एक महिला मंडल के वार्षिकोत्सव पर मुख्य अतिथि बनने का निमंत्रण प्राप्त हुआ। मैंने आनन-फानन में स्वीकार कर लिया। मेरे उत्साह का अन्त नहीं था। मुख्य अतिथि बनने का पहला अवसर था। वह भी इन्दौर में और महिला मंडल भी अपने मोहल्ले का। बड़े उमंग के साथ इंदौर पहुँची। घर पर उत्सव का सा वातावरण था। पूरा परिवार इकठ्ठा था। सभी के लिए यह अवसर विशेष था।
कार्यक्रम की पत्रिका में लिखा मेरा नाम सभी बड़े चाव से पढ़ रहे थे। झूठ क्यों बोलूँ। मैं भी सबकी नजर बचाकर उसे बार-बार पढ़ रही थी। -'हिन्दी आणि मराठीष्या प्रसिद्ध लेखिका सौ मालती जोशी' - जितनी बार पढ़ा मन में एक गुदगुदी सी हुई। नियत समय पर कार्यक्रम की संयोजक मंडली लिवाने आई। मैं, माँ, चाची, भाभी, बुआ बहनों आदि के साथ सभा भवन पधारी, बन्दनवार आदि देखकर मन पुलकित हो गया। हॉल खचाखच भरा था। मुझे देखते ही माँ की सहेलियों ने घेर लिया। 'कब आई रे! आजकल कहाँ हो? बच्चे कितने हैं? पति क्या करते हैं? पहले से मोटी हो गई है।' वगैरह, आम तौर पर पीहर आने-वाली लड़कियों से यही सब पूछा जाता है।
जब कुछ बहनें मुझे ससम्मान मंच पर लिवा जाने के लिए आईं तब जाकर यह सिलसिला रूका। तभी उन्हें याद आया कि निमंत्रण पत्रिकाओं में बड़े अक्षरों में नाम है, वह मेरा ही है। उन्हें घोर निराशा हुई। एक आंटी तो बोल ही पड़ीं-'अग ही कसली लेखिका। ही तर दिष्यांची मुलगी। तिला गाण म्हणायला साँगा। छान म्हणते।' (अरे ये कहाँ की लेखिका है। यह तो दिघे परिवार की मुलगी है, इससे गाना गवाओ। बड़ा प्यारा गाती है।) घर की मुर्गी...और किसे कहते हैं?