लगती और सपने में कोई युवक उसे पानी पिलाता, तो वही युवक उसका भावी पति होता!
रोटी से भविष्य जानने का एक अन्य तरीका तो और भी अनोखा था। इसमें गेंद के आकार की विशेष गोलमटोल रोटियाँ (हम इन्हें बाटियाँ भी कह सकते हैं) बनाई जाती थीं। किसी घर में गाँव भर की विवाह योग्य कन्याएँ आटा लेकर इकट्टा होतीं। अब यह 'ज्योतिषी रोटी बनाने के लिए आटे में पानी भी खास तरह से मिलाया जाता, जो हम आधुनिक लोगों को जरा बुरा लग सकता है।
लड़कियाँ पास के कुएँ का पानी अपने मुँह में भरकर लातीं और उसे आटे में मिलातीं..! लेकिन गाँव के लड़के कहाँ उन्हें आसानी से छोड़ने वाले थे! वे रास्ते में लड़कियों को हँसाने का प्रयत्न करते ताकि वे अपने मुँह का पानी निगल जाएँ या रास्ते में ही उगल दें! खैर, सारे यत्नों के बाद जब आटा गूँथ लिया जाता है और हर लड़की अपने हाथों से एक गेंदनुमा रोटी बना चुकी होती है, तो एक कुत्ते को घर में लाया जाता। वह जिस लड़की की रोटी सबसे पहले खाता, समझा जाता कि उसी की शादी सबसे पहले होगी। यदि वह किसी की रोटी आधी खाकर छोड़ देता, तो यह तलाक या फिर बिन ब्याहे माँ बनने की भविष्यवाणी मानी जाती। अगर श्वान साहब किसी की रोटी खाएँ ही नहीं, तो माना जाता कि निकट भविष्य में उसकी शादी होने की कोई संभावना नहीं!
यहूदी समुदाय में गृहप्रवेश की रस्म में रोटी का खास स्थान है। यदि आप गृहप्रवेश कर रहे हैं, तो आपके मेहमान आपके लिए रोटी, नमक और शकर लेकर आएँगे। इन तीनों वस्तुओं में क्रमशः ये दुआएँ निहित हैं: (1) आपके घर में कभी भूख न फटके, (2) आपके जीवन में सदा जायका बना रहे तथा (3) आपके जीवन में सदा मिठास बिखरी रहे।
ईसाई समुदाय में मान्यता है कि गिरफ्तार होने से ठीक पहले अपने शिष्यों के साथ अंतिम भोज ग्रहण कर रहे ईसा ने शिष्यों को रोटी देते हुए कहा था,'यह लो, यह मेरा शरीर है' और मदिरा देते हुए कहा था,'यह मेरा रक्त है।' अतः आज भी भक्तों को प्रसाद के रूप में प्रतीकात्मक तौर पर इनका सेवन कराया जाता है।
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फिलिपीन्स में हर साल 10 सितंबर को संत निकोलस की याद में जो उत्सव मनाया जाता है, उसमें लोगों को संत निकोलस की पवित्र रोटी बाँटी जाती है। कहते हैं कि एक बार जब संत बीमार पड़े, तो माता मरियम उनके सपने में आईं और उन्हें रोटी को पानी में डुबोकर खाने को कहा। संत ने जब ऐसा किया, तो वे बिलकुल ठीक हो गए। इसके बाद वे पवित्र रोटी से लोगों का उपचार करते रहे और आज भी उनके भक्त सबके स्वास्थ्य की कामना करते हुए पवित्र रोटी का भंडारा करते हैं।
रोटी को सभ्य मानव का प्रथम आहार भी कहा गया है। इसके आयाम इतने व्यापक हैं कि इसे महज पेट की क्षुधा से जोड़कर देखना ठीक नहीं लगता। यह इससे कहीं अधिक सम्मान का अधिकार रखती है।