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इस पार बारिश है

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बारिश कविता
- राजकुमार कुंभ

ND
इस पार बारिश है
मैं हूँ, तुम हो, बच्चे हैं, हरे-भरे वृक्ष हैं
उस पार न जाने क्या होगा?
इस पार बारिश है।
खेल हैं, खिलाड़ी हैं
इस पार बारिश है।
खेल हैं, खिलाड़ी हैं, खेल का मैदान, कागज की नाव है
उस पार न जाने क्या होगा?

इस पार बारिश है
घर है, प्रेम है, प्रेम की चाह में यार की कराह है
उस पार न जाने क्या होगा?

इस पार बारिश है
गर्मागर्म पकौड़े, चाय-कॉफी-शराब है
पंडित रविशंकर का सितार है
और पंडित शिवकुमार शर्मा का संतूर है
याद करता हूँ तो
अल्ला रख्खा खाँ का तबला है
एक थाप, एक गूँज है
कहीं दूर देखता हूँ तो
किशोरी अमोणकर का लरजता-बरसता मालकौंस है
उस पार न जाने क्या होगा?

इस पार बारिश है
वाद हैं, विवाद हैं, संवाद हैं, याद है।
उस पार न जाने क्या होगा?

इस पार बारिश है।
भाँति-भाँति के लोग और भाँति-भाँति के योग हैं
उस पार न जाने क्या होगा?
इस पार बारिश है
राजनीति है, धर्मनीति है, अर्थनीति है, अनीति है
उस पार न जाने क्या होगा?

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